खंडहर बन गया कवींद्र का बंगला

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रवींद्र नाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के मौके पर पूरा देश उन्हें याद कर रहा है, पर नैनीताल के रामगढ़ नाम के जिस गाँव में वे कभी रहे और गीतांजलि जैसी रचना के कुछ अंश लिखे वहां उनके नाम का एक पत्थर भी नहीं मिलेगा। यहाँ के पुराने बाशिंदों का दावा है कि गीतांजलि यही शुरू की गई थी। खास बात यह है कि इसी जगह पर उन्होंने शांति निकेतन बनाने का सपना देखा देखा था। पर पुत्री की असमय मृत्यु ने उन्हें यहाँ से दूर कर दिया।

यह जगह है नैनीताल जिले का एक गाँव रामगढ। इस गाँव की प्राकृतिक खूबसूरती से अभिभूत होकर ही १९३४ में जब महादेवी वर्मा बद्रीनाथ की पैदल यात्रा पर जाते हुए यहाँ पहुंची तो यहाँ बस जाने का फैसला किया। बाद में उन्होंने यहाँ मीरा कुटीर नाम से अपना घर बनाया और १९३७ से सातवें दशक तक वे लगातार गर्मियों में यहाँ आती रही। मीरा कुटीर में सुमित्रा नंदन पंत, मैथिलि शरण गुप्त, वासुदेव शरण अग्रवाल, धर्मवीर भारती, गोविन्द वल्लभ पंत से लेकर अज्ञेय जैसे कवि साहित्यकारों का आना जाना लगा रहा।

कई महत्वपूर्ण रचनाएँ यही के परिवेश में रची गई। धीरेंद्र वर्मा, बाबू राम सक्सेना, गंगा प्रसाद पांडे, प्रीति अदावल और इला चन्द्र जोशी ने यहाँ रहकर साहित्य सृजन किया था। इलाचंद्र जोशी ने १९६८ में यही रहकर अपना उपन्यास ऋतुचक्र लिखा था। पर इन सबसे पहले कवींद्र रवींद्र नाथ टैगोर यहाँ आए और एक खूबसूरत पहाड़ी के ऊपर अपना आशियाना बनाया। आज भी टैगोर टाप पर उनके बंगले का खंडहर नजर आता है। इस पहाड़ी पर सेब के बागान है और सामने से हिमालय की बर्फ से लदी चोटियां नजर आती है। देवदार, बुरांस ओक और चीड़ के जंगलों से घिरा यह इलाका कवींद्र को इतना भाया था कि उन्होंने यही पर शांति निकेतन बनाने का सपना देखा।

महादेवी वर्मा ने 'रविंद्रनाथ और रामगढ़' शीर्षक से जो लेख लिखा था उसकी शुरुआत ऐसे हुई - ''हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है। उसके पर्वतीय अंचलों में मौन हिमानी और मुखर निर्झरों, निर्जन वन और कलरव -भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता रहा है। वही नंदा देवी, त्रिशूल आदि हिम-देवताओं के सामने निरंतर प्रणाम में समाधिस्थ जैसे एक पर्वत -शिखर के ढाल पर कई एकड़ भूमि के साथ एक छोटा बंगला कवींद्र का था,  जो दूर से उस हरीतिमा में पीले केशर के फूल जैसा दिखाई देता था। उस में किसी समय वे अपनी रोगिणी पुत्री के साथ रहे थे और संभवतः वहां उन्होंने शांति निकेतन जैसी संस्था की स्थापना का स्वप्न भी देखा था। पर रुग्ण पुत्री की चिरविदा के उपरांत रामगढ भी उनकी व्यथा भरी स्मृतियों का ऐसा संगी बन गया जिसका सामीप्य व्यथा का सामीप्य बन जाता है। परिणामतः उनका बंगला किसी अंग्रेज अधिकारी का विश्राम स्थल हो गया। जिस बंगले में मैं ठहरा करती थी, उस में अचानक ऐसी अलमारी मिल गई जो कभी कवींद्र के उपयोग में आ चुकी थी।''

