अब गुरुदेव भी चले गए

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विकास मिश्रगुरुदेव नहीं रहे..। उनका नाम था विनोद मिश्र..। मूल रूप से सुल्तानपुर के रहने वाले थे, इलाहाबाद में ससुराल थी और बाद में इलाहाबाद में ही बस गए। कई बरस माया में रहे। फिर मध्य प्रदेश में। इंदौर, जबलपुर, भोपाल में ज्यादा वक्त बीता। दैनिक भास्कर, स्वदेश, नई दुनिया..जैसे कई अखबारों में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।

65 साल की उम्र में पिछले 28 मई को उनका देहांत हो गया। विनोद मिश्र से मेरी पहली मुलाकात 1996 में हुई थी। तब विचार मीमांसा के चेयरमैन और संपादक वीएस वाजपेयी ने उन्हें पत्रिका का संपादकीय सलाहकार बनाया था। पद सलाहकार का था, लेकिन काम उन्हें संपादक का ही करना था। मई 1996 में उन्होंने काम संभाला था। वीएस वाजपेयी समेत उनको करीब-करीब सभी जानने वाले उन्हें पंडितजी कहते थे, लेकिन मैं उन्हें सर ही कहता था। उनके व्यक्तित्व में एक आकर्षण था। थोड़े थुलथुल बदन थे, मोटी मूंछें और खिलखिलाकर जोर से हंसना उनकी खास अदा थी।

सामने वाले को वो पंडत कहकर संबोधित करते थे, अलहदा अंदाज था उनके संबोधन का। स्टोरी पर खुश हो जाते तो कहते-पंडत देख लेना ये स्टोरी आग लगा देगी..। फिर ठठाकर हंसते थे। मैं विचार मीमांसा का यूपी ब्यूरो चीफ था और टीम का सबसे नौजवान सदस्य। वीएस वाजपेयी और डॉ. ओम नागपाल का मैं पसंदीदा था, लिहाजा हौंसले बुलंद थे। अपनी भाषा और शैली को लेकर भी थोड़ा गुरूर था। उनके काम संभालने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर मेरी एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई। आठ पेज की इस रिपोर्ट में मेरा लिखा एक भी शब्द कटा नहीं था।

मैंने फूलकर विनोद जी से इसका जिक्र भी किया। वे बोले-पंडत वो रिपोर्ट रामसेवक जी ने दिल्ली से पास की थी, इसी वजह से छेड़ा नहीं, जो रिपोर्ट छपी है वो फुस्स पटाखा है, मैं इसे एटम बम बना सकता था। कॉपी में उलटफेर करूं तो चीखना मत। मैंने दो महीनों में उन्हें फुस्स पटाखे को एटम बम बनाते हुए देखा भी था। विचार मीमांसा का सुपरहिट और स्वर्गीय विनोद मिश्रविवादास्पद पहचानिए अपने जनप्रतिनिधियों को शुरू हो चुका था। विनोद मिश्र ने रामविलास पासवान पर स्टोरी का शीर्षक दिया था-रामविलास या भोग विलास। उस वक्त के केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन की उन्होंने बखिया उधेड़ दी थी। भाषा को लेकर वे कहते थे-पंडत ये इशारों में समझाने का युग नहीं है, भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ ऐसी भाषा लिखो कि वो तिलमिला जाए और पब्लिक के दिलो दिमाग पर भ्रष्टाचारी की तस्वीर चस्पा हो जाए।

अगस्त 1996 के अंक के लिए मुलायम सिंह का कच्चा चिट्ठा लेकर मैं पहुंचा था। अपने हिसाब से बहुत आक्रामक लिखा था। विनोद मिश्र जी रात में स्टोरी लेकर बैठे, मेरा दिल धुक धुक कर रहा था। रात में दो बजे अपनी आदत के मुताबिक वीएस वाजपेयी दफ्तर आए, पूछा-पंडित जी, कैसी स्टोरी है, कुछ किया भी है या नहीं। विनोद जी बोले- तथ्य पूरे हैं, बहुत बढ़िया काम किया है, पूरी स्टोरी रीराइट करूंगा। मेरा माथा ठनका, लेकिन बोल तो सकता नहीं था। विनोद जी ने स्टोरी रीराइट की, मुझसे बोले-पंडत देख लो कैसी बनी है। मैं थोड़ा जला भुना था।

