मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने का आरोप! लखनवी पत्रकार बना उत्तराखंड पुलिस का शिकार

E-mail Print PDF

: उत्तराखंड सरकार की मीडिया को पालतू बनाने या परेशान करने की घटिया मानसिकता का विरोध करें : लखनऊ में लाइवन्यूज नाम से न्यूज एजेंसी चला रहे पत्रकार आसिफ अंसारी को उत्तारखंड की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. मिली जानकारी के मुताबिक आसिफ अंसारी पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को ब्लैकमेल करने का आरोप है.

देहरादून में आसिफ के खिलाफ 19 फरवरी को जिला सूचना अधिकारी मैलखुरी ने सरकार को ब्लैकमेल करने का मुकदमा लिखाया था. जानकारी होने के बावजूद आसिफ न तो कोर्ट से स्टे ले आए और न ही अग्रिम जमानत कराई. आसिफ ने इस प्रकरण को सामान्य घटनाक्रम माना. पर कल रात उत्तराखंड की पुलिस ने चुपके से लखनऊ पहुंच गई और अचानक धावा बोलकर आसिफ को उनके घर से पकड़ लिया. उन्हें पकड़कर देहरादून ले जाया गया. बताया जा रहा है कि आसिफ अंसारी को आज कोर्ट में पेश किया गया जहां कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई की तारीख दी है.

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड सरकार मीडिया को लेकर बहुत पजेसिव और कंजर्वेटिव है. उत्तराखंड के अखबारों और पत्रिकाओं को या तो विज्ञापन के बल पर खरीद लिया गया है या फिर जो नहीं बिके उन्हें उत्पीड़ित कर अलग-थलग भागने-भटकने को मजबूर कर दिया है. आसिफ पहले उसी न्यूज एजेंसी एनएनआई में काम करते थे जिसके मालिक उमेश कुमार के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने कई मुकदमें लिखा दिए हैं. उमेश की भी गिरफ्तारी की कोशिशें लंबे समय से जारी है लेकिन उमेश उत्तराखंड की पुलिस और सरकार को चकमा देने में कामयाब हैं. दरअसल उमेश पर सबसे बड़ा लेकिन अघोषित आरोप यही है कि उन्होंने क्यों मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के घपले-घोटालों की पोल खोली, स्टिंग करवाया और इससे संबंधित खबरें न्यूज चैनलों को मुहैया कराई. इसी बात से खफा उत्तराखंड सरकार ने उमेश के व्यवसाय को तबाह करने से लेकर उनके परिजनों और उनकी निजी जिंदगी को तबाह करने का सिलसिला तेज कर दिया है.

इसी कड़ी में उत्तराखंड पुलिस ने दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश में घुसकर वहां के पत्रकार को पकड़कर ले आई है. सवाल यह भी उठता है कि पहले पत्रकार रह चुके और अब मुख्यमंत्री की गद्दी पर विराजमान रमेश पोखरियाल निशंक को ही सब लोग हर बार क्यों 'ब्लैकमेल' करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि निशंक के घर की दाल कुछ ज्यादा ही काली है जिसे देख पत्रकार अगर पोलखोल अभियान शुरू करते हैं तो सरकार या तो उनसे समझौता कर लेती है या फिर उन्हें सरकारी मशीनरी के जरिए प्रताड़ित करती है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि सीएम निशंक ने उत्तराखंड में दलाल पत्रकारों की एक लंबी फौज तैयार कर दी है जो खुद को बताते तो पत्रकार हैं पर वे सरकारी टुकड़ों पर पलकर मीडिया के विभिन्न माध्यमों के में निशंक का जयकारा करते रहते हैं.

दलाल पत्रकारों की फौज में भारी संख्या में युवा पत्रकारों से लेकर बुजुर्ग पत्रकार तक हैं. ये लोग अपने अपने छोटे मोटे अखबारों, ब्लागों, वेबसाइटों आदि के जरिए निशंकनामा लिखते बांचते बताते बेचते रहते हैं. बड़े अखबारों-मैग्जीनों-चैनलों में तो सीधे उपर से ही डील होने की चर्चाएं हैं, सो, इनके पत्रकार उपरी अघोषित निर्देश के तहत वही लिखते हैं जो सरकार और निशंक को सूट करता है. देश में दो दर्जन से ज्यादा राज्य हैं लेकिन किसी राज्य का मुख्यमंत्री कभी किसी पत्रकार की ब्लैकमेलिंग का शिकार नहीं हुआ. सिवाय एक अपवाद को छोड़ कर जिसमें आजतक के चंडीगढ़ संवाददाता रहे भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल किया और इस क्रम में भुप्पी की सीडी तैयार हो गई जिसके कारण उन्हें आजतक जैसे बड़े न्यूज चैनल से हाथ धोना पड़ा. तब भी हिमाचल प्रदेश की धूमल सरकार ने न तो भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी के खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज कराई और न ही उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस भेजा. धूमल ने आजतक प्रबंधन से शिकायत की और आजतक की कार्रवाई पर भरोसा किया.

