जागरण में ये भी होने लगा, डीएनई की जान लेने की कोशिश

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विनोद भारद्वाजपिछले चौबीस सालों से दैनिक जागरण, आगरा के साथ जुड़े रहे डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर विनोद भारद्वाज को भरे मन से अखबार से इस्‍तीफा देना पड़ा. लगभग ढाई दशकों के सेवा का जागरण प्रबंधन ने ये सिला दिया. कार्यालयी षणयंत्र में उनकी जान लेने तक की कोशिश भी की गई. प्रबंधन ने इस मामले में जांच तक कराने की जहमत नहीं उठाई. विनोद ने प्रबंधन पर पूरा साजिश रचने का आरोप लगाया है.

विनोद भारद्वाज सन 87 से जागरण, आगरा के हिस्‍से हैं. असिस्‍टेंट रिपोर्टर रहे, चीफ रिपोर्टर रहे, एडिटोरियल इंचार्ज रहे, इन दिनों डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर थे. पिछले दिनों इनके पैर का ऑपरेशन होना था. तभी इनके एक सहयोगी का परिचित डॉक्‍टर कार्यालय में आकर उन्‍हें दवा दी थी. ये डॉक्‍टर बिना बुलाए उनके पास पहुंच गया था. मना करने के बावजूद उन्‍हें कनवींस करके दवा खाने को दिया.  जिसको खाने के बाद इनकी हालत खराब हो गई. बाद में आगरा के डाक्‍टरों ने काफी प्रयास के बाद इनकी स्थिति को ठीक किया था.

इन्‍होंने इसकी जानकारी ऊपर से लेकर नीचे तक के लोगों को दिया परन्‍तु कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. आरई से लेकर डाइरेक्‍टर तक को पूरे मामले की जानकारी दी परन्‍तु वहां से कोई दिलचस्‍पी नहीं ली गई. जिसके बाद इन्‍होंने प्रबंधन को इस्‍तीफा दे‍ दिया. प्रबंधन ने दरियादिली दिखाते हुए नियम से हटकर तीन माह की सेलरी के साथ इनको विदा कर दिया.

विनोद ने बताया कि मैं पिछले चौबीस सालों से दैनिक जागरण, आगरा को अपनी सेवाएं दे रहा था. प्रबंधन मुझसे काफी पहले से ही रंजिश रखता था. सन 98 में जागरण, आगरा में हुए नौ दिनों के हड़ताल का नेतृत्‍व मैंने ही किया था, तभी से प्रबंधन मुझे चिढ़ा हुआ था. उसी दौरान एक व्‍यक्ति को मैंने ट्रेनी बनवाया. रिपोर्टर बनवाया, चीफ रिपोर्टर बनवाया पर उस बंदे ने महत्‍वाकांक्षा दिखाते हुए मेरे खिलाफ ही साजिश शुरू कर दी. कई गलत-सही काम भी करने शुरू कर दिए.

विनोद ने बताया कि उसके बाद मैंने उस शख्‍स की शिकायत डाइरेक्‍टर से की. उसके उल्‍टे-सीधे कामों से प्रबंधन को प्रूफ के साथ अवगत कराया. जिसके बाद 2009 में उसका तबादला कर दिया गया. इसके बाद मेरे उसके खुले पंगे शुरू हो गए. मैं उसे किसी कीमत पर आगरा आने नहीं देना चाहता था. परन्‍तु विष्‍णु त्रिपाठी एंड कंपनी की मद्द से उसने अपनी वापसी की राह तैयार की. डाइरेक्‍टर ने भी मुझे समझाया कि अब वो गड़बडियां नहीं करेगा. जिसके बाद मैं भी तैयार हो गया.

विनोद ने बताया कि इसी बीच मुझे घुटने में चोट लगी थी, जिसका ऑपरेशन दिल्‍ली में कराना था. मैं एक दो दिनों में जाने की तैयारी कर ही रहा था कि जागरण कार्यालय में एक डॉक्‍टर राज परमार प्रकट हो गया, इस डॉक्‍टर से उसी शख्‍स ने परिचय कराया था. इस डॉक्‍टर को मैंने नहीं बुलाया था, लेकिन ये प्‍लांड वे में प्रकट हो गया था. ये होमियोपैथी तथा एक्‍यूप्रेशर का डाक्‍टर है. वो मुझे मेरी चोट के बारे में कनविंस करने लगा.