मैंने कहा-सर, आपने देख लिया तो देख लिया, अब मैं क्या देखूं। विनोद जी ने शायद मेरे मन की बात जान ली। बोले पंडत, अपने लिखे हुए पर कभी मोह मत करना, वरना आगे नहीं जा पाओगे, लो अब स्टोरी पढ़ो। मैंने पढ़ा तो आंखें फैल गईं। वाकई विनोद जी ने उस स्टोरी में नई जान फूंक दी थी। भाषा इतनी आक्रामक थी कि पूछिए मत, जिन्होंने वो अंक देखा होगा, उन्हें याद होगा। एक बानगी आप भी देख सकते हैं--'...उन्हें अंतरंगता से जानने वालों के अनुसार आतंक और आपराधिक कृत्यों के पर्याय बन चुके मुलायम सिंह अपने स्वार्थों के लिए देश तक को बेच सकते हैं, कोई सोच भी नहीं सकता था कि उन्हें ही देश के बाह्य हमलों और आंतरिक उपद्रवों से बचाने का दायित्व सौंप दिया जाएगा।.. फिर भी क्या प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ये कह सकते हैं कि वे तस्लीमुद्दीन की तरह मुलायम सिंह की असलियत से अपरिचित हैं, यदि नहीं तो क्या तस्लीमुद्दीन की तरह मुलायम सिंह को भी बेआबरू करके सत्ता से बाहर जाने का दरवाजा दिखा दिया जाएगा।'

खैर उसी दिन मैंने कहा-सर मैं आपको गुरुदेव का संबोधन देना चाहता हूं। उन्होंने स्वीकार किया, तबसे वो मेरे गुरुदेव बन गए। हालांकि दिल से मैं उनकी भाषा का समर्थक नहीं रहा, लेकिन वे सोचते गजब थे। सतपाल महाराज की स्टोरी में उन्होंने इंट्रो में लिखा था- 'तमाम तस्लीमुद्दीनों, रामविलास पासवानों, मुलायम सिंह यादवों को बनाने के बाद ईश्वर के पास जो मैटेरियल शेष रह गया, उससे उन्होंने सतपाल महाराज बना दिया।' इतनी तल्ख रिपोर्ट का असर भी हुआ, सतपाल महाराज ने एक करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया।

गुरुदेव गजब के इंसान थे। स्टोरी पर बात होती थी, बहस होती थी तो वो रिपोर्टर्स को बिल्कुल फाड़ देते थे। स्टोरी का कोई पार्ट वो छोड़ते नहीं थे। एक स्टोरी पर कई कई ब्यूरो काम करते थे। मीटिंग में जिस रिपोर्टर और ब्यूरो चीफ पर वो बरसते थे, शाम को उसके साथ मस्त होकर चाय की चुस्कियां भी भरते थे। मेरी एक रिपोर्ट पर भी उन्होंने कहा था-पंडत मेहनत तो तुमने खूब की है, लेकिन दीवार ढकेलने वाली मेहनत की है। विवादास्पद चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन अगर 15 बरसों से हिंदुस्तान लौटने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं, तो इसकी बड़ी वजह अकेले गुरुदेव ही थे।

डॉ. ओम नागपाल ने मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ स्टोरी लिखी थी। विनोद मिश्र को उस स्टोरी से संतोष नहीं हुआ। उन्होंने वो किताब मंगवा ली। तीन दिन तक रिसर्च किया और फिर रिपोर्ट तैयार हुई, जिसका शीर्षक उन्होंने दिया- ये चित्रकार है या कसाई। रिपोर्ट छपते ही पूरे देश में कोहराम मच गया। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता जैसे अखबारों और आज तक जैसे प्रोग्राम में विचार मीमांसा की चर्चा हुई। डेढ़ सौ से ज्यादा जगहों पर एम एफ हुसैन के खिलाफ लोगों ने मुकदमा दायर कर दिया। देश में जगह जगह सेमिनार होने लगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम देवी देवताओं का अपमान विषय पर महीनों तक चर्चा चलती रही, पक्ष विपक्ष में अखबारों में छपता रहा। गुरुदेव बहुत प्रसन्न थे। बोले-पंडत मैं कहता था न कि आग लगा देगी ये स्टोरी...। अपन यहीं नहीं रुकेंगे, अभी आगे बहुत कुछ करना है पंडत...।

