चिटफंडिये ने यशवंत देशमुख को लूटा या खुद लुट गया? ...कानाफूसी जारी आहे

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: संपर्कों के धनी, संकटमोचक कहे जाने वाले और लाखों रुपये पाने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह भी देशमुख की डूबती कंपनी का भला नहीं कर पा रहे : भड़ास वाले यशवंत जी, पता नहीं आपका अपने नाम वाले यशवंत (सी वोटर वाले) से क्या याराना है. यशवंत देशमुख की कंपनी में क्या से क्या हो गया, और आप लोग हैं कि चुप्पी साधे हुए हैं. कोई खबर नहीं छाप रहे. कोई जानकारी नहीं दे रहे.

यह पत्र बहुत उम्मीद से लिख रहा हूं कि कई महीनों से सेलरी के लिए तरस रहे मीडियाकर्मियों की व्यथा को आप सुनेंगे और पोर्टल पर जगह देंगे. मैं हिंदी में टाइप नहीं कर पाता इसलिए पूरी बात रोमन में लिख रहा हूं जिसमें हिंदी में आप करा लेंगे, यह उम्मीद करता हूं.  भाषाई त्रुटियां भी मिलेंगी, जिसे दुरुस्त करा लेंगे, यह आशा करता हूं. शुरुआत कहां से करूं. शुरुआत अशुभ से करता हूं, अंत की आशंका से करता हूं. वह यह कि अब सीवीबी न्‍यूज का बचना मुश्किल नजर आ रहा है.

सीवीबी न्यूज यानि सी वोटर ब्राडकास्ट न्यूज. पहले इसी का नाम यूएनआई टीवी हुआ करता था. यूएनआई वालों ने अपना ब्रांड नेम वापस ले लिया तो सी वोटर चलाने वाले यशवंत देशमुख को ब्रांड नेम भी सीवी वोटर ब्राडकास्ट यानि सीवीबी न्यूज करना पड़ा. यशवंत देशमुख की मीडिया और देश में ठीकठाक छवि रही है. लेकिन यूएनआई टीवी से सीवीबी न्यूज तक की यात्रा में यशवंत ने अपनी छवि पर बट्टा तो लगाया ही, सैकड़ों पत्रकारों की जिंदगी को भी मुश्किल में डाल दिया.

चिटफंडियों के साथ गलबहियां करने का जो हश्र हो सकता है, वही यशवंत देशमुख का हुआ. वीडियो न्यूज एजेंसी यूएनआई टीवी उर्फ सीवीबी न्यूज में पैसा लगाया एक चिटफंडिये ने. बाद में इसने यहां हो रहे खेल तमाशे को देखकर खुद को इससे अलग कर लिया. इसी कारण जुलाई महीने से ही इस नये नवेले चैनल की हालत खराब है. इस चैनल के लगभग सारे ब्‍यूरो बंद किये जा चुके हैं या हो चुके हैं. खबरों का प्रवाह रुक गया है. पर यह सब कुछ किसी की महत्‍वाकांक्षा तो किसी के विश्‍वास पर खरे न उतरने के चलते हुआ. और इसका परिणाम भोगने को मजबूर हैं सैकड़ों बेगुनाह पत्रकार.

कथाक्रम के मुताबिक सीवीबी न्‍यूज में एसई इनवेस्‍टमेंट चिटफंड कंपनी का संचालन करने वाले पुरुषोत्‍तम अग्रवाल तथा यशवंत देशमुख पार्टनर थे. बताया जाता है कि इनके बीच क्रमश: 55 एवं 45 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी थी. यूएनआई टीवी से करार टूटने के बाद दोनों पार्टनरों के बीच सीवीबी न्‍यूज चैनल चलाने के लिए तीन साल तक का करार हुआ था, जिसके तहत दोनों को इन तीन सालों में तीस-तीस करोड़ रुपये इनवेस्‍ट करने थे. पुरुषोत्‍तम अग्रवाल ने अपने हिस्‍से की राशि एकमुश्‍त यशवंत देशमुख को दे दी, जिसके बाद यह टीवी न्यूज एजेंसी ने जोर शोर से काम शुरू कर दिया.

