सुनिए स्थानीय संपादक (विभीषण) और समूह संपादक (रावण) के सेना की कहानी

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आज आपको एक कहानी सुनाते है। न राजा-रानी की। न गुड्डे-गुडिया की। कहानी एक संपादक की, क्योंकि हम पत्रकार है। एक अखबार का स्थानीय संपादक। नाम था ###### #### (विभीषण)। संस्थान में वो शाम चार बजे आने और 9 बजे जाने के लिए प्रख्यात। कई साल से नहीं बढ़ा था वेतन। जाहिर सी बात है, जब संपादक का नहीं बढ़ा तो बाकी किसी की तो दूर की बात है। एक दिन चुन्नु उनके पास जाकर रोया...

...सर, पांच हजार रूपए मिलते है। जिनमें 75० रूपए कटते है। ढेड हजार का डीटीसी का पास बनता है। तीन हजार का कमरा किराए पर है और दो हजार खाने पीने के लिए चाहिए। फोन में इनकमिंग रहती है, आउटगोइंग के लिए कंपनी है और रही बात सिगरेट की तो आप हैं ही। कुल मिला हर महीने हमें दो हजार रूपए कर्जा करना पड़ता है या फिर घर से मंगवाने पड़ते हैं। लेकिन संपादक जी बोले, बेटा अब तो पुराने समूह संपादक जी भी नहीं हैं जिनके कहने से शायद कुछ होता। अब कोई और आएगा तो देखेंगे।

सप्तह बीता। पुराने समूह संपादक की जगह आ गए ###### #### (रावण)। लम्बी-लम्बी गप- -##  और गोलमेज के लिए मशहूर। साथ ही कोई प्रोजेक्ट सफल न होने का कलंक। मैनेजमेंट तो शायद पढ़ा ही नहीं। लेकिन हमारे लिए तो अंधों में काना राजा था। बहरहाल (विभीषण) जी ने कहा कि ये हमारे पुराने मित्र हैं, काफी समय से इन्हें जानते हैं। ये हमारे लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे। (विभीषण) ने नए समूह संपादक (रावण) को कहा- श्रीमान जी हमारी सेना में स्टाफ कम है और जो हैं उनकी सेलेरी उनसे भी कम है। इस तरह उन्होने हमारी बात रखी। आश्वासन मिला कि जल्द ही सारे स्टाफ की सेलरी रिवाइज करवाई जाएगी। संस्थान के एमडी से मैं बात करूंगा कि यहां स्लेब बनाए जाएं ताकि किसी को भी कम ना आंका जाए।

रावण और विभीषण का लालीपाप हाथ में लिए हम इंतजार करते रहे। उधर रावण अपनी सेना में कुछ रिटायर्ड और नाकारा लोगों को पुराने स्टाफ की सेलरी से तीन से दस गुणा सेलरी बढ़ाकर अपनी भर्ती कर चुका था। जो एडिट पेज पहले 25 हजार रूपए के लोग निकालते थे अब वह दो लाख रूपए में निकल रहा था। एक दिन सेना के गुप्तचर ने चौकाने वाली खबर सुनाई। रावण ने विभीषण की सेलरी दोगुणी कर दी है। खैर सेना को लगा- रावण कुछ अच्छा काम कर रहा है, अब सेना के भी अच्छे दिन आएंगे। एक सैनिक इतने में ही बोल पड़ा- पिछले दो साल से कपड़े नहीं खरीदे हैं, अब कपड़े खरीद लूंगा।

इस बार जब वेतन आया और वो भी कट कर तो इससे नाराज सैनिकों ने रावण से बात की। रावण से पूछा तो जवाव मिला हम आपकी लडाई लड़ रहे हैं, लेकिन अभी कमान मेरे हाथ में नहीं है मुझे भी कास्ट काटिंग के लिए कहा गया है। पिछले 6 महीने से वेतन बढ़कर मिलने के इंतजार में बैठी नाराज सेना ने सबके पालनहार (विष्णु जी) से मिलने का मन बनाया। लेकिन कलयुगी नीति के अनुसार अभी आज के चित्रगुप्त (एचआर) से भी मिलना जरूरी था। चित्रगुप्त से मिले और उनके सामने अपनी समस्या रखी। समस्या सुनकर चित्रगुप्त बोले- रावण को तो अपनी सेना में कटौती करनी है फिर ये इंक्रीमेट की बात कहां से आई। हमारे सामने तो ये बात ही नहीं रखी गई।

दोस्तों, सेना को ज्ञात हो गया- विभीषण कलयुगी हो गया है, जो सेना के बजट को अकेले ही हड़प कर गया है। अब किसी सैनिक का कुछ नहीं होगा। चुन्नु भी हर महीने उधार लेगा। गदरू भी नए कपड़े नहीं खरीद पाएगा। इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है, प्लीज कमेंट में बताने की कृपा करें। साथी आज के समय में विभीषण से बचकर रहना क्योंकि ये कलयुग है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


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