उन दिनों गुरुदेव की उम्र करीब 50 साल की थी, लेकिन उत्साह में वे नौजवानों को भी मात करते थे। विचार मीमांसा जब छपने के लिए भोपाल से दिल्ली जाती थी तो उसके पहले तीन दिनों तक दिन-रात काम होता था। गुरुदेव खुद करीब 14 घंटे काम करते थे। उनके कामकाज के अलावा व्यक्तिगत जीवन भी अनूठा था। भोपाल में अकेले रहते थे। कोई दूसरे ब्यूरो से आता था तो उसके लिए गेस्ट हाउस था, वरना गुरुदेव के घर में उसका हार्दिक स्वागत था। वे खाना बहुत बढ़िया बनाते थे। खास तौर पर दलिया। खूब मौज से खाते थे, खूब मौज से खिलाते थे। लेकिन बर्तन किसी और को नहीं धोने देते थे, अधिक से अधिक अपनी जूठी थाली धोने की इजाजत थी।

एक दिन जब वे बाथरूम में थे तो मैंने सारे बर्तन धो दिए। बहुत नाराज हुए मुझ पर। बोले- पंडत, मेरे घर की जिम्मेदारी मेरी है, बर्तन मांजूं या मंजवाऊं, झाड़ू लगाऊं या लगवाऊं, ये मैं तय करूंगा, जो घर के भीतर है वो मेरा मेहमान है। यही नहीं एक दिन दो लोग उपसंपादक पद पर ज्वाइन करने भोपाल पहुंचे थे। ये थे कमलेश शुक्ल और डॉ. चंद्रमौलि मणि त्रिपाठी। जब ये दफ्तर में आए तो चपरासी मौजूद नहीं था, सभी लंच पर गए थे, गुरुदेव अकेले थे। उन्होंने दोनों लोगों को आदर से बिठाया, खुद गए किचेन में, दो गिलास खुद मांजकर पानी भरा और दोनों के सामने रखा। जब दोनों लोगों को ये पता चला कि ये ही संपादकीय प्रभारी विनोद मिश्र हैं तो दोनों लोगों के होश फाख्ता हो गए। एक बार मैंने फोन पर उनकी तबीयत का हाल पूछ दिया था। बहुत नाराज हुए। बोले-तुम छोटे हो, बड़े को छोटे की तबीयत पूछनी चाहिए. जब छोटा बड़े की तबीयत का हाल पूछता है तो बुढ़ापे का एहसास होता है।

विचार मीमांसा के बुरे दिन भी आ गए थे। लालू यादव के खिलाफ बंदर के हाथ में बिहार छापना महंगा पड़ गया था। लालू के सिपहसालारों ने बिहार में वीएस वाजपेयी की फाइनेंस कंपनी के सारे दफ्तर बंद करवा दिए थे। कंपनी बैठ रही थी, पत्रिका का प्रकाशन रुक गया था। वीएस वाजपेयी भरोसा खोते जा रहे थे। लोगों का वेतन करीब करीब बंद हो चुका था। ब्यूरो चीफ की हालत खराब थी, ब्यूरो में लोग तनख्वाह मांग रहे थे, लिहाजा सारे ब्यूरो चीफ भोपाल आ गए। अब कहां होटल, कहां विचार मीमांसा का वो गेस्ट हाउस..। गुरुदेव ने कहा, जब तक रहना है, मेरे यहां रहोगे।

फिर क्या था, जम गई जोड़ी। गुरुदेव रबड़ी की चाय बनाते थे। अनोखी चाय। एक भगौने में औंटा हुआ दूध, दूसरे भगौने में थोड़े से पानी में भरपूर चाय की पत्ती। दोनों भगौने गैस पर। चाय की पत्ती अच्छी तरह पक जाती तो उसे सीधे औंटे दूध में छान देते थे, बन गई रबड़ी वाली चाय। दिन भर की परेशानियां, मीटिंग्स की थकान घर पर उतरती थी। विचार मीमांसा पर बंदी का खतरा मंडरा रहा था। इसी बीच वीएस वाजपेयी ने गुरुदेव के भोलेपन का फायदा उठा लिया। विचार मीमांसा और पूरी टीम के भविष्य की दुहाई देकर उन्होंने गुरुदेव को सबके सामने ये कहने के लिए राजी कर लिया कि मैग्जीन तैयार नहीं है, इसी वजह से छपने के लिए नहीं गई। गुरुदेव उनकी बातों में आ गए। जब मीटिंग हुई तो वीएस वाजपेयी ने उस नाटक का अभूतपूर्व मंचन किया।

