अस्‍पताल में सात दिन के संघर्ष के बाद पत्रकार पुरुषोत्‍तम सैलानी का निधन

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कुछ दिन पहले जनसत्ता के पूर्व मुख्य उपसंपादक हरीश पंत के कुछ घंटों की तकलीफ के बाद दम तोड़ देने की घटना ने बुरी तरह से व्यथित कर दिया था। मुझे ही नहीं बल्कि उन सभी साथियों और उन लोगों को जो उनके संपर्क में काफी समय से नहीं थे। जैसे-जैसे उन्हें पता चला सभी ने दुख जताया। दुर्योग देखें कि जिस दिन उनका अंतिम संस्कार हुआ, ठीक उसी दिन पंचकूला के वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र लेखक पुरुषोत्तम सैलानी एक सड़क दुर्घटना में सिर की चोट लगने से घायल हो गए थे। रविवार को उनकी भी मौत हो गई।

शुरुआत में बताया गया कि केवल सिर में ही चोट लगी है वह अचेत अवस्था में है, घबराने की बात नहीं है, जल्द ठीक हो जाएंगे। सामान्य बात जानकार अगले दिन घर या निजी अस्पताल में कुशलक्षेम पूछने की सोची। कुछ देर बाद फोन आता है कि सैलानी जी को ब्रेन हैमरेज हो गया है और वे लगभग कोमा जैसी स्थिति में है। डाक्टरों के यह भरोसा दिलाने पर कि समय के साथ स्थिति में सुधार आ सकता है। लोगों उनके जल्द स्वस्थ होने की दुआएं मांगी।

जब दवा काम न करे तो दुआएं असर कर जाया करती है ऐसा कई बार सुना और एक-दो बार देखा भी लेकिन सैलानी की सांसें न दवाओं से जारी रह सकीं न ही दुआओं से। पांच दिन अस्पताल में रहने के बाद उन्होंने रविवार को दम तोड़ दिया। दुर्घटना के बाद वे अचेत हो गए थे और अंतिम सांस लेने से पहले तक उन्हें होश नहीं आया था। बीच में एक दिन ऐसा लगा मानो उन्हें होश आ जाएगा क्योंकि उस दिन उनके शरीर में कुछ हलचल महसूस हुई लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही। रात को तबीयत और ज्यादा बिगड़ने के बाद उन्हें वेंटीलेटर पर रखना पड़ा। सोमवार को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

वह पंचकूला के सेक्टर 12-ए के पास गांव रैली में रहते थे। उन्होंने अपने आवास का नाम काफी सोच समझ कर कस्तूरी रखा था। लोग इसका कारण पूछते तो कस्तूरी से लेकर कस्तूरी मृग का पूरा किस्सा सुना डालते। सामने वाले कुछ जानकार हुआ तो संक्षिप्त बात नहीं तो लंबी कथा सुनाने में ज्यादा देर नहीं करते थे। कुछ साल पहले महिला पत्रकार सिम्मी मारवाह ने भी इसी तरह से दम तोड़ा था। वे ट्रक की चपेट में आकर घायल हो गई थी। कुछ दिन उपचाराधीन रहने के बाद उन्हें भी बचाया नहीं जा सका। सैलानी की मौत भी उसी तरह से हुई है। अंतर केवल इतना कि सिम्मी मारवाह तो ट्रक की चपेट में आ गई थीं लेकिन सैलानी को किसी ने टक्कर नहीं मारी बल्कि किसी को बचाने के प्रयास में असंतुलित होकर सिर के बल गिर पड़े थे। यही चोट उनके लिए घातक साबित हुई।

मौत कोई न कोई बहाना लेकर ही आती है, सैलानी के मामले में भी यही बहाना बना कि अगर वे वाहन न चलाते तो हादसा न होता, या उन्होंने हेलमेट पहना होता तो शायद ऐसा नहीं होता। अगर ऐसा होता तो फिर मौत के लिए कोई बहाना नहीं होता। मौत का पर्याय बना स्कूटर उन्होंने कुछ समय पहले ही खरीदा था। यह सोचकर बहुत साल हो गए अब पैदल और साइकिल पर चलते-चलते अब आने-जाने के लिए कोई वाहन ले ही लिया जाए। दुबले-पतले होने और ड्राइविंग न आने की वजह से एकाध साथियों ने कहा भाई भारी स्कूटर न लो, बैटरी से चलने वाला कोई हलका सा ले लो पर सैलानी जो ठान लेते थे वह कर डालते थे। इसलिए सभी का अनसुनी करके स्कूटर ले लिया।

कोई पंद्रह साल से उन्हें या दो पैदल या फिर किसी वाहन वाले के साथ ही देखा। ज्यादा जरूरी हुआ और कोई नहीं मिला तो वे साइकिल इस्तेमाल करते थे। वरिष्ठ होने के नाते उन्हें कोई न कोई साथ रखता ही था। एकाध बार उन्होंने वाहन का जिक्र करने पर कहा वह कलम तो चला सकते हैं लेकिन वाहन चलाने में उन्हें डर लगता है। इस अज्ञात डर के चलते उन्होंने वाहन लेने की सोची नहीं थी। अब न जाने क्या हुआ उन्होंने इसे खरीद लिया। अंतत उनकी आशंका सच ही निकली डरते-डरते स्कूटर चलाने वाले सैलानी घबराहट में हादसा कर बैठे।

