धनबाद में मुफ्त का अखबार बना भास्‍कर

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दैनिक भास्‍कर का धनबाद से प्रकाशन शुरू होने के पहले ऐसा लग रहा था कि कोई ऐसी चीज जेकर यह आएगा, जिसे लोगों ने ना कभी देखा हो या पढ़ा हो. पर इसका आगमन इतने ढुलमुल ढंग से हुआ कि जिन लोगों ने गिफ्ट के लालच में बुकिंग करा ली थी, वे अब पछता रहे हैं. आज से कुछ साल पहले दैनिक जागरण भी इसी तरह के तामझाम से आया था, लेकिन आज तक वह अपनी दो नम्‍बर वाली जगह पर नाक रगड़ रहा है.

प्रभात खबर का करिश्‍मा तो कभी नहीं दिखा. भास्‍कर से धनबाद के अखबार वाले इतने डर गए थे कि होर्डिंग-बैनर लगाने की होड़ मच गई. लग रहा था कि इनकी भी लांचिंग होने वाली है. अलबत्‍ता हिंदुस्‍तान चुपचाप रहा. लांचिंग के दिन ब्रेकिंग न्‍यूज हिंदुस्‍तान ने दी तो बाकी ने घिसी-पिटी या रुटीन खबरों तक ही अपने को सीमित रखा. धनबाद का यह संयोग है कि तीन अखबारों के संपादक कभी ना कभी एक साथ रहे हैं. ओम प्रकाश अश्‍क के साथ जागरण के संपादक भारतीय बसंत कुमार कोलकाता में काम कर चुके हैं तो प्रभात खबर के अनुराग कश्‍यप धनबाद में प्रभात खबर लांच कराने वाले ओम प्रकाश अश्‍क की टीम का हिस्‍सा रह चुके हैं.

प्रभात खबर में अश्‍क जी के रहते मुझे भी काम करने का मौका मिला, पर वह जिस पद पर थे, उसमें उनसे ज्‍यादा बातचीत का अवसर नहीं मिला. उनकी कई खासियतें हैं. कम बोलना, मीठा बोलना, सबकी सुनना, एक कंसलटेंट की तरह संस्‍थान से अलग हटकर व्‍यक्ति के हित में सलाह देना. जितना मुझे पता है, उसके मुताबिक मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि अश्‍क जी के साथ काम कर चुके स्ट्रिंगर, रिपोर्टर और डेस्‍क के कई लोग आज संपादक हैं. प्रभात खबर, पटना के संपादक स्‍वयं प्रकाश स्ट्रिंगर हुआ करते थे. भास्‍कर के स्‍थानीय संपादक राघवेंद्र भी उनके अंडर में स्ट्रिंगर रह चुके हैं. हिंदुस्‍तान में ही जमशेदपुर के संपादक अजय कुमार उनके साथ चीफ रिपोर्टर रहे हैं. प्रभात खबर के कोलकाता संपादक कौशल किशोर उनके सब एडिटर रह चुके हैं.

अब ये सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति के आगे उनके ही चेले और बाहर से आया भास्‍कर और उसकी लंगड़ी टीम कैसे मुकाबला कर सकते थे. ये दुर्भाग्‍य है कि अश्‍क जी कोयला फांक रहे हैं. ये उनकी सही जगह नहीं है. प्रभात खबर में हरिवंशजी ने उन्‍हें अपनी सारी जवाबदेही सौंप दी थी. भड़ास पर ही दो साल पहले देखा था अश्‍क जी का बयान कि पैसे के लिए प्रभात खबर छोड़ा. जो आदमी बीस साल तक एक जगह रहा, उसने अगर जगह छोड़ी तो निश्चित ही पैसे की कोई बड़ी मजबूरी उनके सामने रही होगी. बहरहाल, प्रसंग अखबारों का था. अभी हालात ये हैं कि प्रभात खबर सुधर रहा है, जागरण बुरा दिखने लगा है. भास्‍कर तो मुफ्त का अखबार मान लिया गया है. हिंदुस्‍तान जहां था, वहां अब भी खड़ा है. उसके दो और ग्रामीण संस्‍करण फ्लाप निकले. एक और निकलने वाला है. आगाज देख उसके भी अंजाम का अंदाजा लग गया है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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