असद लारी का वेतन बढ़ा पौने बारह रुपये, वह भी सालाना

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वाराणसी : असद लारी। यह नाम बनारस के पत्रकारों में खासा पहचाना नाम है। यह साहब पत्रकार हैं, धाकड़ हैं और अपनी धाक की नुमाइश करने के लिए वे लगातार अपनी मूछों में हमेशा कुछ न कुछ खोजते ही रहते हैं। अंदाज ठीक वैसा ही जैसे नैनीताल के थारू मजदूर, जो खाली वक्‍त में अपना लबादा उतारकर चीलर-जूं खोजते रहते हैं।

अब धाक जमाये रखना अकेले काशी की ही नहीं, बल्कि अधिकांश भारतीयों का खास शगल होता है, भले ही झोली या अक्‍ल में झ- न हो, लेकिन रंगबाजी बनी रहनी चाहिए। सो लारी साहब को आधा दर्जन सम्‍पादक भी अपने हर अंग का जोर लगा चुके लेकिन कम्‍प्‍यूटर कम्‍पोजिंग नहीं सिखा पाये। लेकिन चूंकि हिन्‍दुस्‍तान की लांचिंग के वक्‍त कोई और काबिल मिल नहीं रहा था तो असद लारी के लिए छींका टूट ही गया और वे वरिष्‍ठ संवाददाता बन गये।

नगर निगम और वीडीए की रिपोर्टिंग का जिम्‍मा मिल गया। खूब काम किया, लेकिन रिपोर्टिंग कम, वहां की राजनीति के पुरोधा जरूर बन गये। बताने वाले बताते हैं कि चाहे नगर आयुक्‍त हों या नगर प्रमुख, सभासद हों या कर्मचारी नेता। असद लारी का जलवा सभी मानते हैं। किसको हटाना है, किस पर आंदोलन का प्रहार करना है और कैसे करना है, लारी को सब पता है। बस पता अगर नहीं है तो केवल कम्‍प्‍यूटर पर काम करना। झगड़ों को भड़काना और इधर का उधर लगाना लारी को खूब आता है।

हाल ही तय किया गया कि लारी को रिपोर्टिंग के काम में लगा दिया जाए। उन्‍हें फिर वही नगर निगम और वीडीए की रिपोर्टिंग सौंप दी गयी। कई बरसों से केवल कुर्सी पर बैठ कर पेज बनवाने वाले लारी को लगता है गठिया हो गया था, लेकिन आदेश तो आदेश है। उन्‍हें दफ्तर की कुर्सी छोड़कर बाहर निकलना ही पड़ा। मगर एक ही दिन में सारे तारे दिन में दिख गये और दिमाग चौंधिया गया। लम्‍बे समय के लिए अवकाश पर चले गये। घोषित किया कि बीमार हैं, लेकिन वे सम्‍पादकों और उनके क‍रीबियों के घर पर परिक्रमा में जुटे थे। मेहनत रंग लायी और उनको लोकल रिपोर्टिंग इंचार्ज बना दिया गया। जाहिर है अब पूरा रिपोर्टिंग सेक्‍शन ही बेहाल-परेशान हो चुका है।

वैसे कम परेशान और हलकान तो खुद असद लारी भी नहीं है। वजह यह कि भाई लोगों ने उनका काम लगा दिया। जिस पर भरोसा था, उसी ने दांव दे दिया, चुपचाप। ताजा खबर यह है कि असद लारी को उनकी वेतन बढ़ोत्‍तरी का एक लेटर मिला है। खबर पाते ही लारी खुश हो गये। साथियों ने पार्टी मांगी तो एक किलो लड्डू और समोसों के साथ चाय पिलवा दी। पान और मसाला अलग से आन डिमांड मंगाना पड़ा। इसके बाद ही साथियों ने उन्‍हें एचआर जाकर वेतन इंक्रीमेंट का लेटर लाने की फुरसत दी। अपने अंदाज के हिसाब से मूंछों के बालों पर अत्‍याचार के तहत उन्‍हें खोजते-उखाड़ते लारी एचआर पहुंचे। लेटर लिया और शुक्रिया अदा करके रिसेप्‍शन तक पहुंचे। इसी बीच लेटर खोल लिया।

मगर यह क्‍या। लेटर देखते ही उन्‍हें गश आ गया। मैनेजमेंट को मां-बहन की गालियां देते हुए सोफे पर धड़ाम हो गये। कुछ ने दौड़कर उनके चेहरे पर पानी की छींटें मारीं और कुछ ने उनके हाथ से इंक्रीमेंट का लेटर लेकर पढ़ना शुरू कर दिया। फिर तो हंसी का फौव्‍वारा ही छूट गया। इंक्रीमेंट लेटर में असद लारी की तनख्‍वाह मैनेजमेंट ने बढ़ाई तो थी, लेकिन महज पौने बारह रुपये। वह भी महीनेवार नहीं, बल्कि सालाना। यानी हर महीने एक रुपये से भी कम। लोगों की हंसी में अपनी इज्‍जत का फालूदा निकलते देख लारी होश में आये और चैतन्‍य भी हो गये। लेटर पढ़ने वालों को जम कर गरियाया और लेटर लेकर बाहर आ गये। सिगरेट के कई कश लेकर वापस तो ले आये लेकिन दफ्तर का माहौल उन्‍हें अपने प्रति अजीब सा लगा।

दरअसल, इस लेटर के माध्‍यम से प्रबंधन ने लारी को साफ तौर पर इशारा कर दिया कि अब वे खुद ही संस्‍थान को अलविदा कह दें। लेकिन लारी ऐसा नहीं करेंगे, उन्‍होंने तय कर लिया है। वे इस बढ़ोत्‍तरी को ही नेमत मान कर अपने पुराने ढर्रे पर लौट आये हैं। हंसते रहें लोग, तो हंसते रहे। लारी तो बाकायदा लारी-लोडर हैं, जाहिर है कि लारी तो अपनी रफ्तार पर ही चलेगी। किराया भले ही कम मिले। हां, लारी की स्‍पीड सायकिल से भी धीमी जरूर हो गयी है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों आजाद पत्रकारिता कर रहे हैं.  उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.


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