कहानी पटना के एक बड़े अखबार की : आओ मंदिर-मंदिर खेलें

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यह कहानी है पटना के एक ऐसे बड़े अखबार की जो खुद को बिहार का सबसे बड़ा हिन्दी दैनिक बताता है। मामला कुछ साल पूर्व का है। पटना के बुद्ध मार्ग में सरकारी जमीन पर एक बकरी बाजार हुआ करता था। पटना नगर निगम ने तब बकरी बाजार खत्म कर उस जमीन पर छोटे दुकानदारों के लिए सौ से अधिक छोटी-छोटी दुकान बनाने का फैसला लिया।

जब जमीन की मापी की गई तो पता चला कि निगम की उस जमीन के कुछ अंश बगल में ही एक समाचार पत्र के प्रबंधन ने हड़प रखे हैं,  जब निगम ने कार्रवाई शुरु की तो समाचार पत्र में हड़कंप मच गया और प्रबंधन ने जुगाड़ टेक्नॉलाजी अपनाना शुरू किया। फिर शुरू हुआ 'आओ मंदिर-मंदिर खेलें'  का खेल। प्रबंधन ने एक पंडि़त जी को पकड़ा जो अखबार द्वारा हड़पे गए जमीन के आगे हनुमान जी की तस्वीर लगाकर पूजा-पाठ करते थे। प्रबंधन ने पंडित जी को आगे कर यह बात फैलाई कि निगम यहां बनने वाले मंदिर को बनने नहीं देना चाहता जबकि यह जमीन मंदिर की है।

प्रबंधन ने अपने खर्चे पर वहां मंदिर का निर्माण भी शुरू करा दिया। बात जब मंदिर-मस्जिद की हो तो लोगों की श्रद्धा और उत्तेजना लाजिमी है। अखबार प्रबंधन ने वहां भव्य मंदिर बनवा दिया। लोगों की भावनाओं को ध्यान में रख निगम ने मंदिर और उसके पीछे की लगभग दो कट्ठा जमीन छोड़ दिया। इसके बाद खाली जमीन पर अखबार ने अपना कब्जा कर उसपर साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड बना दिया जो कब्जा अबतक बदस्तूर जारी है। हालांकि निगम भी यह जानता है कि उसकी जमीन पर अखबार ने गलत तरीके से कब्जा कर रखा है और यदा कदा निगम के अधिकारी अखबार प्रबंधन को हड़काते भी हैं।

इसका उदाहरण तीन वर्ष पूर्व देखने को मिला था। इस अखबार ने पटना के गांधी मैदान में 'यूफोरिया'  के नाम से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। पटना नगर निगम के अधिकारियों ने इस कार्यक्रम को देखने के लिए अखबार प्रबंधन से तीस पास मांगे थे पर उन्हें दस पास ही दिया गया। फिर क्या था निगम के अधिकारी बुलडोजर लेकर अतिक्रमण हटाने अखबार के दफ्तर पहुंच गए। फिर जब तीस के बदले उन्हें 50 पास दिया गया तब बुलडोजर वापस हुआ। यह अखबार का प्रबंधन अपने स्वार्थ के लिए मंदिर बनवाता भी है और तुड़वाता भी है।

यह उदाहरण तो जमीन कब्जा के लिए मंदिर बनाने की थी पर इसी अखबार को जरुरत पड़ी तो दानापुर रेलवे स्टेशन के सामने बने एक प्राचीन मंदिर को तुड़़वाने की कोशिश में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख छोड़ा। इस अखबार का एक नया प्रिंटिंग प्रेस पटना के शिवाला चौक स्थित भगवतीपुर गांव के पास स्थापित हुआ। इस स्थान पर जाने के लिए बड़े वाहन दानापुर (खगौल) रेलवे स्टेशन से होकर आते हैं। स्टेशन परिसर में ही एक प्राचीन मंदिर है जिसके बगल से और पीछे होते हुए वाहन आते जाते हैं। मंदिर के कारण बड़े वाहनों को गुजरने में काफी कठिनाई होती है,  चूंकि इस अखबार के कागजों को लेकर भी वाहन इसी रास्ते से गुजरते हैं इसलिए अखबार प्रबंधन ने वहां से मंदिर तुड़वाने की जुगत भिड़ायी।

पहले तो कई माध्यमों से मंदिर प्रंबंधन को दूसरी जगह जमीन लेकर मंदिर बनवाने का खर्च देने का वादा किया गया पर जब मंदिर प्रबंधन इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो दूसरा तरीका निकाला गया। अखबार के एक रिपोर्टर को तीन दिनों तक दापुर में कैंप कराया गया। उस रिपोर्टर ने भाड़े के कुछ लोगों को लेकर दो तीन दिनों तक मंदिर के पास यह कहकर धरना-प्रदर्शन कराया कि मंदिर में असमाजिक तत्व रहते हैं और मंदिर को यहां से हटाया जाए। जिस अखबार ने यह साजिश रची उसमें इस धरना प्रदर्शन से संबंधित खबर प्रमुखता से लगातार कई दिनों तक छापी गई।

यह अलग बात है कि अखबार प्रबंधन मंदिर तुड़वाने की अपनी साजिश में अबतक सफल नहीं हो पाया। पटना के एक पत्रकार ने पटना नगर निगम से आरटीआई के तहत बकरी बाजार की उस जमीन जिसपर दैनिक अखबार ने कब्जा कर रखा है के बारे में जानकारी मांगी है। उक्त पत्रकार इस मामले को लेकर अखबार प्रबंधन को हाइकोर्ट में घसीटने की तैयारी कर रहा है।


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