सुनील दुबे के खास बनने वाले पत्रकारों ने गिरगिट की तरह बदला रंग

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विनायक विजेतामैं बचपन से ही सुना करता आया हूं कि गिरगिट रंग बदलता है, हालांकि कभी इसे देख नहीं सका। पर इंसान कैसे रंग बदलते हैं इसका एहसास मुझे तब हुआ जब बीते शुक्रवार को पटना हिन्दुस्तान के तीन बार संपादक रह चुके सुनील दुबे जी को अचानक ब्रेन स्‍ट्रोक का सामना करना पड़ा। रात 11 बजे सुनील दुबे जी को ब्रेन स्‍ट्रोक लगने की खबर पटना के वे सारे पत्रकार आधी रात में ही मगध अस्पताल की ओर दौड़ पडे़ जिन्होंने सुनील दुबे जी से कुछ सीखा था या जिनमें सुनील दुबे जी के प्रति श्रद्वा है।

शुक्रवार की रात 12 बजे से लेकर शनिवार को दोपहर डेढ़ बजे तक सुनील दुबे जी पटना के अस्पताल में रहे पर आश्चर्य तब हुआ कि कुछ वैसे लोगों ने उनका हालचाल भी फोन पर नहीं पूछा जिनपर सुनील दुबे के कई एहसान रहे हैं। मुझे याद है जब मैं पटना हिन्दुस्तान में कार्यरत था और सुनील दुबे संपादक हुआ करते थे। सुनील दुबे के छोटे भाई सुशील दुबे भी तब यहीं पदस्थापित थे और लोकल डेस्क इंचार्ज थे। जबतक सुनील दुबे यहां संपादक रहे तब लोकल डेस्‍क पर ही कार्यरत एक साथी अपने पड़ोसी सुशील दुबे को अपनी गाड़ी से ही साथ लाते और घर तक ले जाते। यहां तक कि रात का खाना भी दोनों साथ ही साथ खाते थे। कार्यालय के लोग दोनों को दो जिस्‍म पर एक जान मानते थे। पर सुनील दूबे को यहां से जाते ही माजरा बदल गया। साथ खाने की तो क्या साथ लाने और ले जाने की भी बात बदल गई।

इसी तरह वर्षों से जमे एक डीएनई सुनील दुबे जी के आगे पीछे यूं करते मानो वे उनके सबसे बडे़ शुभचिन्तक और हिमायती हों। मुझे याद है सुनील दुबे के कार्यकाल में जब इनके पिता की पटना के एक निजी नर्सिंग होम में मौत हुई थी तो सुनील दुबे ने उनकी मदद में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा था, पर ऐसे लोगों सहित कुछ अन्य लोगों ने दिखा दिया कि गिरगिट और उनमें कोई फर्क नहीं। उनका किसी इंसान और काम से प्यार नहीं बल्कि वक्त से प्यार है।

ताज्जुब के साथ ऐसे लोगों से घृणा तो तब हुई जब अचेतन स्थिति में अस्पताल में पडे़ सुनील दूबे जी की सुध लेने की कोशिश भी ऐसे लोगो ने नहीं की, जिन पर दूबे जी के कई एहसान लदे पडे़ हैं। ‘हिन्दुस्तान’ के वाइस प्रेसीडेंट वाईसी अग्रवाल, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और आपरेशन हेड संजय शुक्ला शनिवार की सुबह अस्पताल पहुंचकर यह एहसास कराया कि हिन्दुस्तान के पूर्व संपादक से उनका व्यक्तिगत और भावात्मक लगाव अब भी कायम है। इन लोगों ने तो दूबे जी के इलाज में किसी तरह की कोताही न बरतने और किसी भी जरूरत को पूरा करने की बात कह कर अस्पताल में मौजूद लोगों का साहस बढ़ाया। जब सुनील दुबे जी को स्‍ट्रोक पड़ा तो उनके नजदीकी और परिवार के नाम पर बस उनकी कपड़ों से भरी एक अटैची और मोबाइल था। ऐसे में उनका परिवार वही पत्रकार समुदाय था, जिन्होंने दुबे जी से कुछ सीखा था।

ऐसे समय में सन्मार्ग, प्रत्युष, नव बिहार, प्रभात खबर और हिन्दुस्तान की एक टीम ने अपना फर्ज पूरा किया और दुबे जी को यह कतई एहसास नहीं होने दिया कि उनका परिवार उनके साथ नहीं है। जी न्‍यूज के ब्‍यूरोचीफ श्रीकांत प्रत्युष, नवबिहार के संपादक सोमनाथ पांडेय और एचआर हेड सुश्री लक्ष्मी सहित कुछ पत्रकारों ने सुनील दूबे के प्रति ऐसा फर्ज निभाया, जिसने एक मिसाल तो कायम की ही, वक्त के यारों को एक सबक भी दिया। पटना एयर पोर्ट पर एयर एम्बुलेंस में दिल्ली जाने के पूर्व जब हिन्दुस्तान के पूर्व ब्यूरो चीफ अरुण अशेष का हाथ पकड़ सुनील दूबे जी ने कहा कि ‘मैं अप्रैल में ही वापस पटना आउंगा’ तो वहां मौजूद हर पत्रकार की आंखें भर आईं। आत्मविश्वास से लबरेज और गजब का विल पावर रखने वाले सुनील दुबे के प्रति हर पत्रकार ने यही कामना की है कि वह जल्दी ही स्वस्थ होकर पटना लौटें।

लेखक विनायक विजेता हिन्दुस्तान, पटना में सीनियर कापी एडिटर रह चुके हैं.


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