अश्‍लीलता की हद पार कर गए जमशेदपुर के पत्रकार

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होली के अवसर पर इस बार ‘‘जमशेदपुर प्रेस क्लब’’ द्वारा उत्कल हॉल साकची में होली मिलन समारोह मनाया गया. यह होली मिलन समारोह अपने आप में बेशर्मी की वह सारी पराकाष्‍ठा पार कर गया, जिसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है. यह बात तो शहर में किसी से छिपी नहीं है कि हर बार होली मिलन समारोह में पत्रकारों द्वारा जमकर शराब का सेवन किया जाता है, परंतु इस बार सारी सीमाएं लांघ दी गईं.

इस बार जमाने के साथ कदम से कदम मिलाते हुए शहर के कई पत्रकार, जो कि वरिष्‍ठ होने के साथ-साथ प्रेस क्लब ऑफ जमशेदपुर के सदस्य भी हैं, उन्होंने सभी मर्यादाओं को लांघते हुए कोलकाता से बार बालाओं की फौज बुलवाकर पूरी पत्रकार बिरादरी को शर्मिंदा किया। त्यौहार के खुमार में एक तरफ जहां उनके सिर पर अंगूर की बेटी नाच रही थी वहीं दूसरी ओर मंच पर थिरकती बार बालाएं को साथ पत्रकार भी कमर मटकते देखे गए.

हालांकि समारोह में शिरकत करने वाले अधिकांश पत्रकार बंधु क्षेत्रीय इलेक्ट्रनिक मीडिया से जुड़े़ थे। जिनमें कैमरा मैन, स्ट्रिंगर आदि शामिल थे। किन्तु कहीं न कहीं ये पूरा अश्‍लीलता भरा खेल प्रेस क्लब ऑफ जमशेदपुर के तत्वावधान में उनके वरिष्‍ठ सदस्यों की रजामंदी से ही हुआ. कुछ प्रिंट मीडिया के भी वरिष्‍ठ वरीय संवाददाताओं ने बहती गंगा में हाथ धोने में किसी भी तरह का कोई परहेज नहीं किया, जो कि पूरी बिरादरी को कटघरे में खड़ा करता है।

गौरतलब है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, ऐसे में कई सवाल इस अश्‍लील कार्यक्रम के बाद उन पत्रकार बधुंओं और शायद पूरी बिरादरी के लिए खड़े होते हैं कि समय-समय पर अश्‍लील कार्यक्रमों में शिरकत करने वाले नेता, विधायक, वरिष्‍ठ पुलिस कर्मी, सरकारी बाबुओं की आलोचना करने वाला मीडिया किस मुंह से समाज को उनकी गलत हरकतों की रिर्पोटिंग कर समाचार प्रसारित या प्रकाशित कर पायेगा? क्या तब जनता को होली मिलन समारोह में पत्रकारों द्वारा किया गया ये कृत्‍य याद नहीं आएगा?

आये दिन स्कूल-कॉलेज में होने वाले कार्यक्रमों पर मीडिया द्वारा अश्‍लीलता को लेकर कई तरह की आलोचनाएं व तीखी प्रतिक्रिया तक सुनने व पढ़ने को मिलती है, जिसमें मीडिया समाज के बुद्धिजीवी लोगो की चिंता को साफ देखा जा सकता है, किन्तु जब वही पत्रकार लोग होली के बहाने अश्‍लील हरकत करते हुए दिखेंगे तो समाज में अश्‍लीलता तथा शालीनता के बीच के अंतर को बताने तथा समाज को बचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

या फिर इस पूरे कृत्‍य को होली के पर्व पर आजादी के नाम पर पत्रकारों की फौज को इस हरकत को बुरा न मानो होली है वाली कहावत का साक्षात उदाहरण मान कर सबको अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहिए? क्योंकि आखिर पत्रकार भी तो इंसान ही होते हैं.

जमशेदपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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