हत्‍यारों को पकड़ने की बजाय वसूली में लगी है गृहमंत्री की टीम

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पत्रकार उमेश राजपूत की हत्‍या के आरोपी तीन माह बाद भी पकड़ा नहीं जा सका। वहीं बिलासपुर के पत्रकार के भी हत्यारे सरे आम घूम रहे है जो कि छ.ग.राज्य में सरकार के नजर में पत्रकारों की औकात बयां कर रही है। कुछ सरकार के चाटूकार पत्रकारों को छोड़ दिया जाय तो पत्रकारों की स्थिति इस राज्य में दयनीय बनी हुई है। जिसका ना प्रेस, वह जिसके लिये कार्य करता है ना सम्पादक, ना सरकार कोई हमदर्द नहीं है।

बस तुम में हौसला है तो जेब में तमंचा लिये खबरें बनाओं। गले में आई कार्ड ताने बंद मुट्ठी लिये घूमते रहो। नहीं तो सरकार की चाटुकारिता या दलाली करो। तब तुम्हें जब गोली लगेगी तो हत्या की जांच कमेटी बनेगी तब शायद हत्यारे गिरफ्त में आ जाएं। रायपुर जिले के छूरा क्षेत्र में विगत तीन माह पूर्व पत्रकार उमेश राजपूत की अज्ञात हत्यारों ने हत्या कर दी। जिससे की क्षेत्र के पत्रकार वर्ग में रोष व्याप्त है। हत्यारों को पकड़ने क्राइम स्‍कार्ट तक आ गई। उनके हाथ भी खाली के खाली रह गये।

आज तक पुलिस के गिरफ्त में हत्यारे का नहीं आना कहीं ना कही राज्य में कानून-व्यवस्था के क्रिया कलाप पर प्रश्न चिन्‍ह अंकित करता है। गृह मंत्री जी के हृदय में प्रजातंत्र के पहरेदारों के लिये कोई जगह शायद नहीं है। इसका परिणाम ही है कि आज तक इसके लिये कोई जांच दल का गठित नही किया गया। ना ही आज तक इस पर कोई पुख्ता काम किया जा रहा है। जिससे की प्रजातंत्र के पहरेदारों को राहत महसूस होती,  लाख दो लाख परिवार को दे देने मात्र से सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। राज्य में दूसरी घटना है जो यह बताती है कि यहां तो गुण्‍डों-बदमाशों का ही राज है, जो छ.ग. की नब्ज से खून का एक एक कतरा चूस लेना चाहते हैं। छ.ग. में तेजी से हत्याओं, लूट, बालात्कार की घटनायें बढ़ रही हैं। और उस पर माशा अल्लाह आपका स्कार्ट।

दूसरी तरफ छूरा क्षेत्र में गृह मंत्री के नाकाबिल सिपाही जो कि लाइन अटैच है,  उनका गृह मंत्री द्वारा लोगों को लूटने के लिये तैयार दस्ता, जिसका नाम  गृहमंत्री देते है एचएम स्‍कार्ट जो घूम-घूम कर मंत्री जी के लिये पैसा इकट्ठा करने का कार्य कर रही है। जो जुआरी तक को पकड़ने व रोकने के लिये सरकारी गोली चलाने तक से बाज नहीं आते। आखिर क्षेत्र में चार-चार क्वालिस पर दो-दो दिन घूमना, पुरूष सिपाही के हिसाब से बराबर गिनती में महिलाओं को ( पुरुष्‍ा के हिसाब से उसी तादाद में महिलाओं को पत्रकार ने गिना यानी आठ-आठ ) साथ में लिये अय्याशी मचाने व शराब खरीदने के लिये पैसों की आवश्‍यकता तो होगी ही ना (शराब खरीदते गरियाबंद के पत्रकारों ने खुद इन्हें देखा)।

छूरा क्षेत्र में जुआडि़यों को एचएम स्कार्ट ने पकड़ा,  जिनके पास से मात्र 65 हजार की राशि पकड़ना बताया, जबकि जितने लोगों को पकड़ा गया, जिन लोगों को पकड़ा गया उन एक-एक के पास तकरीबन 4-4 लाख रुपये थे। तो सवाल यह उठता है कि बाकी पैसे गये कहां। जिनको एचएम र्स्काट ने पकड़ा उनको आखिर स्थानीय पुलिस के हवाले सुबह क्यों किया गया,  रात भर इनको लेकर कहां घूमते रहे गृह मंत्री के दबंग। यह सब सवाल हमारे व क्षेत्र के पत्रकारों के दिमाग में सरकार की छवि व गृह मंत्री जी की कामयाबी का गुणगान करने के लिए काफी है।

हद तो तब हो गई जब इस क्वालिस के काफिले को क्षेत्र में घूमते समय पत्रकारों ने रोका तो वे अपना परिचय बिना बताये चोरो की तरह भाग निकले। क्षेत्र में पुलिस की हालत ऐसी हो गई है,  जैसे एक बहुरिया जिसे पति भी नहीं चाहता ना ही रिश्‍तेदर चाहते हैं। गृहमंत्री जी को अपने ही विभाग के आला अफसरों व पुलिस के जवानों पर विश्‍वास दिखाई नहीं दे रहा है। तभी तो बर्खास्त किये हुये व लाइन अटैच विवादों से घिरे अफसरों का एक स्‍कार्ट बनाया। जिसे क्षेत्र में छोड़ दिया पैसा उगाने के लिये और उनकी गलत हरकतों पर बेशर्मी से पर्दा डालने को भी नहीं चूकते।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि हमारा कोई स्‍कार्ट नहीं है। गृह मंत्री कहते हैं कि स्कार्ट मेरा है कार्रवाई करते रहेंगे। मंत्री जी यही जुझारूपन अगर हमारे पत्रकार भाइयों के हत्यारों को पकड़ने में दिखाते तो पत्रकार साथी आपके नाम की भी इबारत लिख देते,  मगर आपको भी ओहदे का सदुपयोग मालूम है। समय रहते फायदा उठा लो नहीं तो क्या पता फिर मौका मिले ना मिले, यही सोच लेकर सब भिड़े हैं स्कार्ट में।

लेखक नंद कुमार पत्रकार हैं और रायपुर जिले के गरियावंद तसहील के रहने वाले हैं.


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