टीवी न्यूज एजेंसी सीवीबी की जिम्‍मेदारी पुरुषोत्‍तम अग्रवाल की बजाय उनके पुत्र सुनील अग्रवाल, सचिन अग्रवाल एवं इनकी पत्‍नी शिखा अग्रवाल संभालने लगीं. शुरू में सब ठीक ठाक चला परन्‍तु यशवंत देशमुख ने तमाम शहरों में ब्‍यूरो खोलकर पूरा पैसा तीन साल की बजाय एक साल में ही इनवेस्‍ट कर दिया तो अग्रवाल कुनबे का माथा ठनका. इसके बाद फिर पैसों की किल्‍लत शुरू हो गई, जिसके बाद यशवंत देशमुख ने पैसों की मांग चिटफंडिये कुनबे से की. अग्रवाल परिवार ने अपने हिस्से का पूरा पैसे दे चुकने की बात कहकर यशवंत देशमुख को सलाह दी कि अब वे अपने हिस्से का पैसा लगाएं. बताया जाता है कि यशवंत देशमुख ने अपना पैसा लगाने से हाथ खड़ा कर दिया और कई परेशानियों का जिक्र करते हुए तत्‍काल पैसा लगा पाने में असमर्थता जता दी.

इसके बाद अग्रवाल परिवार किसी तरह पैसे देकर चैनल को चला रहा था. पर असली पेंच निकल कर सामने तब आया, जब ज्‍वॉयस सेबेस्टियन की इंट्री सीवीबी न्‍यूज में हुई. सूत्रों का कहना है कि इस बीच यशवंत देशमुख ने कोलकाता में सुपर ब्‍यूरो खोला, जिसमें ममता बनर्जी से उनकी लगभग पन्‍द्रह करोड़ की डील हुई. इसके बाद ही 14 मार्च, 2011 से सीवीबी न्यूज़ बांग्ला भाषा में अपनी विशेष सेवाएं शुरू की. सूत्रों ने बताया कि यह डील ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की हवा बनाने के लिए की गई थी. इस डील की खबर यशवंत देशमुख ने अग्रवाल परिवार को नहीं दी.

सूत्रों ने बताया कि जब ज्‍वॉयस सेबेस्टियन को इस डील के बारे में जानकारी हुई तो उनकी महत्‍वाकांक्षा जाग उठी. उन्‍होंने इसकी जानकारी तत्‍काल अग्रवाल परिवार को मुहैया कराई तथा डील की रकम भी बता दी. इसके बाद दोनों पार्टनरों के बीच थोड़ी खटास हुई पर मामला किसी तरह चलता रहा. इसी बीच सेबेस्टियन यशवंत देशमुख को हटाकर खुद अग्रवाल के साथ पार्टनर बनने की कोशिशों में लग गए, जिसके बाद देशमुख और अग्रवाल्‍स के बीच दूरियां और बढ़ गईं. बाद में सेबेस्टियन को बाहर का रास्‍त दिखा दिया गया परन्‍तु तब तक मामला बिल्‍कुल बिगड़ चुका था.

यशवंत और अग्रवाल्‍स के बीच दूसरी कंट्रोवर्सी उस समय उत्‍पन्‍न हुई जब सचिन अग्रवाल की पत्‍नी शिखा अग्रवाल ने ज्‍यादा पैसा लेकर कम आउटपुट देने वालों को एजेंसी से बाहर निकालने को कहा. इसमें सबसे पहला नाम आया यशवंत देशमुख की खासमखास एवं वर्टिकल स्‍टोरी एडिटर अंशु शर्मा एवं उनकी टीम का. अग्रवाल्‍स का कहना था कि सेलरी के हिसाब से इनका आउटपुट काफी कम है अत: इन्‍हें बाहर किया जाना चाहिए. पर यशवंत देशमुख नहीं माने, जिससे इनके बीच की दूरी और अधिक बढ़ गई. इसके बाद 19 एवं 20 जुलाई को दोनों पार्टनरों के बीच टकरार हुई. इसके बाद से ही अग्रवाल्‍स ने इनवेस्‍ट करने से इनकार कर दिया तथा ऑफिस आना भी बंद कर दिया.

