बेवफाई ने नहीं, उसे तंत्र और हम सबने मिल कर मारा

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उसकी उम्र महज 40 साल थी और वह अपनी पत्नी से बेइंतहा प्रेम करता था। वह एक बेहद मामूली इंसान था, पर उम्दा कलाकार। कला उसकी रोजी-रोटी नहीं बन पायी तो वह ड्राइवर बन गया। यही पेशा अपनाया उसने जीने के लिए। रंगों, कूंचियां और उसकी अंतहीन कल्पनाएं उसके और उसके दो बच्चों के लिए ‘भात-दाल’ नहीं बन पाईं। करीब 15 वर्षों तक उसने इसकी-उसकी या फिर किसी प्राईवेट ट्रैवल्स कंपनी की गाड़ियां चलाई।

न जाने उसने आज तक कितने लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया, लेकिन खुद की मंजिल तलाश पाने में असफल रहा। 26 मई की शाम 6 बजे भरपूर प्यार की चाहत में वह मारा गया। उसका नाम ओम प्रकाश था और वह मेरा भाई था। पुलिस कहती है उसने आत्महत्या कर ली। उसकी पत्नी अर्चना और ससुराल वालों का भी यही कहना है। मीडिया में खबरे आई ‘घरेलू विवाद में चालक ने आत्महत्या’ की। अब सुखदेवनगर थाने को पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है। उसके हत्यारे या आत्महत्या के कारण रहे लोग किसी भी कानूनी कार्रवाई से फिलहाल ‘मुक्त’ हैं। मुझे अपने बूढ़े पिता और ओम प्रकाश के 13 वर्षीय लड़के राहुल की आंखों में देखते हुए डर लग रहा है। वहां एक ऐसा गहरा समंदर है जिसमें कोई भी डूब सकता है।

ओम प्रकाश हम चार भाइयों में सबसे छोटा था और बचपन से ही काफी तंदरूस्त होने के कारण  लोग उसे ‘भीम’ कह कर पुकारा करते थे। वह एक जिंदादिल, हंसमुख और अत्यंत मेहनती इंसान था। उसे रंगों से प्यार था और वह किसी भी चीज को नया रूप देने में माहिर कलाकार था। आईपीएफ और बाद में माले के कई राजनीतिक आयोजनों के दौरान रांची शहर को कलात्मक वॉल पेंटिंग देने वाला कलाकार भीम ही था।

14 जून 1997 को उसकी शादी मधुकम निवासी अर्जुन शर्मा की बेटी अर्चना से हुई थी। उसके दो बच्चे हुए अभय (राहुल, 13) और अंकिता (11)। ओमप्रकाश उन करोड़ों भारतीय नौजवानों की तरह था, जो रचनात्मक ऊर्जा से भरे हुए होते हैं और जिंदगी से भरपूर प्यार करते हैं। लेकिन समाज में कला एवं श्रम की उपेक्षा, बेरोजगारी, अमानवीय शासन-तंत्र, असंवेदनशील सरकार और उपभोक्तावादी समाज से संघर्ष करते हुए अंततः मारे जाते हैं। पिताजी और हम भाईयों को लगभग ढाई महीने पहले उसने बताया था कि उसकी पत्नी अर्चना का किसी ओमप्रकाश (सिंह) नामक व्यक्ति (रिलायंस, पंचवटी प्लाजा में कार्यरत) से अवैध संबंध है। आरोपी ओमप्रकाश ने न सिर्फ उसकी पत्नी को उससे छीन लिया है बल्कि उसने उसके नाम से आया हुआ उसका एलआईसी का पैसा भी खुद के एकांउट में डालकर हड़प लिया है।

पिताजी और हम भाईयों ने कोशिश की कि उसके सुसरालवालों से बात की जाए जिससे उसका प्रेम और परिवार बच जाए। पर न तो अर्चना और न ही उसके मायके वालों ने हमारी इस सामाजिक कोशिश का कोई जवाब दिया। उल्टे अर्चना, उसके तथाकथित प्रेमी ओमप्रकाश (सिंह), ससुर अर्जुन शर्मा, फूफा रवीन्द्र शर्मा सहित पूरे ससुराल ने उसे जान से मारने की धमकी दी। लिहाजा, सारी कोशिशों के बाद थक-हारकर उसने 11 मई को सुखदेवनगर थाना में उसने अपनी जान का खतरा बताते हुए प्राथमिकी दर्ज करवाई। थाने के रिसिविंग नहीं देने और नकारात्मक रूख देखते हुए 12 मई को उसने वरीय पुलिस अधीक्षक और सिटी एसपी को भी आवेदन देकर जान की अमान मांगी। पर किसी ने उसकी सुनवाई नहीं की।