सबके सामने मेज पर नोटों की गड्डियां सजा रखी थीं। पूरी टीम से बोले- ये रहा विचार की छपाई का खर्च। एक लाख कॉपियों का पैसा पूरे 16 लाख रुपये। लेकिन क्या करूं मैं इन पैसों का, पंडित जी से जिस भी डेट को मैग्जीन मांग रहा हूं, वो पूरी ही नहीं कर पा रहे हैं। गुरुदेव से मुखातिब होकर बोले-क्यों पंडितजी, कब तक पूरी कर देंगे। गुरुदेव हक्के बक्के रह गए। चाहते तो वाजपेयी का झूठ उजागर कर देते, लेकिन खामोश रह गए। उधर, वीएस वाजपेयी फिर से हीरो बन गए, लोगों के दिलों में ये बात बैठ गई कि विनोद मिश्र की वजह से ही मैग्जीन नहीं निकल पा रही है। उस रात गुरुदेव ने भांग खाई, घर पहुंचे तनाव में थे, अपने कमरे में बैठकर कुछ लिखने लगे, मैं किचेन में चला गया, कुछ खाना बनाने लगा।

आधे घंटे बाद गुरुदेव आए, बोले-पंडत चिंता की कोई बात नहीं, आज अपन बहुत बढ़िया खाना खाएंगे। स्कूटर निकालता हूं, चलो रबड़ी लेकर आएं। मेरी जान में जान आई, क्योंकि गुरुदेव मस्त थे। न्यू मार्केट से रबड़ी खरीदी, वापस वैशाली आ गए। गुरुदेव ने बढ़िया स्नान किया। फ्रेश होकर उन्होंने मुझे पूरा माजरा समझाया और बोले-पंडत, मैंने अपना इस्तीफा लिख दिया है, रात भर ये बजरंगबली के पास रहेगा, सुबह मैं इसे सौंपने जा रहा हूं। मैं हैरान था, खैर गुरुदेव जैसे स्वाभिमानी शख्स के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। खैर, रात में हम लोगों ने जमकर खाना खाया। सुबह गुरुदेव ने वीएस वाजपेयी को इस्तीफा भी सौंप दिया। वाजपेयी को इसकी अपेक्षा नहीं थी, बहुत कोशिश की, लेकिन गुरुदेव माने नहीं।

संयोग की बात थी कि वाजपेयी और डॉ. ओम नागपाल के रिश्ते भी अच्छे नहीं थे। उधर गुरुदेव भोपाल से बोरिया बिस्तर समेटकर इलाहाबाद जाने की तैयारी करने में जुटे थे। विचार मीमांसा से इस्तीफा देने के तीसरे दिन की बात थी। गुरुदेव स्कूटर से जा रहे थे, पीछे से डॉ. नागपाल की गाड़ी आगे आई और स्कूटर के सामने रुक गई। नागपाल बोले- पंडित जी, क्या इरादा है..?, गुरुदेव बोले- बस इलाहाबाद जाऊंगा, कुछ किताबें लिखने की योजना है। डॉ. नागपाल ने कहा- कहीं जाने की जरूरत नहीं है, मैंने आपके लिए भास्कर में बात कर ली है, आप ज्वाइन कीजिए। इसके बाद गुरुदेव ने दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में विशेष संवाददाता के तौर पर ज्वाइन कर लिया। इधर विचार मीमांसा के दोबारा प्रकाशित होने की उम्मीदें खत्म हो गई थीं, हम लोगों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढा। गुरुदेव से फोन पर संपर्क बना रहा।

