न्‍यूज चैनलों के बड़े-बड़े एंकर मेरी गुस्‍ताखी माफ करना

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पुरातन ज़माने में होता था कि राजा महाराज या काजी न्याय के लिए लिए अपना न्याय दरबार लगाते थे और दोनों पक्षों की बातें सुनकर उनके वाद-विवाद का निपटारा वहीँ हाथों हाथ कर देते थे यानी कि on the spot justice हो जाता था। ऐसा ही एक समुदाय है जो वैसे तो हाल-चाल, वेशभूषा से हाई-फाई आधुनिक है परन्तु उनके क्रिया कलाप और समय के बारे रिसर्च जारी है।

इस समुदाय को देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया कहा जाता है यानी कि न्यूज़ को टीवी पे दिखाने वाले लोग और उनकी पूरी जमात। जनता की आवाज़ के नाम पर इनको हर शाम को कोई न कोई बकरा चाहिए हलाल करने के लिए, भले ही उस बेचारे पर आरोप साबित हुए या नहीं हुए इससे इनको फर्क नहीं पड़ता। इन्हों ने तो अपना कोर्ट बिठा देना है, जिसे अच्छी अंगरेजी में मीडिया ट्रायल कहते हैं। इसमें इनका एक धुंआधार, खूंखार एंकर होता/होती है, जो केस को सबके सामने रखता है और इनका साथ देने वाले रोज के वो जाने माने एक्सपर्ट होते हैं जो दुनिया के किसी मुद्दे पर अपनी राय ऐसे देते हैं, जैसे एक्‍सपर्टीज की हर हर गंगा उनके घर से ही निकलती है। और ये सब मिलकर किसी को अपराधी या मासूम साबित कर देते हैं। कम से कम एक पापुलर ओपीनियन तो बना ही देते हैं।

पूरी दुनिया पे ये लोग एक खास हक के साथ सवाल उठाते हैं जबकि इन पर कोई सवाल नहीं उठाता है। इनकी खुद की क्रेडिबिलिटी दिनों दिन गिरती जा रही है। देश के किसी भी मीडिया हॉउस में रिक्रूटमेंट की कोई पारदर्शी पॉलिसी नहीं है न ही उनके रीयल मालिकों का पता है। ब्लैक और वाइट मनी, पेड न्यूज़, कापोरेट लॉबिंग जैसे कई आरोप इन पर लगते रहते हैं। इन सीरियस मुद्दों के बाद भी जिस फ्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेशन का सहारा ये लेते हैं, आज उसी का थोड़ा सा सहारा हम भी ले लेते हैं। अपनी टीवी न्यूज़ मीडिया की ऐसी ही कुछ अदालतों और उनके खूंखार, जाने-माने एंकरों का कुछ विश्‍लेषण किया है टीवी पर देख देख कर (हो सकता है असलियत कुछ और हो)। उनकी कार्य प्रणाली, अंदाज़ और हाव भाव पर कुछ टिप्पणिया की गयी हैं जरा शौक फरमाएं-

अर्नब गोस्वामी (Times Now) - अर्नब साहब रोज रात को अपनी अदालत (The news hour) इतनी तेजी और हार्ड हिटिंग तरीके से चलाते हैं, जैसे की थोड़ा सा भी अगर हमने मिस कर दिया तो गोस्वामी वहीं बैठे-बैठे हमारी सजा मुकर्र कर देंगे। एहसास करवाते हैं कि किसी भी मुद्दे पर इनकी बहस ही अंतिम होगी। और इनका फैसला भी अंतिम होगा। इसी आदत के कारण प्रधानमंत्री की प्रेस मीटिंग में पीएम के मीडिया सलाहकार हरीश खरे से डांट भी खाई। फिर भी इंग्लिश मीडिया का बेबाक चेहरा, इन्होंने एनडीटीवी और सीएनएन आईबीएन की मोनोपोली खत्म की है।

बरखा दत्त (Ndtv)- Buck stops here. मैडम जी अब बक (दर्शक) यहाँ नहीं रुकता और We the people- ये कौन से लोगों के लिए आप शो कर रही हैं पता ही नहीं चलता। वैसे आपकी भी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी इतनी आलोचना के बाद भी पूरी ...... के साथ टिकी हुई हैं और हर शाम को उसी जोश के साथ अपने बक के साथ आ जाती हैं। एक बात और है जो लोग आपकी सफलता से चिढ़ते थे वे लोग मौसम का पूरा फायदा उठा रहे है। और सारी खुन्नस निकाल रहे हैं। कुछ दिन संन्यास ले लो।

