होली के रंग संपादकों के संग

E-mail Print PDF

सब के मन पर छा रहा, होली का उल्लास            
चलिए आज निकाल लें, मन की सभी भड़ास
मन की सभी भड़ास, सांस को तनिक थामना
कुछ सम्पादक गण से होगा आज सामना
बाहर से तो दिखते सब सम्पादक पूरे
मगर असलियत में हैं सारे मित्र जमूरे।

नवभारत टाइम्स में, बैठे राम कृपाल
होली है मत पूछना, इन से आज सवाल
इन से आज सवाल, ठेठ ठाकुर हैं भाई
किसी विषय पर कभी न इन्‍होंने कलम चलाई
सम्पादक कम मगर अधिक हैं आप जुगाड़ू
प्रबंधक यदि कहें लगा सकते हैं झाड़ू।

चलिए हिन्दुस्तान में, शशि शेखर के पास
लिखते जैसे छीलते कहीं खेत में घास
कहीं खेत में घास, कलम है इनकी खुर्पा
देश विदेश घूमने का है खूब तजुर्बा
होली पर सज कर बैठे जैसे दुलहनिया
इनके आगे पत्रकार भरते हैं पनिया।

चलो नई दुनिया चलें दूर करें सब शोक
यहां मिलेंगे आप को मेहता जी आलोक
मेहता जी आलोक खूब टिप टाप मिलेंगे
हंसते हुए दिखेंगे जब भी आप मिलेंगे
छजलानी के मन की मित्र इन्हें करनी है
कंग्रेस की सदा चिलम इनको भरनी है।

चलिए होली होली खेलने जनसत्ता के संग
ओम थानवी घोटते ले कर मूसल भंग
ले कर मूसल भंग रंग कुछ नही जम रहा
मन में जो आक्रोश नहीं वह आज थम रहा
इन्हें न चिंता चले ना चले यह जनसत्ता
रहे सलामत केवल अपना वेतन भत्ता।

होली का त्यौहार है ना आता यह रोज
कुछ सम्पादक गुमशुदा कर लें उनकी खोज
कर लें उन की खोज कहां खो गए बनवारी
अच्युतानंद मिश्रा पर छाई है बेकारी
विष्‍णु खरे न जाने फिरते कहां झूमते
खोजो उन सब को जो हैं बेकार घूमते।

डॉ. महर उद्दीन खां

This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it

बुरा न मानो होली है.


AddThis