प्रणय ने जाने में भी जल्‍दबाजी कर दी

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प्रणयहरफनमौला पत्रकार साथी प्रणय मोहन सिन्हा का असमय यूं ही चले जाना हम सभी को स्तब्ध कर गया। उसकी रिक्तता हमेशा उसके होने का एहसास कराती रहेगी। जय माता दी, और डीयर कैसे हैं, जुमलों से बात की शुरुआत करने वाले शब्द हमेशा कानों में गूंजते रहेंगे। अभी तो यकीन भी नहीं हो पा रहा उनके इस तरीके से बिछुड़ने का। हरफनमौला मैंने इसलिए लिखा क्योंकि वह था भी वैसा ही।

हमेशा चेहरे पर सादगीभरी मुस्कान, ईमानदाराना दोस्ती और खुद पर जबरदस्त भरोसा। इन्हीं सबने प्रणय को एक निर्भीक, निडर और ईमानदार पत्रकार की श्रेणी में खड़ा किया था। पिता मदन मोहन सिन्हा 'मनुज'  वरिष्ठ आईएएस थे, बड़े तीनों भाई भी उच्च पदों पर आसीन हैं, फिर भी प्रणय को किंचित मात्र भी इसका अहम था ही नहीं। घर में छोटा होने के कारण सबका दुलारा था तो दोस्तों में भी उतना ही प्रिय।

प्रणय से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ विश्वविद्यालय में 1993 में छात्रसंघ चुनाव के दौरान हुई। निर्भीक और निडर होने के कारण प्रणय सभी छात्र नेताओं का प्रिय रहा। इसी वजह से सन 1993 के छात्र संघ में संयुक्त सचिव के लिए उसको निर्विरोध नामित किया गया। राजनीति उसका शौक था, लेकिन घर की परिस्थितियों के दृष्टिगत उसने खुद को राजनीति से अलग ही रखा। कॅरियर संवारने को दोस्तों के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी की। प्रणय की फितरत थी कि वह एक जगह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता था। मन चंचल था और अंदाज बिंदास। सो मित्र मंडली द्वारा बनाई हुई संस्था विज्ञान में काफी दिनों तक जुड़ा रहा। यहां भी ज्यादा दिन नहीं टिका और सन 1996 में मेरे साथ लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए पत्रकारिता की डिग्री ली। उसके बाद चित्रकूट (करवी) में स्वयंसेवी संस्था वनांगना के साथ प्रणय ने काम शुरू किया। वहीं पर उसकी मुलाकात अर्चना से हुई। और बाद में प्रेम विवाह कर दोनों एक बंधन में बंध गए। घरवालों ने इस शादी को सहर्ष स्वीकार भी कर लिया।

शादी के बाद जिम्मेदारियों के एहसास ने प्रणय की जिंदगी का रुख ही बदल दिया। लखनऊ से 2001 में शुरू हुए जनता एक्सप्रेस समाचार पत्र से प्रणय ने बतौर सब-एडिटर पत्रकारिता की शुरुआत की और उसी में तेजी से पायदान चढ़ते चला गया। सन 2004 में हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक चैनल ईटीवी के साथ नई पारी की शुरुआत की। एक बेटी प्यार का नाम 'चिड़िया'  हुई तो उसकी बेहतर परवरिश के लिए अर्चना ने नौकरी छोड़ दी और प्रणय के साथ ही हैदराबाद सेटेल हो गई। इस बीच प्रणय लगातार कॅरियर की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहा लेकिन कहीं उसका मन नहीं लगा। गत वर्ष दिल्ली में भी सप्ताहभर एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल में काम किया लेकिन मन न लगने से वापस ईटीवी लौट गया। उसके बाद भेपाल में एक समाचार-पत्र में इंटरव्यू दिया लेकिन वहां का माहौल रास न आने की वजह से ज्वाइन ही नहीं किया।

चाटुकारिता से सख्त नफरत करने वाला यह शख्स अपने बूते ही आगे बढ़ा और अपनी पहचान कायम की। पापा वरिष्‍ठ आईएएस थे और उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो में डीजीपी (ट्रेनिंग) के पद से रिटायर हुए फिर भी प्रणय ने अपने कॅरियर के लिए एक बार भी उनसे सिफारिश तो दूर जिस संस्थान में नौकरी की वहां भी उनके पद और रुतबे का जिक्र तक नहीं किया। अपना मुकाम खुद हासिल करने के लिए उसने संघर्ष शुरू किया तो वह आजतक खत्म नहीं हुआ। इसी वर्ष ठीक होली के दिन उसकी इकलौती छोटी बहना के पति की अकाल मौत ने प्रणय को अंदर-अंदर ही काफी हिला दिया था। उसके जीजा जालंधर के निकट एयर बेस कैंप में कर्नल के पद पर थे। वह छोटी बहन ही नहीं बल्कि प्रणय की अच्छी दोस्त भी थी। इसी रिश्ते ने प्रणय को झकझोर दिया। तीन दिन पहले हुई बात का सार यही था कि वह ऐन-केन प्रकारेण लखनऊ लौटना चाहता था।

इससे पहले भी बूढ़े मम्मी-पापा की सेवा के लिए उसने ईटीवी में लखनऊ वापसी की दरख्वास्त की थी लेकिन अंदरुनी राजनीति की वजह से वह रिजेक्ट कर दी गई थी। ऐसा उसने मुझे बताया था। लेकिन फिर से उसने अपने सीनियरों के मार्फत लखनऊ वापसी का पुन: प्रयास करने का मन बनाया था। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। लखनऊ आया लेकिन उसका पार्थिव शरीर। पढ़ाई हो, राजनीति हो, स्वयंसेवी संस्था में नौकरी हो या फिर पत्रकारिता की शुरुआत। सभी निर्णय उसने आत्म विश्वास के साथ लिए। इस दौर में ऐसे साथी का असमय चले जाना उसके परिवार वालों व दोस्तों के लिए तो जबदरस्त आघात है ही, पत्रकारिता के लिए भी उतनी ही बड़ी क्षति है।

लेखक अनिल चौधरी हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली के चीफ सब एडिटर हैं.


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