इस 'नत्था' का तो पूरा खानदान जहर खाकर मर गया

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एक पुरानी तस्वीर में अपनी बहनों व मां के साथ सुनील : शासन-प्रशासन को था मौत का इंतजार... रीयल लाइफ की नत्था जैसी स्टोरी में नहीं बच सका कुछ... नत्था जैसे सभी किरदार भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ गए : छत्तीसगढ़ के भिलाई में शासन और प्रशासन कुछ लोगों के मौत का इंतजार करता रहा.. जिन्होंने कुछ दिन पहले अपने-आप को कमरे में कैद कर मौत को गले लगाने का फरमान जारी किया था..

लेकिन मौत के इस फरमान के बाद न प्रशासन जगा.. न वे लोग जागे जिनकी वजह से इन सभी को आत्मघाती कदम उठाना पड़ा.. मीडिया में यह खबर लगातार सुर्खियों में बनी रही.. लेकिन शासन और प्रशासन में बैठे लोग इसे ब्लैकमेलिंग का नाम देते रहे.. तो कोई अपनी मांग मनवाने का नया तरीका.. दरअसल भिलाई में नौकरी न मिलने से परेशान एक परिवार के पांच सदस्‍यों ने जहर खा लिया.. जहर खाने से परिवार के चार सदस्‍यों की तो मौके पर मौत हो गई जबकि एक जिदंगी और मौत के बीच संघर्ष करता रहा. मरने वालों में मां और तीन बेटियां शामिल हैं.. तीनों बेटियों ने मरने से पहले सुसाइड नोट भी लिखा है जिसमें उन्होंने सेल की भिलाई स्टील प्लांट के अधिकारियों को उनकी मौत का जिम्मेदार बताया है. सुसाइट नोट मिलने के बाद भी बीएसपी के अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा जा रहा है.

वहीं सल्फास खाकर परिवार के चार सदस्यों द्वारा जान देने की घटना में पुलिस प्रशासन और बीएसपी प्रबंधन के साथ सांसद सरोज पांडेय पर भी अंगुली उठ रही है. मां और तीन बहनों की चिता देखते ही बेरोजगार सुनील गुप्ता पूरी तरह बिफर उठा. रोते-बिलखते सुनील ने कहा कि उसने सांसद से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की थी, पर उन्हें शायद मेरे परिवार से ज्यादा हेमा मालिनी के प्रस्तावित कार्यक्रम की चिंता थी. उधर, कलेक्टर ठाकुर राम सिंह ने जांच का जिम्मा एडीएम को सौंप दिया है, लेकिन अब तक सिर्फ अधिकारियों की मीटिंग का ही दौर चल रहा है. जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है. दाह संस्कार के दौरान सुनील की बातें सुन हर कोई गमगीन हो गया. सुनील ने बताया कि सरोज पांडेय अगर उससे मिलतीं तो परिवार के सदस्य आत्मघाती कदम नहीं उठाते और शायद उसे नौकरी भी मिल जाती.

सुनील ने उसके मामले की जानकारी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के भाई नरेंद्र को देने की प्रशासन से अपील की है. उसने बताया कि नरेंद्र उसका दोस्त है और दोनों रांची में एक साथ पढ़े हैं. अगर नरेंद्र को पता चलेगा कि मैं मुसीबत में हूं तो वह मदद के लिए जरूर आएगा. वहीं परिवार के इस फैसले से आस-पास के इलाकों में सनसनी फैली गई है. वहीं इस हादसे में अब राजनैतिक जामा पहन लिया है. परिवार के पांच लोगों ने पिछले कुछ दिनों से खुद को घर में कैद रखा था. इलाकाई लोगों का कहना है कि यह परिवार पिछले 17 सालों से मृतक आश्रित पर नियुक्‍ति का इंतजार कर र‍हा था. परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी और नौकरी न मिलने के कारण सभी निराश थे. नौकरी नहीं मिल रही थी तो परिवार सिर्फ सरकारी घर में रहना चाह रहा था. लेकिन बीएसपी ने मकान खाली कराने को लेकर घर की बिजली और पानी की सप्लाई रोक दी. परिवार ने पहले भी इस बात की चेतावनी दे दी थी कि अगर उनकी मांगों पर कोई उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वह सामूहिक आत्‍मदाह कर लेंगे.

भिलाई स्‍टील प्‍लांट के कर्मचारी रहे सुनील के पिता का निधन 3 दिसम्‍बर 1994 को हो गया था. उसके बाद से सुनील अनुकम्‍पा नियुक्ति के लिये चक्‍कर लगा रहा था लेकिन उसे नियुक्‍त नहीं किया गया. इसके बाद पूरे परिवार को सरकारी आवास भी छिन जाने का डर सता रहा था. इसकी साजिश बीएसपी के तोड़ूदस्ते ने रच डाली थी. ऐसे में सुनील ने खुद और परिवार के बाकी चार सदस्यों को अपने ही घर में कैद कर लेने का फैसला किया. इस परिवार के सभी पांच सदस्य पिछले चार दिनों से इसी सरकारी क्वार्टर में कैद थे और सुनवाई न होने पर आत्मदाह की धमकी दे रहे थे. खुद को कैद करने के बाद भी प्‍लांट के अधिकारियों पर कोई फर्क न पड़ा तो पूरे परिवार ने जहर खाकर जान देने की योजना बनाई और खाने में जहर मिलाकर सबने एक साथ खा लिया. मां सहित तीनों बेटियों की तो मौके पर मौत हो गई मगर सुनील को लोगों ने अस्‍पताल में भर्ती कराया जहां उसकी हालत नाजुक बनी हुई है.

इस घटना के कुछ दिन पहले सुनील की एक बहन गरीबी से तंग आकर पहले ही सुसाइड कर चुकी थी. वहीं अब इस हादसे ने राजनैतिक रंग धारण कर लिया है. बीजेपी के मुताबिक ये एक बेहद गंभीर मामला है. परिवार ने जब खुद को घर में कैद कर लिया था तभी पुलिस और प्रशासन को हरकत में आ जाना चाहिए था और उनकी समस्या के निदान के लिए कार्रवाई करनी चाहिए थी. उधर स्टील आरके गांधीप्लांट के कर्मचारी नेता भी इस मामले को बेहद गंभीर बता रहे हैं और उनका कहना है कि इस हादसे के लिए भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन सीधे-सीधे ज़िम्मेदार है. लेकिन इस पूरे मामले में शायद सभी को इनकी मौत का इंतजार था और इस अनहोनी के बाद शासन-प्रशासन एक-दूसरे पर इसकी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

लेखक आरके गांधी रायपुर में पत्रकार हैं.


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