हक की लड़ाई में एक और मीडियाकर्मी शहीद

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: टीओआई आफिस के सामने शव रखकर प्रदर्शन : रविवार का दिन टाइम्‍स आफ इंडिया के संघर्षरत पत्रकारों के लिए काला साबित हुआ. रविवार यानी 11 सितम्‍बर को पिछले 59 दिनों से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे कर्मचारी यूनियन के असिस्‍टेंट सेक्रेटरी दिनेश कुमार सिंह का पर्याप्‍त इलाज के अभाव में निधन हो गया.

टीओआई, पटना के प्रिंटिंग प्रेस के बंद होने के बाद नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के लिए लड़ रहा एक पत्रकार प्रबंधन की अनदेखी एवं आर्थिक विपन्‍नता के चलते शहीद हो गया. धरना पर बैठे कर्मचारियों ने दिनेश सिंह के शव के साथ टीओआई दफ्तर के सामने प्रदर्शन भी किया. पिछले तीन महीनों से टीओआई के कर्मचारी नौकरी से हटाए जाने तथा मनीसाना वेतन आयोग की सिफारिशों लागू किए जाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं.

द टाइम्‍स ऑफ इंडिया न्‍यूज पेपर एम्‍पालइज यूनियर के असिस्‍टेंट सेक्रेटरी दिनेश कुमार सिंह भी प्रेस की बंदी के बाद नौकरी गंवाने वाले मीडियाकर्मियों में एक थे. इस तरह दिनेश कुमार सिंह देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के एसएलपी (क्रिमिनल) - 10134/2010, 1884/2011, 1956/2011 और 1957/2011 तथा इन सभी मुकदमों को एक साथ सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट क़ी डबल बेंच द्वारा विगत 5 जनवरी 2011 को यथास्थति बनाये रखने के आदेश का टीओआई प्रबंधन के द्वारा किये गए उल्लंघन के नतीजे का पहला शिकार बने.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है "स्टेटस को एज ऑफ़ टुडे शेल बी मेंटेनड". यह आदेश चारो कंपनियों द्वारा पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अखिलेशचन्द्रा के न्याय निर्णय के खिलाफ फाइल क़ी गई एसएलपीज को एक साथ क्लब कर सुनते हुए जारी क़ी गई है. मगर देश की सबसे बड़ी अदालत के इस आदेश क़ी खुली अवमानना करते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रबंधन ने विगत 16 जुलाई 2011 को अपना कुम्हरार (पटना) स्थित प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया.

सनद रहे कि यह यूनियन अपने कामगारों को जस्टिस मनीसाना सिंह वेज बोर्ड के मुताबिक पूरा वेतन देने की लड़ाई कर रही थी. इसके लिए यूनियन डीएलसी से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटा रही थी. यह लड़ाई पिछले नौ सालों से चल रही है. प्रबंधन मजदूरों को यह कह कर मनीसाना वेतन नहीं दे रही थी कि उनकी चार अलग-अलग कम्पनियाँ हैं- बेनेट कोलमेन एंड कंपनी लिमिटेड, टाइम्स पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड, एक्सेल पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड और पर्ल प्रिंटवेल लिमिटेड. और बेनेट को छोड़ कर अन्य किसी कंपनी पर मनीसाना वेज बोर्ड लागू नहीं होता है. इस सन्दर्भ में पटना उच्च-न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति अखिलेशचन्द्रा ने एक न्याय-निर्णय दिया था. यह न्याय निर्णय स्पष्ट करता है कि टाइम्स प्रबंधन गैर क़ानूनी हरकत कर रहा था. इस क़ानूनी लड़ाई में यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो न्याय के मान्य सिद्धांतों के मुताबिक कानून कामगारों के हक़ में ही फैसला देगा क्योंकि कंपनी प्रबंधन द्वारा गैरकानूनी हरकत के दस्तावेजी सबूत हैं.