प्रणब राय (Ndtv Group)- इन डॉक्टर साहब को अपने चैनलों का इलाज करना चाहिए नहीं तो..... वैसे अब अप्रासंगिक हो गये हैं, होना, नहीं होना कोई फर्क पड़ता। दुनिया आगे बढ़ चली है। कभी इंडियन न्यूज़ इंडस्ट्री में बड़ी इज्जत थी। देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया के शुरुआती लोगों में से एक हैं।

विनोद दुआ- (Ndtv)-  (मनोरंजन भारती के "दुआ साब")- किसी ने सही कहा था इनके लिए, ये पत्रकार नहीं ब्राडकास्टर हैं। शायद रवीश कुमार के साथ अकेले हैं, जिनके अपने नाम पर 15 मिनट का शो (महफिल) है। जबरदस्त टिप्पणीकार हैं बोलते भी शानदार हैं। हमेशा सुरूर में लगते हैं .... बाबा की जय हो!

करण थापर (devil's advocate)- इनको लड़ते देख ऐसा लगता है कि अच्छा हुआ हमें इंग्लिश कम ही समझ में आती है। वैसे सही नाम है शो का, इन्हें तो वकील ही होना चाहिए। फिर भी टीवी पर कम ही आते हैं, इसीलिए लोग सुनते हैं और देखते हैं। अपने हर शो से एक ब्रेकिंग न्यूज़ निकाल देते हैं।

राजदीप सरदेसाई (Cnn Ibn)- इनकी तो सारी जिन्दगी की कमाई Cash in parliament वाले मामले में चली गयी है, रही सही कसर इनकी इंटलेक्‍चुअल वाइफ (सागरिका घोष) अपने शो और डिबेट से पूरी कर देती हैं। इंडियन मीडिया के पोस्टर बॉय, राडिया कांड में नाम आने के बाद भी लोगों की इनसे उम्मीद है। अभी भी अंदर का जर्नलिस्ट जिन्दा लगता है।  पता नहीं है या नहीं?

रजत शर्मा (India tv)- इन्होंने कौन से कॉलेज से पत्रकारिता पढ़ी है उस पर लोग रिसर्च करने में लगे हैं। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है। वैसे इनको इस बात का श्रेय है कि  हजारों लोगों से इन्होंने जर्नलिज्‍म छुड़वा दिया है और लाखों-करोड़ों को ये भुलवा दिया कि न्यूज़ किस चिड़िया का नाम होता है। इनका नाम भी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा।

पुण्य प्रसून वाजपेयी (Zee News)- ज़ाहिर है, बड़ा सवाल ये है कि... हाथों को मसलते हुए कितने सालों से एक ही टेक में अटके हुए हैं। रोज सेमिनारों, ब्लॉग्स और अखबारों में उसी मीडिया को गाली देते हैं और उसी में बने हुए हैं। बाबा कुछ नया करो।

प्रभु चावला (New Indian Express)- जब हम लोग छोटे होते थे तो इंडिया टुडे के पेज पर इनका नाम पढ़कर सोचते थे कि देश का कितना बड़ा इंटलेक्‍चुअल होगा ये आदमी, और जब पहली बार आजतक पर देखा तो सोचने लगे, ये इंडिया टुडे छपती कैसे थी यार? मीडिया के अमर सिंह कह सकते है इनको।

संजय पुगलिया (CNBC Awaaz)- पढ़े-लिखे समझदार एडिटर लगते हैं। काश इनके जैसे एडिटर सभी हिंदी चैनलों को नसीब होते। कम से कम ये श्‍योर तो है इनके चैनल पर क्या चलेगा?

पंकज पचौरी (Ndtv)- इनको आंकड़ों से बहुत प्यार है। बोलते बोलते कुछ भूल जाते हैं। अच्छे टीवी पत्रकार हैं।

विक्रम चन्द्र (Ndtv)- इन साहब की बिग फाईट से मजेदार तो WWF की नूराकुश्ती होती है। टेक गुरु भी हैं। बड़ी इच्छा है किसी दिन धूल भरे रिमोट एरिया में बिना एसी के रिपोर्टिंग करते देखूं। ये तो पैदायशी सेलेब्रिटी जर्नलिस्ट लगते हैं।

