महान रंगद्रष्टा बादल सरकार को हमारी भाव भीनी श्रद्धांजलि!

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बादल सरकार: बादल सरकार ( 1925- 2011) : अभी अभी पता चला कि बादल दा नहीं रहे. बादल दा को हमारी श्रद्धांजलि. बादल दा से पहली मुलाकात (1980-81) में आज़मगढ़ के एक रंग शिविर के दौरान हुई थी. मेरे लिये किसी रंगशिविर में शामिल होने का पहला अवसर था. या यूं कहें कि मैं पहली बार रगंमंच से जुड़ रहा था.

तब तारसप्तक के कवि श्रीराम वर्मा, प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक भी शहर की संस्था "समानान्तर" से जुड़े हुए थे. तब छोटे शहरों की नाटक मंडलियों में लड़कियों का अभाव रहता था. नाटक की मंडलियां भी उतनी सक्रिय नहीं थीं. तब शहर और कस्बों में प्रोसीनियम रंगमंच ही ज़्यादा लोकप्रिय थे. ऐसे समय में बादल दा ने रिचर्ड शेखनर और लोकनाट्य "जात्रा" से प्रभावित होकर "थर्ड थियेटर" शैली की परिकल्पना की. रगमंच के लिये ये दौर ही कुछ ऐसा था कि तब मनोशारीरिक रंगमंच, शारीरिक रंगंमंच,इन्टीमेट थियेटर और न जाने कितने तो प्रयोग हो रहे थे. प्रोसिनीयम शैली के एक से एक लोकप्रिय नाटकों को लिखने के बाद अब दादा ने "तृतीय रगमंच"से अपना नाता जोड़ लिया था इसके लिये अलग से नाट्य भी लिखे.

"भोमा" "सपार्टकस" "मानुषे मानुषे" "बासी खबर" बर्टोल्ट ब्रेख्त के नाटक " कॉकेशियन चॉक सर्किल" पर आधारित नाटक "घेरा" (मुझे इतने ही नाटकों के नाम याद आ रहे हैं) बादल दा ने ये सारे नाटक विशेष तौर पर "तृतीय रगमंच" को ध्यान में रखकर लिखा, जिसमें चारों तरफ़ दर्शक के बीच में नाटक होता था.  दर्शक सब कुछ अपने सामने बहुत नज़दीक से देखता था. उनके नाटक भी कुछ ऐसे थे जिसमें दर्शक भी एक पात्र होते थे. उनका लिखा नाटक "मिछिल" जिसे हिन्दी में "जुलूस" नाम से खूब खेला गया. इस नाटक के हज़ारों प्रदर्शन हुए. अमोल पालेकर ने तो जुलूस के रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन किये थे. हर तरफ़ बादल दा के नाटकों का शोर था. पर दादा को सिर्फ़ को उनके नाट्य लेखन, तृतीय रगमंच या थर्ड थियेटर" फ़ॉर्म की वजह से ही नहीं याद किया जायेगा. बादल सरकार के इस शैली की वजह से छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में सैकड़ों नाटक की संस्थाओं ने जन्म लिया. यही दौर नुक्कड़ नाटकों का भी था. उस समय बिहार के आरा में "युवा नीति" पटना में "हिरावल" दिल्ली में "जन नाट्य मंच" और इलाहाबाद की "दस्ता" पटना की "इप्टा" अपने अपने इलाके में बहुत ज़्यादा सक्रिय थे.

आज़मगढ़ की "समानान्तर" लखनऊ की "लक्रीस" और इलाहाबद की संस्था "दस्ता" ने मिलकर अस्सी के दौर में "टुवड्स दि इन्टरैक्शन" नाम से एक नाट्य समारोह का आयोजन हमने किया था जिसमें "लक्रीस" लखनऊ ने शशांक बहुगुणा के निर्देशन में खासकर मनोशारीरिक रगमंचीय शैली में गिरीश कर्नाड का "तुगलक" खेला गया था और बादल दा के लिखे नाटक बाकी इतिहास का मंचन हुआ था. कोलकाता से बादल दा अपनी संस्था " शताब्दी" और खरदा बंगाल से प्रबीर गुहा अपनी संस्था लिविंग थियेटर ग्रुप ने अपने नाटकों के इलाहाबाद, आज़मगढ और लखनऊ में सफ़ल प्रदर्शन किये थे तब बादल दा और उनकी पत्नी को हमने पहली बार "मानुषे -मानुषे" और "बासी खबर"में अभिनय करते देखा था.

आज मेरे लिये वो सारे क्षण अविस्मरणीय और ऐतिहासिक से लग रहे हैं. बादल दा से सालों पहले दिल्ली के मंडी हाउस में मुलाकात हुई थी और यही मेरी दादा से आखिरी मुलाकात थी. 2008, 15 जुलाई को उनके जन्म दिन की याद श्री अशोक भौमिक जी ने दिलाई थी. और अशोकजी के सौजन्य से प्राप्त बादल दा के टेलीफोन नम्बर पर डायल करके मैंने उनके दीर्घायु होने की कामना भी की थी. मैंने अपने ब्लॉग पर दादा को याद करते हुए उनके बारे में लिखा भी था. पर उनके निधन की खबर ने मुझे बेचैन कर दिया और उनको याद करते करते जो कुछ फ्लैशेज़ आ रहे थे लिखता गया. महान रंगद्रष्टा बादल दादा को हमारी श्रद्धांजलि. अभी पिछले दिनों श्री अशोक भौमिक जी ने उन पर एक किताब ''बादल सरकार व्यक्ति और विमल वर्मारंगमंच'' प्रकाशित की थी.

लेखक विमल वर्मा मुंबई में हैं. मनोरंजन चैनलों के साथ जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग ठुमरी से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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