पहले अपने गिरेबान में देखें शोषण करने वाले ये अखबार

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आजकल मीडिया जगत के कई अखबारों में न्यूनतम वेतनमान के नाम पर कई विभागों एवं कंपनियों के खिलाफ काफी कुछ लिखा जाता है. छापा जाता है कि मजदूरों का शोषण किया जा रहा है, और भी ना जाने क्‍या-क्‍या? पर क्‍या अखबारों में नौकरी करने वाले लोगों को न्यूनतम वेतनमान मिलता है? शायद ज्‍यादातर अखबारों में हालत कमोवेश एक जैसा ही है. सभी जगह जिला स्‍तरीय पत्रकारों और स्ट्रिंगरों को न्‍यूनतम वेतनमान तक नहीं दिया जाता है.

क्या शोषण के नाम पर लम्‍बा चौड़ा भाषण छापने वाले अखबार अपने कर्मचारियों का शोषण नहीं करते हैं? हिन्दुस्तान की ही बात करें तो उत्तराखण्ड के गढ़वाल के जिलों में जो संवाददाता कार्यरत हैं, उन्हें अभी भी 1500 से 2500 रुपये में कार्य करना पड़ रहा है. हिन्दुस्तान ही नहीं दैनिक जागरण सहित तमाम अखबारों में कार्यरत रिपोर्टरों को इसी के आसपास मानदेय दिया जाता है. कहीं कहीं तो इससे भी कम.

जागरण में कार्यरत कई ऐसे रिपोर्टर हैं, जिन पर त्यौहारों पर  भी विज्ञापन लाने के लिए दबाव डाला जाता है, लेकिन उनके वेतन के बारे में कभी नहीं सोचा जाता है.  उन्‍हें न्‍यूनतम वेतन तक उपलब्‍ध नहीं कराया जाता है. जागरण के लिए काम करने वालों को तो कहीं कहीं पांच सौ रुपये ही मिलते हैं. आखिर कब तक अखबार और बड़े मीडिया हाउस अपने संवाददाताओं का शोषण करते रहेंगे?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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