आप सवाल कर सकते हैं कि आसिफ अंसारी तो अपनी बनाई कंपनी में ही काम करते थे, इसलिए उनकी शिकायत किससे की जा सकती थी? इसका जवाब यह होगा कि निशंक को गिरफ्तारी जैसा आखिरी कदम उठाने से पहले आसिफ अंसारी को लीगल नोटिस भिजवाना चाहिए था, कोर्ट में मुकदमा करना चाहिए था और अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए था. और भी कई तरीके हो सकते थे. निशंक का सूचना अधिकारी सरकार को ब्लैकमेल किए जाने का प्रेस रिलीज जारी कर सकता था, बयान जारी कर सकता था, प्रेस कांफ्रेंस कर सकता था, ब्लैकमेल किए जाने का स्टिंग कर उसे सार्वजनिक कर सकता था. कई लोकतांत्रिक रास्ते हो सकते थे. लेकिन मीडिया को डराने-धमकाने-आतंकित करने या फिर नोटों के बल पर अपने चरणों में लोटने के लिए मजबूर करने में विश्वास रखने वाले भूतपूर्व पत्रकार और वर्तमान मुख्यमंत्री निशंक को कोई और रास्ता नहीं सूझता. उन्होंने गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया. बिना मुख्यमंत्री के आदेश के दूसरे प्रदेश में पुलिस गिरफ्तार करने जा नहीं सकती.

नहीं पता कि आसिफ अंसारी पर लगे आरोप कितने सच या झूठ हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने मीडिया के लोगों को आतंकित करने का जो तौर-तरीका अपनाया है, वह प्रशंसनीय नहीं है. कई तरह के घपलों-घोटालों-विवादों से घिरे निशंक खुद अपने बुने जाल में फंसते जा रहे हैं. पत्रकारों को परेशान करना उन्हें भारी पड़ेगा. यह धमकी नहीं हकीकत है. मीडिया के वे लोग जो निशंक के सत्ता में होने के कारण उनका गुणगान उनके मुंह पर करते हैं, वही लोग पीठ पीछे निशंक सरकार की बुराइयों का बखान करते हैं और इस बीजेपी सरकार के फिर जीत कर न आने की भविष्यवाणी करते हैं.

उत्तराखंड में भाजपा नेताओं के बीच विवाद की वजह से ''बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा'' वाली जो परिघटना हुई, उसी के कारण निशंक सत्ता में आए. पर सत्ता में आते ही यह शख्स जिस जिस तरह की कारस्तानियां करता जा रहा है, उससे वह खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है. और, ऐसा करके वह अपने पार्टी के ही विरोधियों को मजबूत कर रहा है जो चाहते हैं कि किसी भी प्रकार निशंक विवादों-विरोधों में घिरे फंसे रहें. निशंक ने किसी एक आसिफ या उमेश को ही परेशान नहीं कर रखा है, उत्तराखंड के करीब दर्जन भर पत्रकार होंगे जो निशंक का कोप झेल रहे हैं.

मीडिया समुदाय के लोगों से अपील है कि वे छोटे-मोटे स्वार्थों से उपर उठकर आसिफ अंसारी की गिरफ्तारी का विरोध करें वरना कल को किसी भी प्रदेश की पुलिस किसी भी पत्रकार के घर में घुसकर उस पर सरकार को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर सकती है. हम आप सभी जानते हैं कि देश-प्रदेशों के बड़े नेता बड़े मीडिया हाउसों के मालिकों से तो ब्लैकमेल हो जाते हैं, इसी कारण उन्हें भरपेट विज्ञापन, सस्ती जमीन आदि देते रहते हैं. लेकिन कोई आम पत्रकार सरकार, शासन-सत्ता के विरोध में खबर लिखे तो उस पर ब्लैकमेलर का आरोप लगाकर उसका उत्पीड़न शुरू कर दिया जाता है.

अगर कोई पत्रकार किसी दूसरे के यहां सेलरी लेकर सरकार के विरोध में कलम चला रहा होता है तो सरकारें या तो उसका तबादला करा देती हैं या फिर उसे नौकरी से निकालने के जिद पर अड़ जाती हैं. सरकार से पंगा नहीं, पैसा लेने की नीति पर चलने वाले अपने मीडिया मालिक फौरन उस पत्रकार का ट्रांसफर कर देते हैं या नौकरी से निकाल देते हैं. ऐसा होता रहता है. पटना में हुआ है. लखनऊ में हुआ है. कई बार तो सरकार लोगों की नाराजगी के कारण संपादक लोगों को चलता कर दिया जाता है. ऐसा दिल्ली में हुआ है, लखनऊ में हुआ. होता रहता है. इसी कारण बड़े मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों के दिमाग का एक तरह का अनुकूलन हो जाता है जिसमें उन्हें पता होता है कि क्या कहना है, क्या लिखना है, कैसे जीना है, कैसे बचना है.

अगर पत्रकार खुद का अखबार, एजेंसी या पोर्टल चला रहा है और सत्ता की पोलखोल में लगा है तो उसे सबक सिखाने के लिए उसे ब्लैकमेलर बताकर पुलिस-प्रशासन के जरिए उठवा लिया जाता है. आने वाले दिनों में जब ज्यादा से ज्यादा बहादुर पत्रकार खुद का ब्लाग, अखबार, एजेंसी, पोर्टल, वेब टीवी, एसएमएस एलर्ट सर्विस आदि चला रहे होंगे तो जो भी सत्ता या नेता या अफसर के आगे नहीं झुकेगा, उसे ये नेता, नौकरशाह ब्लैकमेलर बताकर उठवा लेंगे और सींखचों के पीछे डलवा देंगे. पर ये जान लें. रेलें, जेलें, अदालतें बहादुर पत्रकारों के लिए हमेशा से ट्रेनिंग सेंटर हुआ करती हैं. इससे निकलकर आदमी और मजबूत इरादों वाला बनता है. आसिफ अंसारी आज जिस मुश्किल में हैं, उस हालात में अगर वे टूटे नहीं तो वहां से लौटकर वे ज्यादा जिगर और ऊर्जा वाले पत्रकार बनेंगे. हम सब उनके साथ हैं और उत्तराखंड सरकार की घटिया मानसिकता की निंदा करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it


AddThis