उन्‍होंने बताया कि वह डाक्‍टर बिना मेरे बुलाए मेरी चोट को अपनी दवा से ठीक करने का दावा करने लगा. जब मैंने उसे मना किया कि मुझे तुम्‍हारी दवाई की जरूरत नहीं है, ऑपरेशन कराने जा रहा हूं. उस डाक्‍टर मुझसे कहा कि आप एक बार ये दवा ले लीजिए ठीक हो जाएगा. ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर नहीं ठीक हुआ तो आप ऑपरेशन करा लीजिएगा. जबरिया दवा वहीं छोड़ गया. इस दौरान कार्यालय के मेरे कई साथी भी मौजूद थे.

उन्‍होंने बताया कि इतना कनवींस होने के बाद मुझे लगा चलो दवा खाकर देखते हैं. मैंने 31 जुलाई 2010 को इस दवा की पहली डोज खाई. बीस-पचीस मिनट बाद ही मुझे चक्‍कर और बेहोशी छाने लगी. जब मैंने उक्‍त डॉक्‍टर को फोन करके बताया तो उसने इधर-उधर की बातें शुरू कर दी और कहा कि मैं सिम्‍टम समझ नहीं पा रहा हूं. इसके बाद मेरी तबीयत ज्‍यादा खराब हो गई. बेचैनी और बेहोशी बढ़ने पर मेरे घर वाले मुझे जीजी नर्सिंग होम ले गए.

विनोद ने बताया कि मेरी हालत देखकर डॉक्‍टर भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे. दवा दी गई, कई टेस्‍ट कराए गए. डॉक्‍टरों ने कहा कि आपकी स्थिति तो ऐसी हो गई है कि कभी भी ब्रेन हेमरेज या हार्ट अटैक की नौबत सकती थी. जब तबीयत नार्मल होने के बाद ऑपरेशन कराने वाले डॉक्‍टर के पास गया तो उन्‍होंने कहा कि पहले उन डॉक्‍टरों से चेक अप करा आओ,  जिन्‍होंने तुम्‍हारा इलाज किया था. और वहां से रिपोर्ट लेकर आओ, उसके बाद ऑपरेशन करने की स्थिति देखी जाएगी.

उन्‍होंने बताया कि मैं जीजी नर्सिंग होम के उस डॉक्‍टर के पास पहुंचा, जिन्‍होंने मेरा इलाज किया था. उनसे जब बीमारी और उसके कारण के बारे में जानने की कोशिश की तो उन्‍होंने बीमारी तो नहीं बताया परन्‍तु यह जरूर बताया कि आपकी स्थिति ऐसी हो गई थी, जैसे आपने अफीम, चरस, गांजा एक साथ ले ली हो. मैंने कहा कि मैं तो ऐसा कोई नशा करता नहीं, तो उन्‍होंने कहा कि भले ही नशा न करते हों परन्‍तु उस समय टेस्‍ट सिम्‍टम में यही आया था. इसके बाद मेरे माथा ठनक गया क्‍योंकि मैंने उस डॉक्‍टर के दवा के अलावा कुछ भी नहीं लिया था.

विनोद ने बताया कि उसके बाद मैंने इस दवा की जांच करवाने की सोची. फोरेंसिक लेबोरेटरी में अपने कुछ परिचितों से कहा तो उन्‍होंने कहा कि हम इसकी जांच तो कर सकते हैं परन्‍तु आपको कोई लिखित रिपोर्ट नहीं दे पाएंगे. मुझे भी इससे फर्क नहीं पड़ता था. मुझे तो बस उस दवा के बारे में जानना था, लिहाजा मैं तैयार हो गया. जांच में यह सामने आया कि इसमें एक्‍यूप नारकोटिक्‍स ड्रग्‍स है. मैं यह जानकर हक्‍का-बक्‍का रह गया. मैंने इसके बाद पुलिस को शिकायत देकर पूरे मामले की छानबीन कराने का निवेदन किया.

