बीते तीन साल तीन माह, पता नहीं कहां है भास्कर का पत्रकार विकास

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विकास दैनिक भास्कर समाचार पत्र में काम करने वाले पत्रकार विकास शर्मा उर्फ विक्की का तीन साल और तीन महीने गुजर जाने के बाद भी कुछ पता नहीं चल पाया है। उसके घरवाले आज भी इस आस में जिंदगी की गाड़ी को आगे धकेल रहे हैं कि एक न एक दिन उनका विक्की घर जरूर लौट आएगा। बेटे के इस तरह अचानक घर से चले जाने का सदमा विकास के पिता राजकुमार भारद्वाज नहीं सह सके और 7 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया।

बेटे के लापता हो जाने और घर के मुखिया का साया सिर से छिन जाने के गम ने मां सरिता भारद्वाज और विकास की पत्नी श्वेता भारद्वाज को झकझोर कर रख दिया। बेटे के सही सलामत होने की आस दिल में लिए घरवालों ने ऐसा कोई ज्योतिषी या सियाना नहीं छोड़ा, जिसके पास वह नहीं गए हों, लेकिन हर जगह से मायूसी ही हाथ लगी। आज भी बेटे के बारे में बात करते हुए मां सरिता भारद्वाज की आंखें नम हो जाती हैं। उनका कहना है कि पता नहीं किस्मत उनके साथ यह कैसा खेल खेल रही है। उनका हंसता-खेलता परिवार था, पता नहीं इसे किसकी नजर लग गई। विकास की मां और पत्नी हाल बाजार के बाहर स्थित पिंक प्लाजा में बूटों की दुकान चलाकर घर का गुजारा चला रहे हैं। दोनों की आंखें हर समय विक्की को तलाशती रहती हैं।

अतीत की यादों को ताजा करते हुए सरिता भारद्वाज बताती हैं कि उन्हें आज भी याद है कि 25 दिसंबर 2007 का वो मनहूस दिन। विकास घर में लेटा हुआ था। मैंने पूछा कि क्या बात है विक्की ऐसे चुपचाप क्यों लेटा हुआ है। जवाब में उसने कहा कि मां मैं थोड़ी ही देर में दुकान खोलने के लिए जा रहा हूं। उसने दुकान की चाबियां लीं और तैयार होकर घर से निकल गया। उसके बाद आज तक उसका कुछ पता नहीं चला कि वह कहां है, किस हाल में है। विक्की के लापता होने का पता घर वालों को तब चला जब उसी दिन दोपहर का खाना लेकर एक रिश्तेदार पिंक प्लाजा स्थित दुकान पर पहुंचा। दुकान का शटर बंद था। आस-पड़ोस के दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि विक्की तो आज दुकान पर आया ही नहीं। सुबह से ही दुकान बंद पड़ी है।

इस बात का पता चलने पर घरवाले चिंता में डूब गए। उन्होंने जान-पहचान और रिश्तेदारों के यहां पता किया, लेकिन विक्की का कुछ पता नहीं चल सका। सरिता भारद्वाज ने बताया कि अक्तूबर 2006 में दैनिक भास्कर समाचार पत्र जब अमृतसर में लांच हुआ तो उनके बेटे को वहां पत्रकार की नौकरी मिल गई। विक्की काम में काफी होशियार और मेहनती था। सबकुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन किसी खबर को लेकर आफिस में सीनियर अधिकारी से विकास की तकरार हो गई। अधिकारी ने इस बात को प्रेसटीज इशू बना लिया। इसी के चलते उस अधिकारी ने विकास को अक्तूबर 2007 में नौकरी से निकलवा दिया। विकास ने उस अधिकारी की कई मिन्नतें की, लेकिन उसने उसकी एक न सुनी। नौकरी बचाने की आस लिए वह जालंधर में समाचार पत्र के स्थानीय संपादक से भी मिला, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

अब नौकरी हाथ से जा चुकी थी, इस बात ने विकास को अंदर ही अंदर परेशान करना शुरू कर दिया। वह चुपचाप रहने लगा। घर पर भी विकास ज्यादा किसी से बात नहीं करता। नौकरी चले जाने का गम उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा। समय व्यतीत करने के लिए विकास पिंक प्लाजा स्थित दुकान पर बैठने लगा, लेकिन नौकरी हाथ से निकल जाने की बात को वह पूरी तरह भूल नहीं पाया। एक दिन पिंक प्लाजा स्थित दुकान पर एक व्यक्ति आया और उसने विकास को अपना नाम पंकज सिंह बताया। उस व्यक्ति का कहना था कि उसकी 'संडे न्यूज' नाम की अंग्रेजी में अखबार है और वह उसके लिए काम कर सकता है। इस पर विकास ने उस व्यक्ति की बात मान ली क्योंकि उसमें लिखने का जुनून था। विकास ने दो महीने उस अखबार में काम किया, लेकिन उसे वो कामयाबी नहीं मिली जिसकी वह आस लगाए बैठा था। फिर एक दिन ऐसा आया कि विकास घर से दुकान पर जाने के लिए निकला और कभी वापिस नहीं लौटा।

मां सरिता भारद्वाज आज भी वो दिन याद करती हैं तो रोने लग जाती हैं। बेटे के अचानक घर से चले जाने के गम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया है। श्वेता भारद्वाज की आंखें भी पति को एक नजर देखने के लिए तरस गई हैं। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2008 में एक दिन 0172-5069031 नंबर से फोन आया। फोन करने वाले ने पूछने पर बताया कि वह चंडीगढ़ से बोल रहा है। विकास के पापा कहां हैं, उनके क्रेडिट कार्ड की समयावधि खत्म हो चुकी है, इसलिए वे उसे रिन्यू करवा लें। बकौल सरिता भारद्वाज, उसी दिन शाम चार बजे अमृतसर में ही रहते उनके एक पहचान वाले के घर भी उसी नंबर से फोन आया। अबकी बार फोन करने वाले ने पूछा कि वो जो पिंक प्लाजा में दुकान करते हैं, उनका कैसा हाल है।

सरिता भारद्वाज का कहना है कि यह फोन विकास ने ही किया या करवाया। क्योंकि उनके पति के क्रेडिट कार्ड की समयावधि खत्म होने की बात सिर्फ उनके बेटे को ही पता थी। इसके बाद न तो कभी कोई फोन आया और न ही बेटे की कोई खबर मिली। वह आज भी इसी उम्मीद के सहारा जी रहे हैं कि एक न एक दिन उनका बेटा घर लौट आएगा। उन्होंने बताया कि उनके पति राजकुमार भारद्वाज ने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना कोतवाली में भी दर्ज करवाई, लेकिन पुलिस विकास का कोई पता नहीं लगा सकी। वह तत्कालीन एसएसपी कुंवर विजय प्रताप सिंह से भी मिले और बेटे को ढूंढने की गुहार लगाई। एसएसपी ने निचले अधिकारियों को इस बाबत जरूरी कदम उठाने के निर्देश भी दिए, पर विकास की कोई खबर नहीं मिली।


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