1998 में गुरुदेव एक्सप्रेस मीडिया सर्विस नाम की न्यूज एजेंसी लेकर लखनऊ आए। इंटरनेट और मोडम की सहायता से चलने वाली ये एजेंसी मध्य प्रदेश में पहले ही आ चुकी थी। गुरुदेव ने इसे लखनऊ में लॉंच किया। वे प्रधान संपादक थे और ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी उन्होंने मुझे दी थी। फिर रास्ते अलग हुए, मैं राष्ट्रीय स्वरूप का ब्यूरो चीफ बन गया, वहां से अमर उजाला, दैनिक जागरण होते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आ गया। गुरुदेव से संपर्क बना रहा।

पिछले साल गुरुदेव ने एक नई पत्रिका शुरू की। नाम है-ज्ञान वितरणम। खास तौर पर ये किशोरों के लिए पत्रिका है। 64 साल की उम्र में 16 साल के नौजवानों के लिए पत्रिका का चैलेंज लिया था गुरुदेव ने और पूरा भी किया। ए-3 साइज की आर्ट पेपर पर मैग्जीन और कीमत सौ रूपये। मैग्जीन न सिर्फ चल रही है, बल्कि हिट भी है। उन्होंने मुझसे कहा-पंडत हमारी पत्रिका के लिए हर महीने तुम्हें कुछ लिखना है। गुरु की आज्ञा सिर माथे। हर महीने मैंने कुछ न कुछ लिखा।

गुरुदेव से मेरी कई बातें मिलती थीं। एक तो उनका जन्मदिन भी 29 अक्टूबर ही था। मैं जब उन्हें जन्मदिन की शुभकामना देता था तो उनका जवाब भी रहता था-आपको भी जन्मदिन मुबारक हो। शॉर्ट फॉर्म में वे भी वीएम थे और मैं वीएम। मौज मस्ती की आदतें भी मिलती थीं। लेकिन उस उम्र में उस जोश की मैं तो कल्पना भी नहीं कर पाऊंगा, जो विनोद मिश्र में था। कुछ भी अधूरा नहीं छोड़ा। दो बेटे आलोक और अतुल। आलोक को उन्होंने शारीरिक शिक्षा दिलवाई, अब आलोक भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय में शारीरिक शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, ताइक्वांडो चैम्पियन भी रह चुके हैं।

छोटे बेटे अतुल ने आईआईएमसी से पत्रकारिता का कोर्स किया था, ज्ञान वितरणम की जिम्मेदारी उनके पास है, साथ ही इलाहाबाद में वे कई कोचिंग सेंटर चला रहे हैं। गुरुदेव की पत्नी का स्कूल इलाहाबाद में चल रहा है। यही वजह है कि गुरुदेव कभी ठठाकर हंसते हुए कहा करते थे-पंडत, मौत सबको तलाश करती है, मैं तो मौत को तलाश रहा हूं, जब मर्जी हो, आए, ले जाए। मैं बूढ़ा होकर, घिसट घिसटकर नहीं मरना चाहता। गुरुदेव की ये इच्छा भी पूरी हो गई, हंसते, ठठाते चले गए।

मुझे गुरुदेव के निधन की खबर 28 मई को ही मिल गई थी। दोपहर में कुछ शूट करवा रहा था। संयोग की बात थी कि विचार मीमांसा का पुराना साथी आलोक गुप्ता (अब सहारा समय यूपी से संबद्ध) भी साथ था। तेज गरमी में एक सज्जन अपनी कार को धक्का देते हुए लिए जा रहे थे, मैंने समस्या पूछी तो पता चला बैट्री डाउन है, मैंने कहा-आप बैठिए हम धक्का लगाते हैं। आलोक सकपका गया, मुझे धक्का लगाते देख, वो भी जुटा। अपने दफ्तर के सामने हम दोनों एक कार को धक्का लगा रहे थे, गाड़ी स्टार्ट हो गई, भाई साहब ने धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गए। आलोक ने पूछा-सर, ये क्या था। मैंने जवाब दिया- ये थी गुरुदेव को श्रद्धांजलि। यही तो करते थे गुरुदेव।

लेखक विकास मिश्र दैनिक जागरण, अमर उजाला, आजतक, न्यूज24 आदि चैनलों-अखबारों में काम कर चुके हैं. इन दिनों महुआ न्यूज चैनल में प्रोग्रामिंग हेड के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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