प्रणय मोहन के नाम एक चिट्ठी

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मेरे प्रणय अंकल.. प्रणय सर.. प्रणय जी.. आप कहां चले गये. आज आपके बगैर मातम भी नहीं माना पा रहे हैं हम..कभी-कभी चौंकते हैं कानों में खिलखिलाहट की आवाज सुनाई पड़ती है... क्या हुआ डिफिट.. बरबस यकीन नहीं होता है कि आप नहीं रहे. आप क्यों चले गये सवाल कौंधता है. अच्छों को भगवान जल्दी बुला लेता है. आपको भी बुला लिया.

क्यों थे आप इतने अच्छे.. मेरे साथ के सभी साथी आज आपको याद कर रहें है.. आप कहीं तो होंगे ही न.. महसूस कर रहे होगे. मुझे मालूम था कि आपको भी गमों ने घेर रखा है लेकिन सोच में यही रहता था कि आखिर कौन सी मिट्टी का बना है ये आदमी.. कभी इसको क्यों नहीं परेशान देखा.. तो जितनी बार आप से मिलने का मौका मिला तो यही मालूम हुआ कि दुनिया तो गमों में ही बनी है,  इसलिए जरा देर मुस्कुराने में क्या रखा है..

बहनोई की मौत के बावजूद आपने किसी को भी ये जाहिर नहीं होने दिया कि आपके घर में क्या हो रहा है.. सबसे हंस कर मिलते थे आप.. आपको मालूम था कि आपके बाद आये आपके जूनियर कैसे आपसे आगे निकल गये लेकिन आपने इसकी परवाह नहीं कि और कभी आपने इसका जिक्र किसी से नही किया. मरने के बाद तो हर कोई अच्छा होता है प्रणय अंकल लेकिन आप तो जीते जी इतने अच्छे रहे कि किसी को भी अभी तक यकीन नहीं हुआ कि आप नहीं रहे..

मेरे प्रणय जी की याद में...

एक मौत हुई... नहीं कई मौतें हुई
एक धड़कन रुकी... नहीं कई धड़कने रुक गयी..
कुछ ने कहा प्रणय नहीं रहा..तो लगा बकवास है ये
करोड़ों में एक.. हरदिल अज़ीज़.. कल ही तो मिला था
कैसे मान लूं ये मैं..
पर जीवन मिथक है और मृत्यु शाश्वत
कभी किताबों में पढ़ा थे मैंने..
यकीन हुआ एक देह देख कर..
जिसको पुकारते थे हम प्रणय मोहन

मीरा सिंह


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