महादेवी वर्मा के लेख के इस अंश से कवींद्र के रामगढ़ से लगाव का पता चलता है। पर दुर्भाग्य यह है कि रामगढ़ में आने वाले किसी सैलानी को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि रवींद्र नाथ टैगोर यहाँ रहते थे और गीतांजलि जैसी रचना के कुछ अंश यहीं लिखे गए। महादेवी वर्मा के मीरा कुटीर को तो संग्रहालय का रूप दिया जा चुका है और शैलेश मटियानी के नाम का पुस्‍तकालय भी साथ में बना दिया गया है। यहीं पर महादेवी वर्मा ने कई गद्य और पद्य रचनाओं के आलावा 'दीपशिखा' (१९४२) की समस्त कविताएँ भी लिखी गई। कुछ साहित्यकारों की पहल से महादेवी वर्मा के इस घर को संग्रहालय का रूप दिया जा सका और ६ अप्रैल १९९६ को कथाकार, चिंतक निर्मल वर्मा और कवि विचारक अशोक वाजपेयी ने इसका उद्घाटन किया था। तब से यहाँ पर साहित्यकारों का आना जाना लगा हुआ है। पर वही दूसरी तरफ कवींद्र का खंडहर में तब्दील हो चुका घर पूरी तरह उपेक्षित है।

पढ़ने लिखने वाले लोगों का मानना है कि सूबे में भाजपा की सरकार है जिसकी साहित्य संस्कृति की समझ पर कुछ कहना ही बेकार है। पर केंद्र सरकार तो करोड़ों रुपए कवींद्र के नाम पर खर्च कर रही है अगर टैगोर टाप यानी कवींद्र के खंडहर में तब्दील हो चुके घर तक जाने वाले रास्ते को ठीक कराकर वहां एक शेड लगवा दें तो भी उन सैलानियों को काफी राहत मिल जाएगी,  जो कहीं से पता कर ऊपर तक जाते है और बारिश आने पर भीग जाते हैं। कभी साहित्यकारों के सृजन का केंद्र रहा यह अब नए संकट से जूझ रहा है।

यह इलाका अब राजनेताओं, कलाकारों, साहित्यकारों, पत्रकारों और नौकरशाहों के रहने के नए ठिकाने के रूप में विकसित हो रहा है। एक पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर कई संपादक और सहित्यकार यहाँ बस रहे हैं। आलिशान होटल से लेकर बड़े बड़े रिसार्ट बन चुके है। पिछले साल ही पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह यहाँ आए तो अपनी आत्मकथा का एक अध्याय दो दिन में लिख डाला था और तीन दिन कमरे से कहीं बाहर नहीं गए। रामगढ़ के माहौल का इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। उतराखंड का यह अंचल कुमायुं की फल पट्टी के रूप में मशहूर है और सेब, नाशपाती, आडू, खुमानी, प्लम और अखरोट जैसे फलों से लदा नजर आता है। यहाँ के जंगल बचे हैं,  जिन में बाघ से लेकर तेंदुए तक काफी संख्या में हैं। पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियाँ यहाँ मिल जाएँगी। आज भी यहाँ के घरों के दालान में गौरैया दाना चुगते नजर आती है।

रामगढ़ में बादल आते हैं तो जल्दी जाते नहीं और जमकर बरसते हैं। बरसात के बाद भी वे पहाड़ों की गोद में बैठे नजर आते है। फिर उठे तो जंगलों से होते हुए घरों को घेर लेते हैं। यहाँ बरसात अगर जमकर होती है तो सूरज भी खुलकर चमकता है और बर्फीली चोटियां चमकने लगती है। हवा की आवाज भी यहाँ सुनाई पड़ती है। शाम होते ही जंगलों की तरफ से जंगली जानवरों की आवाज भी सुनी जा सकती है। शायद यही वजह इन जंगलों के बचने की भी है। इन्हीं जंगलों के बीच कभी कवींद्र रहते थे पर आज उनके नाम की कोई शिला भी आस पास नजर नहीं आती। उतराखंड की सरकार इस अंचल को नव दौलतियाँ तबके के नए ठिकाने में बदलने के लिए हर तरह की मदद कर रही है,  जिसके चलते बाग़ बगीचे ख़त्म होते जा रहे है और पानी का संकट भी पैदा हो रहा है। बड़ी-बड़ी विशाल कोठियां बन रही है और रिसार्ट के नाम पर पर्यावरण से जमकर खिलवाड़ हो रहा है। यदि इन बेतरतीब निर्माण पर अंकुश नहीं लगा तो  रामगढ़ का वह प्रकिर्तिक सौन्दर्य शायद ही बच पाए जिसके चलते रवींद्र नाथ टैगोर से लेकर इला चंद्र जोशी और महादेवी वर्मा ने यहाँ काफी कुछ रचा था। शुरुआत तो हो ही चुकी है। बड़ी-बड़ी कोठियां बन रही है और कवींद्र का घर खंडहर में तब्दील हो चुका है।

लेखक अंबरीश कुमार का यह लेख जनादेश पर प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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