स्‍वतंत्रता सेनानी पूर्व विधायक विश्‍वनाथ मोदी का निधन

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विश्‍वनाथजी: राजकीय सम्‍मान के साथ किया गया अंतिम संस्‍कार : दो किताबों के लेखक भी थे स्‍व. मोदी : आजादी की लड़ाई के अग्रणी नेता थे विश्वनाथ मोदी। वर्ष 1942 में करो या मरो आंदोलन में वे भूमिगत आंदोलनकारी थे। जिले के डोमचांच में इनको पुलिस ने पकड़ लिया था और एसपी रसल ने चाबुक से इन्हें इतना पीटा कि ये मरणासन्न हो गये, बाद में इन्हें मरा समझ कर ट्रक पर फेंक दिया था। हालांकि इनकी सांस चल रही थी। बाद में इनका इलाज कराया गया और जब लोगों को इनके जीवित रहने की खबर मिली थी तो इलाके में दीये जलाये गये थे।

विश्‍वनाथ जी का 14 फरवरी को निधन हो गया।  20 जुलाई 1920 को कोडरमा जिले के गोदखर गांव में जन्मे और होरील मोदी व गिरजा देवी की संतान विश्‍वनाथ मोदी ने प्रारंभिक शिक्षा कटहाडीह प्राथमिक विद्यालय और बाद में गुरूकुल बैजनाथ धाम में शिक्षा हासिल की थी। 1940 में इन्होंने रामगढ़ में हुए कांग्रेस अधिवेशन में भी हिस्सा लिया था और बाद में हजारीबाग जेल में जयप्रकाश नारायण के सम्पर्क में आकर समाजवादी हो गये। कोडरमा में वर्ष 1958-59 में जंगल ठेकेदारों के खिलाफ इन्होंने संघर्ष किया तो वहीं बिहार अबरख मजदूर सभा का गठन कर मजदूरों के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी।

आपातकाल के दौरान भी पहले हजारीबाग और फिर भागलपुर जेल में डेढ़ साल तक बन्द रहे। 4 मार्च 1978 को उन्होंने डोमचांच में सामूहिक मिट्टी काटो अभियान शुरू किया था, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर और हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों ने भाग लिया था। 1966 में लोहिया के आह्वान पर कांग्रेस हटाओ जान बचाओ आंदोलन में डोमचांच में ही लोहिया के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक जनसभा हुई थी, जिसमें दिग्गज समाजवादी नेता मामा बालेश्वर दयाल, मधु लिमये, मधु दंडवते, हुक्मदेव नारायण, भोला सिंह आदि नेताओं ने भाग लिया था।

1974 के जेपी आंदोलन में भी विश्वनाथ मोदी ने काफी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। उनके सहयोगी में स्व. जशराज सिंह, बीएन मिश्र, चंद्रेश्वर आजाद भी थे। 74 के आंदोलन में इन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर हजारीबाग और फिर भागलपुर जेल भेजा गया था। उस दौरान वे डेढ़ साल तक जेल में रहे थे। लम्बे अरसे से बीमार चल रहे विश्‍वनाथ मोदी  बीमार चल रहे थे। 14 फरवरी को झुमरीतिलैया में निधन हो गया और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी पत्नी अम्बिका देवी का पहले ही निधन हो चुका है, वहीं एक पुत्र दामोदर मोदी का भी दो वर्ष पहले निधन हुआ था। स्व. मोदी अपने पीछे दो पुत्र सुभाष मोदी और विनोद मोदी समेत भरा पूरा परिवार छोड गये हैं।

पूर्व विधायक विश्‍वनाथ मोदी को पर्यावरण से गहरा लगाव था। पर्यावरण प्रेम के तहत उन्होंने अपने गांव की खेती लायक जमीन को बेचकर गांधी उच्च विद्यालय के नजदीक 10 एकड़ बंजर जमीन खरीदी और उस भूखंड पर लगभग 15 हजार पेड़ लगवाये। अब सारे पेड़ बडे़ हो चुके हैं और वह इलाका गांधी -लोहिया- विश्वनाथ गार्डेन के रूप में जाना जाता है। इसके लिये स्व. मोदी को केद्र सरकार की ओर से इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

लेखक भी थे विश्‍वनाथ मोदी : जिले में मोदी जी के नाम से प्रसिद्ध विश्वनाथ मोदी ने दो पुस्तकें भी लिखी थीं- 1. पांच बरस में नया हिंदुस्तान कैसे बने  2. बड़े नेताओं के बडे़ अपराध। पहली पुस्तक उन्होंने वर्ष 1978 में लिखी थी, जिसमें पांच साल में हिन्दुस्तान को कैसे विकास की पटरी पर लाया जाय, इसकी चर्चा की गयी थी तो वहीं 1999 में लिखी गयी दूसरी पुस्तक में आत्मकथा कहते हुए देश के बडे़ घोटालों की चर्चा की गयी थी। उनके निधन पर इस पुस्तक को लोगों ने हाथों हाथ लिया।