मस्तमौला, मनमौजी और यायावर प्रकृति के पुरुषोत्तम सैलानी वैसे तो सहयोगी रवैए वाले थे लेकिन कभी किसी से खटक गई तो फिर उसको खरी-खरी सुना भी देते थे। इसी वजह से कुछ लोग उन्हें पसंद नहीं करते थे। हिंदी भाषा परं उनकी अच्छी पकड़ और कल्पनाशीलता के चलते वे लेखन में सफल थे। पिछले पंद्रह-बीस साल में उत्तर क्षेत्र की बहुत सी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में वे खूब छपे। बहुत बार लोग कहते कि सैलानी जी आप तो छाए हुए हो हर कहीं, तो बोल देते भाई असली पत्रकार हूं लिखना जानता हूं। ऐसा कहकर वे उन लोगों पर कटाक्ष करते थे जो पत्रकार थे, लेकिन पत्रकारिता के अलावा सभी काम करते थे। ऐसे बहुत से लोग सैलानी से कन्नी भी काटते थे क्योंकि उन्हें डर था कि इसका कोई भरोसा नहीं कब क्या बोल जाए। पर यह सही नहीं था वह किसी को चुनौती नहीं देते थे लेकिन जब कोई उन्हें चुनौती देता तो वे उसका डटकर न केवल मुकाबला करते बल्कि उसे अपने तर्कों से परास्त कर देते थे।

जहां से उन्हें ठीक पारिश्रमिक नहीं मिलता था वे सामग्री भेजना बंद कर देते थे। फिर संपर्क होता तो कह देते कि मेरी मेहनत के हिसाब से पारिश्रमिक कम है इसलिए भेजने का कोई सवाल ही नहीं है। एक दो बार पत्रिकाओं ने इस पर समझौता किया और उन्हें अच्छे पारिश्रमिक का वादा किया तभी दोबारा सिलसिला शुरू किया। दिल्ली प्रेस की बहुत सी पत्रिकाओं में वे नियमित तौर पर छपते रहे हैं। कुछ मामलों में उनके लेखों पर नोटिस भी आए लेकिन वे कभी डरे नहीं, बोल देते कि भाई हमारे पास सारे तथ्य लिखित में है डरने की क्या जरूरत है।

बिना तथ्यों के वे किसी के खिलाफ कुछ भी लिखने से परहेज करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि इसका अंजाम बुरा ही होता है। कुछ भुक्तभोगी लोगों को वह देख चुके थे। ऐसे लोग तो फिर भी किसी संस्थान में थे इसलिए कुछ सहारा था पर सैलानी तो किसी संस्थान में नौकरी नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता करते थे इसलिए ठोस सबूतों के बाद ही कोई खरी बात लिखते थे। जिनसे उनके वैचारिक मतभेद थे वे भी उनकी लेखन कला का लोहा मानते थे। कहते थे सैलानी जैसा फीचर राइटर इस शहर में तो कम से कम कोई नहीं है। जब यह बात सैलानी तक पहुंचती तो गर्व से उनका सीना चौड़ा हो जाया करता था। वे दंभी नहीं थे लेकिन उन्हें अच्छे लेखक होने का गर्व होता था। इसी के बूते उन्हें एक सिटी चैनल ने समाचार संपादक भी बनाया। वे बहुत कुछ करना चाहते थे, बहुत विषयों पर धमाकेदार लिखना चाहते थे। पर उनकी यह हसरत उनके साथ ही चली गई।

वे स्वतंत्र लेखन और पत्रकारिता करते थे लेकिन आसपास के बहुत से कार्यक्रमों और पत्रकार सम्मेलनों में उनकी हाजिरी जरूर होती थी। उसी में से वे कोई न कोई सामग्री निकाल लिया करते थे। गजब का आत्मविश्वास था सैलानी में इसलिए बहुत बार कहते थे देखो अमूक अभिनेता या अभिनेत्री ने किसी को साक्षात्कार नहीं दिया लेकिन मैंने किसी न किसी बहाने से उनसे बात कर जानकारी इकट्ठी कर ली। वे नाम के साथ इस काम को आजीविका से जोड़ चुके थे इसलिए लिखना उनके लिए जरूरी था। पांच से दस लेख उनके पास तैयारी में ही रहते थे।

कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते थे लेकिन अब सभी ने उन्हें इसका प्रयोग करने और सारी सामग्री इसे से भेजने का आग्रह करने लगे थे। लिहाजा कुछ न कुछ वे भी कंप्यूटर हर हाथ आजमाने लगे थे। कई बार बातचीत में कहा कि जो लिखने का आनंद कागज पर है वह इस कंप्यूटर पर कहा लेकिन समय के हिसाब से बदलना ही पड़ेगा। वे अपने को बदलने की तैयारी में लग गए थे लेकिन पूरी तरह से शुरू करते उससे पहले मौत का बुलावा आ गया। मस्त और यायावर सैलानी जी की कमी हमेशा खलेगी। परमात्मा से दुआ करते हैं कि दुख की इस घड़ी में उनके परिजनों को हिम्मत दे ताकि वे जिंदगी के संघर्ष का मुकाबला कर सकें। सभी पत्रकार और गैर पत्रकार साथियों की तरफ से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना।

महेंद्र सिंह राठौड़ की रिपोर्ट.


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