ये संपादक हैं या रिकवरी एजेंट!

E-mail Print PDF

ग्वालियर में पाई-पाई राजस्व को जूझ रहे पीपुल्स समाचार के स्थानीय संपादक को जहां राजस्व वसूली में जोत दिया गया है, वहीं एक ब्यूरो का चीफ संपादक भारी पड़ गया। आलम यह है कि अब संपादक मनोज वर्मा, ब्यूरो चीफ से कुछ कह नहीं पा रहे हैं और पूरी ताकत से वसूली में लगे हुए हैं।

दतिया के ब्यूरो चीफ अनिल सिंदूर से ट्यूनिंग न बैठ पाने के कारण मनोज वर्मा ने उनकी छुट्टी कर दी थी। लेकिन सिंदूर ने भी हार नहीं मानी और मालिकों को नेताओं को इतने टेलीफोन लगवाए कि अंतत: मालिकों को सिंदूर को वापस नौकरी पर रखने का आदेश देना ही पड़ा। वैसे भी पीपुल्स के मालिक नेताओं-मंत्रियों के टेलीफोन सुनने के लिए सदैव कान खोले बैठे रहते हैं। ऐसे ही एक टेलीफोन ने सिंदूर की वापसी करवा दी तो उन्होंने अब संपादक को बायपास करना शुरू कर दिया है।

इसका उदाहरण अभी तब देखने को मिला जब वसूली पर निकले संपादक ने उन्हें पूरे आधा सैकड़ा बार टेलीफोन लगाए पर सिंदूर ने टेलीफोन उठाना तक उचित नहीं समझा। थक हारकर मनोज वर्मा को ही टेलीफोन लगाना बंद करना पड़ा। पीपुल्स समाचार के प्रबंधन ने संपादक को संपादकीय काम के बजाय अब वसूली करने को कहा है। इसी सिलसिले में मनोज वर्मा ग्वालियर-चंबल अंचल में वसूली करते फिर रहे हैं और अखबार में क्या छप रहा है, इसकी ओर देखने की फुर्सत किसी को नहीं है।

पीपुल्स के ब्यूरो चीफ भी मंजे हुए हैं और वे मनोज वर्मा की नब्ज को जानते हैं, इसलिए उनकी सेवा कर उन्हें रुखसत कर रहे हैं। यहां बताना मुनासिब होगा कि हर अखबार में मार्केटिंग की टीम अलग होती है और रिकवरी की अलग। लेकिन पीपुल्स में ऐसा नहीं है। मार्केटिंग की टीम का आकार छोटा होता जा रहा है। रिकवरी करने वाले डबराइट्स है और उन्हें अखबार की एबीसीडी नहीं मालूम इसलिए संपादक को वसूली में झोंक दिया गया है। मनोज वर्मा, समूह संपादक अवधेश बजाज के कृपा पात्र हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


AddThis