सहारा का गला फंसा तो पत्रकारों की बल्‍ले-बल्‍ले

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: कोई बोतल, चांदी का प्‍याला तो कोई रकम ले भागा : औकात देख कर बांटा गया तोहफों का डग्‍गा : सहारा शहर से निकली गाडि़यों की प्रतीक्षा करते कटी रात : मीडिया-मैनेज के लिए अखबार-चैनलों के दफ्तरों के चक्‍कर : बड़े घरानों के घरेलू झगड़ों में बड़ों का फायदा-नुकसान भले ही कितना होता हो, लेकिन इस झगड़ों में उन सियारों की पौ-बारह हो जाती है जो मौका ताड़े रहते हैं और छुपकर लपक लेते हैं अपना हिस्‍सा।

इसकी हकीकत जाननी-समझनी और देखनी हो तो डिस्‍कवरी या एनीमल प्‍लानेट जैसे चैनलों को निहारते रहिये, या फिर सीधे लखनऊ का रूख कीजिए जहां के पत्रकारों की करतूतें आपको इस हालात से खुद ही रू-ब-रू करा देंगे। ताजा मामला है सहारा समूह में चल रही जूतम-पैजार का। सहारा से पहले भी बर्खास्‍त किये जा चुके थे विनीत मित्‍तल। अपनी कार्य-संस्‍कृति के चलते तब भी सहारा ने उनकी जमकर छीछालेदर कर डाली थी। अखबारों में नाम-फोटू के साथ बर्खास्‍तगी के किस्‍से विज्ञापन की शक्‍ल में प्रकाशित कराये गये थे। जबर्दस्‍त जंग छिडी रही थी दोनों में।

लेकिन जुगाड़ तकनालाजी काम आ गयी तो घूरे के दिन भी फिर गये। विनीत मित्‍तल की वापसी धमाकेदार हुई और वे सीधे बिराजे कार्यकारी निदेशक की कुर्सी पर। हैसियत दूसरे-तीसरे नम्‍बर की बन गयी। लेकिन इसी बीच फिर सहारा समूह में उछलकूद हुई और शिकार बने विनीत मित्‍तल। एक बार वे फिर सहारा समूह से निकाल बाहर किये गये। सूत्रों पर भरोसा किया जाए तो लोगों ने सुब्रत राय को खबर दी थी कि विनी‍त ने बड़ा माल पेल दिया है और अब सैकड़ों करोड़ के मालिक बन चुके हैं। उधर विनीत मित्‍तल ने अपने साथ हुए हादसे का दुखड़ा सीधे हाईकोर्ट में रोना शुरू कर दिया। बोले:- मुझे व मेरी पत्‍नी को कई दिनों तक बंधक बनाये रखा गया और  सहारा वालों ने मेरे दो मकानों का जबरिया बैनामा भी करा लिया है। मामला यहीं तक नहीं था। विनीत मित्‍तल ने सायास या अनायास इस अर्जी की तारीख ठीक उसी दिन चुनी जिसके अगले ही दिन सुब्रत राय का जन्‍मदिन था। इस दिन को सहारा समूह किसी देवता के अवतरण के समय जैसा माहौल बनाकर मनाता चला आया है।

बहरहाल, हाईकोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया और पुलिस व प्रशासन को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दे दिये। पुलिस ने भी कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए गोमती नगर थाने में मामला दर्ज कर लिया। बस, फिर क्‍या था, सहारा समूह के प्रबंधकों के हाथों से तोते उड़ने लगे। उन्‍हें घबराहट इस बात की हुई कि उनके देवतातुल्‍य समूह अभिभावक सहाराश्री के जन्‍मदिन पर क्‍या ऐसी ही खबरों का प्रवाह होगा। सहारा में मीडिया मैनेज करने वालों ने हर जगह से अपने घोड़े खोल दिये। अखबारों और खबरिया चैनलों के दफ्तरों के साथ ही उनके संपादकों और ब्‍यूरो चीफों के मोबाइलों पर घंटियां बजने लगीं।

कोई अपने संबंधों, कोई पुराने साथी तो कोई पुराने सहाराई होने के साथ ही साथ दोस्‍ती का वास्‍ता देकर पहले तो इसे बकवास खबर साबित करने पर तुल गये। मीडिया मैनेजरों की यह हरकत कुछ पत्रकारों को खासी नागवार गुजरी। उन्‍होंने साफ कहा कि आप हमें यह मत बताइये कि खबर क्‍या होती है, किस खबर को चलाना है या उसे रोकना है। आपको जो कुछ भी कहना हो, अपने वर्जन में कहिये। बहरहाल, मामला सलटता न देखकर साम को छोड़कर यह पत्रकार दाम पर उतर आये। खबर है कि खबर को रोकने के नाम पर कुछ पत्रकारों को विलायती शराब की बोतल से लेकर चांदी के बड़े-बड़े प्‍याले तक उपहार में रातोंरात भिजवा दिये गये।

लेकिन कुछ पत्रकार अक्‍खड़ भी थे। उनका कहना था कि सुरा और प्‍याले का साथ तो ठीक है, लेकिन उसके साथ कुछ नकद-नारायण भी तो होना चाहिए। ऐसे पत्रकारों के तेवर देख उन्‍हें आखिरकार लिफाफे भी पकड़ा दिये गये। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इस गड़बड़-झाले में मीडिया मैनेजरों ने अपने उन साथियों को जमकर ओब्‍लाइज किया जो उनके करीबी थे। कुछ ऐसे लोगों को भी दबंग पत्रकार बता कर प्रस्‍तुत किया गया जो असलियत में कहीं पत्रकार थे ही नहीं। कुछ मैनेजर तो दूसरों को देने के नाम पर खासी बड़ी रकम खुद ही घोंट गये।

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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