दो जननायकों बादल सरकार और महेंद्र सिंह टिकैत का निधन

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हिंदी पट्टी की दो बड़ी और चर्चित हस्तियों ने इस दुनिया को छोड़ दिया. उनकी यादें और उनका काम शेष है जो कई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहा है और आगे भी करेगा. रंगमंच की दुनिया के महान हस्ताक्षर बादल सरकार और हिंदी बेल्ट के जुझारू और चर्चित किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो गया है. ऐसे दौर में जब विरोध की आवाजों को दबाया-कुचला जा रहा है, इन दोनों का चले जाना ज्यादा पीड़ादायी है.

बादल सरकार ने रंगमंच के जरिए आम जन की आवाज को प्रमुखता से उठाया तो महेंद्र सिंह टिकैत ने आंदोलनों के जरिए किसानों को उनकी एकजुटता की ताकत का महत्व समझाया और शासकों को झुकने पर मजबूर किया. इन दोनों ने जीवन भर गरीबों, मजलूमों के लिए काम किया और उनमें ये जज्बा पैदा किया कि इस दुनिया में अपना हक गिड़गिड़ाने से नहीं, छीनने से मिलता है और इसके लिए दबे-कुचलों को एकजुट होकर लड़ना होगा.

भारत के बहुचर्चि‍त और महान नाटककार बादल सरकार 15 जुलाई सन 1925 को कलकत्ता में पैदा हुए.  उनका मूल नाम सुधींद्र चंद्र सरकार था. उन्‍होंने बैचलर ऑफ इंजीनि‍यरिंग तथा टाउन प्‍लानिंग में डि‍प्‍लोमा की शि‍क्षा भारत और वि‍देशों में ली थी. सातवें दशक में पूरे देश में उनकी धूम मची थी. उनके नाटक भारी मात्रा में हिंदी में और अन्‍य भारतीय भाषाओं में मंचि‍त हुए और वे बांग्‍ला की परि‍धि‍ से बाहर नि‍कल समग्रता में भारत के नाटककार और भारतीय रंगमंच के अगुआ बने. उन्‍होंने रंगमंच को प्रेक्षागृह की परि‍धि‍ से बाहर नि‍काला. कम से कम खर्च में नाटक मंचि‍त करना और आमजन के लि‍ए नाटक को नि‍:शुल्‍क उपलब्‍ध कराना उनका लक्ष्‍य बना.

सन 1956 में बादल ने अपना पहला नाटक सॉल्‍यूशन एक्‍स लि‍खा. बड़ी बुआजी, राम-श्‍याम-जदु, एवम इंद्रजि‍त, सारी रात, वल्‍लभपुर की रूपकथा, बाकी इति‍हास, पगला घोड़ा, अंत नहीं, सगीना महतो, जुलूस, घेरा, अबू हसन, यदि‍ एक बार फि‍र से, बासी खबर, बीज नाटक, कवि‍ कहानी, तीसवीं सदी, भोमा आदि‍ उनके प्रसि‍द्ध नाटक हैं. एवम इंद्रजीत ने उन्‍हें बड़ी ख्‍याति‍ दी और रंगमंच के बैद्धि‍क वि‍मर्श के केंद्र में ला खड़ा कि‍या. भारत के प्रसि‍द्ध से लेकर नये नि‍र्देशकों तक ने उनके नाटकों को मंचि‍त कि‍या. सन 1968 में उन्‍हें संगीत नाटक अकादमी का सम्‍मान मि‍ला. सन 1971-73 का नेहरू फेलोशि‍प मिली. सन 1972 में पद्मश्री से सम्‍मानि‍त हुए. प्रवीर गुहा सहि‍त अन्‍य कई रंगकर्मी अपने आरंभिक दौर में उनके साथ काम करते हुए उनसे प्रशि‍क्षि‍त हुए.

कैंसर से जूझ रहे 76 वर्षीय किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का आज निधन हो गया. भारतीय किसान यूनियन नेता महेंद्र सिंह टिकैत की उत्तर प्रदेश के किसानों पर काफी जबर्दस्त पकड़ थी और कई प्रदेशों के किसान नेता उनके संपर्क में आकर शिक्षित प्रशिक्षित हुए. टिकैत का अंतिम संस्कार सोमवार को सिसोली में किया जाएगा. टिकैत अपने पीछे चार बेटे और दो बेटियां छोड़ गए हैं. उनके पुत्र राकेश टिकैत उनके साथ किसान यूनियन का काम देखा करते थे. टिकैत पिछले क़रीब 25 सालों से किसानों की समस्याओं के लिए संघर्षरत थे और विशेष कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट किसानों में उनकी साख थी.

टिकैत ने दिसंबर 1986 में ट्यूबवेल की बिजली दरों को बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ मुज़फ्फरनगर के शामली से एक बड़ा आंदोलन शुरु किया था. इसी आंदोलन के दौरान एक मार्च 1987 को किसानों के एक विशाल प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में दो किसान और पीएसी का एक जवान मारा गया था. इस घटना के बाद टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने टिकैत की ताकत को पहचाना और खुद सिसौली गांव जाकर किसानों की पंचायत को संबोधित किया और राहत दी. इसके बाद से ही टिकैत पूरे देश में घूम घूमकर किसानों के लिए काम किया.

उन्होंने अपने आंदोलन को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा और कई बार राजधानी दिल्ली में आकर भी धरने प्रदर्शन किए. टिकैत के पुत्र और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने बताया कि टिकैत के अंतिम दर्शन करने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग यहां पहुंच रहे हैं. लोगों को गांव ले जाने के लिए रेलवे स्टेशन से 20 बसें चलाई गई हैं." उनके निधन का समाचार फैलते ही शोक की लहर दौड़ गई और लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ने लगे.


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