सुखदेवनगर थाना ने गुरुवार 26 मई की रात 9 बजे हमारे पिताजी को सूचना दी कि आपके बेटे ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। सूचना मिलते ही हम सभी भाई और पिताजी थाने पहुंचे। लाश को दाह संस्कार तक जिसने भी देखा, यही बोला, ‘यह आत्महत्या’ नहीं है। क्योंकि उसकी गर्दन पर रस्सी के दबाव का, चेहरे पर छटपटाहट, शरीर के किसी हिस्से पर कोई चिन्ह मौजूद नहीं था। रात के 11 बजे थाना प्रभारी अंजनी कुमार आए और कहा, ‘यह आत्महत्या है’। पिताजी ने जब हत्या का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराना चाहा तो कहा गया कि आप ये पंक्तियां हटा दें कि 11 मई को सुखदेवनगर थाना में ओम प्रकाश ने कोई शिकायत दर्ज करायी थी। दरअसल, थाना ने ओम प्रकाश की शिकायत दर्ज ही नहीं की थी, कार्रवाई कहां से करती।

बातें कई हैं जिनसे हत्या का संदेह होता है। जैसे, शाम 6 बजे उसने फांसी लगायी। उस वक्त उसकी पत्नी वहां मौजूद थी। पत्नी के सामने ही उसने रस्सी बांधी, फंदा बनाया और झूल गया। यह सब होता रहा, पत्नी के अनुसार वह चिल्लाती रही लेकिन कोई बचाने नहीं आया। साई विहार के पड़ोसी कैसे थे जो किसी ने उसकी चिल्लाहट नहीं सुनी और वह मरता रहा। लगभग दो महीने से मायके रह रही पत्नी के आने पर ही और उसके सामने ही यह सब क्यों हुआ? कोई भी व्यक्ति किसी की मौजूदगी में कैसे फांसी लगा सकता है वह भी जब उसे बचाने का भरपूर प्रयास किया जाए। दोनों बच्चे कहां थे? फिर, घटना की सूचना करीब दो घंटे बाद पुलिस को दी गई जबकि हम परिवारवालों को उन्होंने तुरंत सूचना क्यों नहीं दी?

पुलिस का कहना है कि जब वे घटनास्थल पर पहुंचे तो लाश बिस्तर पड़ी हुई थी। यदि एक अकेली औरत उसे नहीं बचा पाई तो उसने कैसे  उसे मरने के बाद फंदे से उतारा? घटनास्थल की तस्वीरें और साक्ष्य जुटाने की आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पुलिस ने क्यों नहीं अपनाई? अभी तक घटना से जुड़े अर्चना के अवैध संबंधी ओम प्रकाश (सिंह) से क्यों नहीं कोई पूछताछ की गई और उसे व मृतक के ससुराल वालों को हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? बच्चों और पड़ोसियों के बयान अब तक क्यों नहीं दर्ज किए गए?

हम जिस समाज में रहते हैं, जिस तंत्र और सरकार से शासित होते हैं, वह कितना असंवेदनशील और अकर्मण्य है, यह घटना उसी का परिणाम है। यदि सुखदेवनगर की पुलिस ने 11 मई को असकी शिकायत पर कार्रवाई किया होता तो क्या यह घटना घटती? क्या समाज में संबंधों की लगातार छीजती विश्वसनीयता इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? देश की आर्थिक नीतियों से और जान लेने वाली बेरोजगारी से इस तरह की घटनाओं का कोई लेना-देना नहीं है? ओम प्रकाश एक मामूली ड्राईवर था, इसलिए इन सवालों पर विमर्श करने की बहुत गुंजाइश नहीं है। वह सेलेब्रेटी होता, उद्योगपति, नेता, अपराधी, पैसे और रसूख वाला होता, तो लोग शायद चर्चा भी करते। आम आदमी इसी तरह से मारा जाता रहेगा और व्यवस्था उसे आत्महत्या सिद्ध करती रहेगी। हो सके तो अपने भाई-बहनों को बचाने के बारे में जरूर सोचिए, क्योंकि हम और आप सभी माूमली व आम लोग हैं।

... और हद यह! जब हम 27 की सुबह 10 बजे रिम्स के पोस्टमार्टम रूम में भाई की लाश मिलने का इंतजार कर रहे थे, तो एक विभागीय व्यक्ति ने आ कर कहा, ‘कुछ दीजिए, यहां सभी देते हैं।’ मैंने जब उसे सवालिया नजरों से देखा, तो उसने बेशर्मी से कहा, ‘कोई जोर जबरदस्ती नहीं है, जो खुशी हो दे दीजिए!’

लेखक अश्विनी कुमार पंकज ‘जोहार सहिया’ के संपादक हैं.


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