उन्‍होंने बताया कि लेकिन पुलिस ने इस मामले में कोई दिलचस्‍पी नहीं दिखाई. बाद में पता चला कि प्रबंधन के दबाव के चलते ऐसा हो रहा है. इसकी शिकायत लेकर मैं लखनऊ में डीजीपी से मिला. उन्‍हें पूरी बात सुनाई. उन्‍होंने मामले को संज्ञान में लेते हुए इस मामले को एसटीएफ को सौंपने का निर्देश एसटीएफ के आईजी सुवेश कुमार सिंह को दिया तथा पूरी जांच कराने को कहा. उन्‍होंने कहा कि यह जांच लखनऊ से ही खुलवाता हूं. मैं आगरा आ गया परन्‍तु दस-बारह दिन तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

उन्‍होंने बताया‍ कि जब फिर मैंने डीजीपी से बात की तो कुछ दिन बाद एसटीएफ, लखनऊ के सीओ नित्‍यानंद राय आए.  पर उन्‍होंने इस जांच में बहुत ज्‍यादा दिलचस्‍पी नहीं दिखाई. बहुत मुश्किल से उनसे बात हो पाई. फिर काफी दिनों तक कुछ नहीं हुआ. यह बात फिर जब मैंने डीजीपी को बताई तो उन्‍होंने मुझे तथा सीओ को अपने ऑफिस में बुलाया. इसके बाद सीओ ने मुझसे चिकनी चुपड़ी बातें करके जल्‍द जांच करने की बात कही थी, परन्‍तु अब तक कुछ नहीं हुआ.

विनोद ने बताया‍ कि एसटीएफ को जांच 18 नवम्‍बर 2010 को सौंपी गई थी. लेकिन उसमें वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई है. जबकि डाक्‍टर के दवा देने के दौरान मौजूद लोगों से मैंने एसटीएफ को एफीडेविट भी दिलवा दिया बावजूद इसके जांच आगे नहीं बढ़ सकी. इस बीच मुझे पता चला कि आगरा के एसएसपी रह चुके सुवेश कुमार सिंह से प्रबंधन के मधुर संबंध हैं, जिनके चलते यह मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है. यह बात मैंने डीजीपी को भी बताई तो उन्‍होंने पूरे मामले को अपने स्‍तर से दिखवाने का आश्‍वासन दिया.

उन्‍होंने बताया कि इस बीच मैंने 18 फरवरी को जीएम को सभी बात स्‍पष्‍ट करते हुए इस्‍तीफा लिखकर दे दिया. मैंने अपने इस्‍तीफे में लिखा कि कार्यालय में हो रहे आपराधिक षणयंत्रों के चलते स्‍वस्‍थ तन-मन से काम कर पाना संभव नहीं है. महसूस करता हूं कि प्रबंधन द्वारा मेरे साथ छल किया गया है, इसलिए इस नोटिस को संज्ञान में लेते हुए मुझे अप्रैल में मुक्‍त कर दिया जाए. जिसके बाद प्रबंधन ने मेरा इस्‍तीफा स्‍वीकार क‍र लिया.

विनोद ने बताया कि प्रबंधन मेरा इस्‍तीफा स्‍वीकार करने के लिए इतना तत्‍पर था कि नोटिस मैंने दिया था, परन्‍तु प्रबंधन ने मुझे तीन महीने की सेलरी देकर विदा किया, जबकि ऐसा प्रावधान नहीं था. मेरा इस्‍तीफा स्‍वीकार करने के लिए इसमें बदलाव भी करवाया गया.  जिससे साबित हो रहा है कि सब कुछ प्रबंधतंत्र की जानकारी और शह पर हो रहा था. जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं ताकि मैं इस्‍तीफा दे दूं.

उन्‍होंने बताया कि पूरे घटनाक्रम की जानकारी डाइरेक्‍टर देवेश गुप्‍ता को भी दी. परन्‍तु उन्‍होंने कहा कि जब आपने पुलिस कम्‍पलेन कर दी है तो फिर आपको जो करना था आपने कर दिया है. अब हम इसमें क्‍या कर सकते हैं. ये बात आपको पहले लेकर आनी चाहिए थी. उन्‍होंने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. कई बार आगरा आए परन्‍तु मेरे मामले में बात करना या चर्चा करना भी उन्‍होंने जरूरी नहीं समझा, जिसके बाद मेरे पास इस्‍तीफा के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था.

विनोद ने आरोप लगाया कि मेरी जान लेने की कोशिश में पूरा का पूरा जागरण प्रबंधन इनवाल्‍व था. तभी तो मेरी किसी शिकायत पर ध्‍यान दिए बिना इस तरह का माहौल रचा गया. उन्‍होंने कहा कि अपनी शिकायत में मैंने साजिश रचने वाले का नाम नहीं दिया है ताकि पुलिस खुद पता लगा सके कि मेरी जान लेने की कोशिश करने के पीछे किन लोगों का हाथ था.

आवेदन

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इस्‍तीफा


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