खबर है कि इसके बाद से ही कर्मचारियों को सेलरी के लाले पड़ गए. तमाम ब्‍यूरो बंद हो गए. एक दिन में 70 से 80 स्‍टोरियां करने वाला सीवीबी न्‍यूज अब मुश्किल से 25 स्‍टोरी कर पा रहा है. जुलाई के बाद से कई कर्मचारी खुद छोड़कर चले गया या उन्‍हें निकाल दिया गया. प्रसेन्‍नजीत डे, उमेश चतुर्वेदी, आशुतोष पांडेय जैसे लोगों ने छोड़ दिया या तो निकाल दिए गए. अब भी दर्जनों मीडियाकर्मी सीवीबी न्‍यूज में अपनी सेलरी को लेकर चिंतित हैं. ये लोग जब अपने वरिष्ठों से अपनी सेलरी के बारे में पूछते हैं तो इन्हें जवाब में डांट मिलती है या फिर चुप्पी.

सीवीबी का भविष्‍य तो नजर नहीं आ रहा परन्‍तु सेलरी न मिलने से तमाम जूनियर पत्रकारों ने भी कार्यालय आना बंद कर रखा है. उनका कहना है कि अब उनके पास कार्यालय आने तक के लिए पैसे नहीं हैं. प्रबंधन किसी तरह इंटर्नों का जुगाड़ करके अपनी गाड़ी खींच रहा है. यानी कुछ लोगों की फितरत और महत्‍वाकांक्षा ने सैकड़ों पत्रकारों को बेरोजगार करके रख दिया है. मजेदार यह कि यशवंत देशमुख ने इस टीवी न्यूज एजेंसी का संपादक ऐसे आदमी को बना दिया है जिसका रिकार्ड रहा है कि वह जहां रहा, वहां चीजें गड़बड़ ही हुईं, बेहतर नहीं हुईं.

सीएनईबी से हटने के बाद प्रदीप सिंह ने यशवंत देशमुख का जो साथ पकड़ा तो फिर अभी तक पकड़े रहे. प्रिंट के पत्रकार रहे प्रदीप सिंह अपने बड़े बड़े संपर्कों और संकटमोचन रूप के लिए जाने जाते हैं. पर उनका संकटमोचक व्यक्तित्व यशवंत देशमुख की कंपनी के संकट को खत्म नहीं कर सका. लाखों रुपये सेलरी लेने वाले प्रदीप सिंह को यशवंत देशमुख ने गले से लगा रखा है जबकि कंपनी लगातार डूब रही है पर कुछ हजार रुपये पाने वाले पत्रकारों की छंटनी पैसे न होने और पार्टनर के भाग जाने के नाम पर की जा रही है. इस अन्याय का सजा वक्त जरूर देगा क्योंकि उपर वाले के यहां देर जरूर है, अंधेर नहीं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. पत्रकार ने नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. अगर किसी को उपरोक्त तथ्यों, जानकारियों में कमी-बेसी दिखे-लगे तो अपनी आपत्ति नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए दाखिल कर सकता है या फिर This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर मेल कर सकता है. आप अगर किसी कंपनी के अंदर के हालात के बारे में गोपनीय सूचना देना चाहते हैं तो भी आप This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it का सहारा ले सकते हैं. जानकारी देने वालों के नाम-पहचान का खुलासा कभी नहीं किया जाएगा, यह वादा है. भड़ास की कोशिश ट्रांसपैरेंसी की है. अंदर के खदबदाते हालात-हलचलों को बाहर लाने की है. ताकि खाने और दिखाने के दांत लोग अलग-अलग और ठीक-ठीक देख परख सकें.


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