इसी बीच जस्टिस मजीठिया वेतन आयोग की बात आ गई और प्रबंधन को लगा कि यदि मजीठिया वेतन आयोग देने की बात आयी तो मामला गंभीर हो जायेगा तो फिर क्यों ना सारे मामले को जड़ से ही ख़तम कर दिया जाये. ना रहेगा बांस और ना रहेगी बांसुरी. सिर्फ और सिर्फ इसी सोच के तहत प्रबंधन ने अपने प्रिंटिंग प्रेस को ही बंद करने का निर्णय हठात ले लिया. वह भी तब जब कि कई एसएलपी मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े हैं.

उधर यूनियन क़ी ओर से पहले से ही बकाये वेतनमान की वसूली के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में एक एसएलपी (सिविल) संख्या 34045/2009 दायर किया हुआ है. जिस में कोर्ट का अंतिम आदेश है - "पोस्ट फॉर फ़ाइनल डिस्पोजल". इस केस को विगत 21 फरवरी 2011 को ही अंतिम डिस्पोसल के लिए सुना जाना था. मगर इसकी तारीख अब नौ महीने आगे बढ़ कर 31 अक्‍टूबर 2011 हो गई है. ऐसी  स्थिति में जब कि क्रिमिनल एसएलपीज में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश है, सिविल एसएलपी फ़ाइनल डिस्पोसल के लिए तय है, इसके साथ ही साथ इंडस्‍ट्रीयल डिस्प्यूट एक्ट का भी स्पष्ट प्रावधान है कि विवाद के चलते हुए सेवा शर्तों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है - मगर जब्बर टाइम्स प्रबंधन ने सभी कानूनों और सुप्रीम कोर्ट आदेशों को ताख पर रखते हुए प्रिंटिंग प्रेस को बंद ही कर दिया. महज इसलिए कि उनके मनीसाना वेतन के साथ-साथ उनके जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड के बकाये को भी पचाया जा सके.

पिछले 16 जुलाई से लगातार हटाये गए वर्कर यूनियन के झंडे के नीचे शांतिपूर्ण धरना चला रहे हैं. उनकी मांगें भी न्याय संगत हैं. मगर कोई मीडिया-ग्लेयर नहीं है. बिना किसी मीडिया-ग्लेयर के भी इस धरने ने सोमवार 12 सितम्बर को 59वाँ दिन पूरा किया. ज्ञातव्य हो कि मनीसाना वेतन बोर्ड की मांग की इस लड़ाई में दिनेश कुमार सिंह कोई पहले नहीं बल्कि तीसरे शहीद थे. इस लड़ाई के दरम्यान पर्याप्त इलाज के अभाव मे मरने वालों में दो और भी वैसे टाइम्सकर्मी शामिल हैं, जिनकी मौतें पैसे के कमी की वजह से हुइ है. ये टाइम्सकर्मी थे - आनंद राम उर्फ़ टार्ज़न (कार्मिक विभाग के चपरासी) और शुकुल राम राउत (प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाले स्वीपर).

यह भी गौर करने की बात है कि इस बीच कम वेतनमान की वजह से गरीबी में गुजरा करने वाले टाइम्स-कर्मियों जिन में से बहुलांश दलित, उत्पीडित पिछड़ी जातियों से आते हैं या फिर अत्‍यन्‍त गरीब सवर्ण तबके से आते हैं - के बेटे बेटियों की ना सिर्फ पढ़ाई छूट गयी वरन शादियाँ भी बाधित हो रहीं हैं. टाइम्स कर्मियों को न्याय मिलने में देरी का असर ना सिर्फ उनकी निजी जिंदगियों पर बल्कि उनके परिवारजनों की जिंदगियों पर भी पर रहा है. सच ही कहा गया है "जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड." क्या इस व्यवस्था में टाइम्स कर्मियों की पीड़ा को कोई सुन भी रहा है? टाइम्स कर्मियों के सामने अब यह प्रश्न यक्ष प्रश्न बनकर नाच रहा है.

अरुण कुमार

अध्यक्ष द टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्‍यूज पेपर इम्प्लाइज यूनियन,  पटना

महासचिव, बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, पटना


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