रवीश कुमार (Ndtv)- टीवी के सबसे क्रेडिबल चेहरों में से एक हैं और आजकल पत्रकारिता को मजे ले ले के कर रहे हैं। खूब व्यंग्य कर रहे हैं ....पर देख कर मजा आता है। लगे रहो  इसी तरह....!  वैसे बरखा कांड के बाद एनडीटीवी के दूसरे पत्रकारों की तरह इन पर भी हमले हो रहे हैं। लोग स्टैंड तो पूछेंगे... बड़े पत्रकार जो हो।

आशुतोष (Ibn-7)- ये और इनके जैसे कई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्रांति के बाई प्रोडक्ट हैं। अच्छे एंकर है पर आगे कुछ नहीं... दिनों दिन लोकप्रियता गिरती जा रही है।

दीपक चौरसिया (Star News)- ये तो पत्रकार कम लगते हैं। पीपली लाइव में सही दिखाया है इनको.... स्टार वाले क्यों एंकरिंग करवा रहे हैं... रिपोर्टिंग फिर भी लोग झेल लेते हैं।

अभिज्ञान प्रकाश और अभिसार शर्मा - इन दोनों को टीवी की आवाज म्यूट करके देखो या साउंड करके कोई फर्क नहीं पड़ता। इनको बोलना है तो क्या बोलना है ये पता नही? पर आवाज़ दोनों की अच्छी..... पर हमेश एक जैसा साउंड करते हैं।

राहुल कँवल (Headlines Today)- ये तो अर्नब, राजदीप आदि के पाइरेटेड वर्जन हैं। दोनों को कॉपी करने की कोशिश करते हैं, ज्यादा गुंजाइश नहीं है।

अशोक श्रीवास्तव (DD News)- अच्छे एंकर हैं और बहुत अच्छे से जानते हैं सरकारी चैनल में कैसे काम किया जाता है। दूरदर्शन की पहुँच के कारण देश के कई बड़े एंकरों की तुलना में ज्यादा लोगों तक पहुँच पाते हैं।

निधि कुलपति, नीलम शर्मा और अलका सक्सेना- नीलम शर्मा और अलका जी तो अपने पर मोहित हैं। दुनिया जाये भाड़ में.... निधि जी को सुनना अच्छा लगता है।

अनुराधा प्रसाद (News 24)- ये मैडम तो किसी मातम वाले परिवार से भी क्रिकेट का सवाल पूछ सकती हैं। और फिर माहौल हल्का करने का क्रेडिट भी ले सकती हैं। विश्वास नहीं होता, ऐसे लोग भी एडिटर होते हैं। फिर इनके मातहत कैसे होंगे भगवान जाने?

किशोर अजवानी (Star News) - इनको मीडिया में भर्ती किसने किया था उसको ढूंढो.... ये अगर न भी हों तो कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

सुधीर चौधरी (Live India)- ये तो रजत शर्मा वाली परम्परा आगे बढ़ा रहे हैं क्योंकि पहले साथ-साथ में खबरें फोड़ते (ब्रेकिंग न्यूज़) थे, आज कल उसी राह पर चैनल भी चला रहे हैं।

संदीप चौधरी (IBN-7)- मुद्दा में ये इतना चिल्लाते क्यों हैं? पता नहीं.... ऐसा तो नहीं थोथा चना बजे घना।

शम्स ताहिर खान (Aaj tak)- जुर्म, वारदातों के बेताज बादशाह.... आवाज़ बढ़िया।

सईद अंसारी (News 24)- इतने साल से टीवी में चिल्ल-पों कर रहे हैं, पर डाउट है कि लोग अभी भी सीरियसिली लेते होंगे।

श्वेता सिंह (Aaj Tak)- क्या हैं ये और क्यों हैं ये समझ ही नहीं आता.... किसी मीडिया सर्वे ने सबसे ग्लैमरस चेहरा बता दिया है। मेरी इस लिस्ट में क्यों हैं ये मुझे भी पता नहीं।

ये कुछ खास और ज्यादा नजर आने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरे हैं, जिनको हम लोग रोज टीवी पर देखते हैं. हो सकता है कि सब लोग इनके बारे में उपर लिखी हुई बातों से  इत्‍तेफाक नहीं रखते हों परन्तु फिर भी टीवी के एक कट्टर दर्शक होने के नाते कुछ फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन तो ले ही सकते हैं। डेमोक्रेसी है भाई लोगों .......गुस्ताखी माफ़ करना।

लेखक रमेश मेघवाल काफी समय तक पत्रकार रहे हैं, इन दिनों सरकारी सेवा में जुटे हुए हैं.


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