यकीन नहीं हो रहा प्रणयजी का यूं चले जाना

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: दिल के सच्‍चे आदमी को दिल ने ही धोखा दिया : सुबह अपने कमरे पर बैठा था,  फोन आया तो हालचाल पूछने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार मैंने पूछा क्या हाल है भाई...उधर से आवाज आई कि यार बुरी ख़बर है... बुरी ख़बर मीडियाकर्मियों में आमतौर किसी के इस्तीफे के रुप में ही होती है... क्योंकि मीडिया में बुरी खबर को देखने का नजरिया अलग होता है... फोन करने वाले मित्र आशीष ने बताया कि प्रणय मोहन नहीं रहे... यकीन नहीं होने के कारण तीन बार पूछना पड़ा कौन नहीं रहा.

खैर... दिल तब भी यकीन करने को राज़ी नहीं था न अब भी है... प्रणय मोहन जी यूं तो ईटीवी में मेरे सीनियर थे... मगर उन्हें ये तमगा कोई ख़ास पसंद नहीं था... इसीलिए किसी एक के न होकर सबके थे... चूंकि उनकी उम्र ज्यादा थी तो वो बड़े भाई की भूमिका में थे... पर उनका व्यवहार हमेशा उस छोटे भाई की तरह था... जिसके ऊपर कोई कुछ भी न्यौछावर कर दे... बल्कि कभी कभार उसी तरह की ज़िद ठान लेते थे... उनको कभी कभार उनकी उम्र के साथ के लोग उन्‍हें समझाया भी करते... कि ये सब तुमसे छोटे है दूरी बनाकर रखो....मगर प्रणय जी छोटे लोगों को बताकर हंसने लगते.

ऑफिस में बैठे- बैठे अचानक यूपी डेस्क की पूरी रील घूम गई और याद करने की कोशिश की आख़िर कब प्रणय जी तनाव में दिखे... मगर मुझे याद नहीं आया जो भी चेहरा याद आया हंसता हुआ ही आया... प्रणय जी वो शख्सियत थे कि जो शब्द मुंह से निकाल दें वही प्रचलन में आ जाता था... अनजाने आदमी के दुख में भी प्रणय मोहन पहुंच कर इंसानियत का फर्ज अदा करते थे... ऑफिस की राजनीति में प्रणय मोहन का रोल सोमनाथ चटर्जी की तरह ही था... प्यार से बेटी को चिड़िया बुलाने वाले प्रणय जी अगर घर पर बात करते थे एक दफा किसी न किसी की बात चिड़िया से बात ज़रूर कराते थे... प्रणय जी का पेट वर्ड था डीफीट,  अगर किसी को रोकना हो तो यही बोलते कि क्या बे कहां डीफीट दे रहे हो... मगर अफसोस कि मौत को नहीं बोल पाए... प्रणय जी दिल नहीं मान रहा कि आप डीफीट दे गए... अलविदा प्रणय सर.

अरविन्द पाण्डेय

ईटीवी, राजस्थान

जयपुर डेस्क


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