सन्मार्ग पटना में जाइए, इज्जत गंवाइए!

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जी हां, पटना के इस अखबार के बारे में अब यही कहा जाने लगा है। वजह है यहां की व्यवस्था। ऑफिस का हाल यह है कि कब कोई चपरासी या ऑपरेटर आपसे बहस कर बैठे, कुछ भी पता नहीं। ऐसा पहले कई बार हो चुका है। दूसरी बात कि मैनेजमेंट की तरफ से कुछ लोगों को इतनी छूट मिली हुई है कि वे किसी को बेइज्जत कर सकते हैं। बदले में वे पल-पल की जानकारी मैनेजमेंट तक पहुंचाने का काम करते हैं।

जब से सन्मार्ग लांच हुआ, अभी तक कई सीनियर पत्रकार यहां से उबकर दूसरा दरवाजा देख चुके हैं। हिन्दुस्तान से गये विजय पाण्डेय, राजीव मणि, सुनील सिन्हा और प्रभात खबर से गये अरबिन्द सिन्हा एवं पाण्डेयजी कब का छोड़ चुके। इसके बाद पंवार जी गये, लोग उन्हें भी सम्मान नहीं दे सके। अब बारी है सुनील दुबे, पंकज किशोर और विनायक विजेता की। ये कब तक निभा पाते हैं, जल्द ही पता चल जाएगा। वैसे चर्चा है कि इनमें से कई लोग अभी से ही दूसरे दरवाजे की ताक में हैं। आखिर कोई क्या करे, बेरोजगारी जो है। बेरोजगार थी तो कर ली नौकरी। अच्छे की तलाश सभी को रहती है। जल्द ही यहां फिर से आदमी की तलाश शुरू हो जाएगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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