समाजवादी जननेता को खो दिया : बिहार विधान सभा के तीन बार सदस्य रहे और स्वतंत्रता सेनानी विश्‍वनाथ मोदी के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने अपनी शोक संवेदना में स्व. मोदी को जीवन पर्यंत गरीबों और मजदूरों के लिये लड़ने वाला नेता बताया। वहीं झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी अपने शोक संवेदना में राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम में आगे रहने वाला योद्धा बताया। भाकपा के राज्य सचिव भुनेश्‍वर प्रसाद मेहता ने शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि विश्‍वनाथ मोदी ने सदैव गरीबों और मजदूरों के लिये संघर्ष किया। उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

अंतिम संस्‍कार

कोडरमा विधायक अन्नपूर्णा देवी, बरकट्ठा विधायक अमित यादव, राजद के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर राणा, जदयू नेता बटेश्‍वर मेहता, अर्जुन यादव, मदजूर नेता प्रभाकर तिवारी आदि ने भी अपनी शोक संवेदना व्यक्त की है। उनकी शव यात्रा में भी गौतम सागर राणा, बटेश्‍वर मेहता, भाजपा नेता रवि मोदी, परमेश्‍वर मोदी, माले नेता श्यामदेव यादव, उदय द्विवेदी, पेंशनर समाज के अध्यक्ष नारायण मोदी, डा. एनके मोदी, केडी यादव, उमेश सिंह, रविन्द्र प्रसाद, अशोक वर्णवाल, कृष्णदेव मोदी, मनोहर मोदी, मुन्ना सुलतानिया, अरूण मोदी, डा. विकास चन्द्रा, सुनील कुमार, कांग्रेस के तुलसी मोदी, आजसू के अजीत वर्णवाल, पत्रकारों में संजीव समीर, विनोद विश्‍वकर्मा, अमरेन्द्र श्रीवास्तव, सतीश कुमार, मनीष राज, संतोष कुमार आदि भी शामिल हुए।

स्वतंत्रता सेनानी सह कोडरमा के पूर्व विधायक विश्वनाथ मोदी के निधन को एक अपूरणीय क्षति बताते हुए बरही के विधायक उमाशंकर यादव ने कहा कि वे न केवल मेरे राजनीतिक बल्कि हर तरीके से गुरू थे और उनसे मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। विधायक ने आज स्व. मोदी के आवास पर जाकर उनके परिजनों मुलाकात की। वहीं 1974 आंदोलन में स्व. मोदी के सहयोगी रहे अधिवक्ता मोहन प्रसाद अम्बष्ठ ने कहा कि उनके निधन से एक मुखर आंदोलन ध्वस्त हो गया। कोडरमा ने एक विश्वसनीय समाजवादी जन नेता को खो दिया। श्री अम्बष्ठ ने श्री मोदी के साथ बिताये अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए कहा कि मोदी जी का सिद्धांत था कि जुल्म करो मत और जुल्म सहो मत। जेपी आंदोलन के सक्रिय नेता रहे रमेश सिंह ने बताया कि विश्वनाथ मोदी क्षेत्र के प्रमुख समाजवादी नेता थे और उनके निधन से समाजवादी आंदोलन को भारी क्षति हुई है। विष्णु प्रसाद वर्णवाल ने मोदी जी को एक प्रखर लोहियावादी नेता बताया। उन्होंने कहा कि वे अविभाजित बिहार के प्रमुख समाजवादी नेताओं में एक थे।

मोदी जी को मिला राजकीय सम्मान : कोडरमा जिले में यह पहली बार हुआ कि किसी स्वतंत्रता सेनानी का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। जब विश्‍वनाथ मोदी के निधन की खबर मिली तो राज्य सरकार से राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि कराने की मांग की गयी थी। इसमें कुछ पत्रकारों ने भी अपने स्तर से पहल की और मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा से भी बात की गयी। विधायक अन्नपूर्णा देवी और अमित यादव ने भी हस्तक्षेप किया और राज्य सरकार की ओर से निर्देश मिलने के बाद कोडरमा डीसी शिवशंकर तिवारी, एसी उदय प्रताप सिंह, एसडीओ शिशिर कुमार सिन्हा, दंडाधिकारी पूर्णचन्द्र कुंकल, एसडीपीओ चन्द्रशेखर प्रसाद, बीडीओ नूतन कुमारी, थाना प्रभारी राजीव रंजन आवास पर पहुंचे। निर्देश के तहत स्व. मोदी के शव को तिरंगे में लिपटाया गया, वहीं अंतिम संस्कार के समय सशस्त्र सलामी दी गयी और पुलिस बल द्वारा मातमी धुन बजायी गयी। जिले में किसी स्वतंत्रता सेनानी को पहली बार यह सम्मान मिला। इसके पहले पिछले वर्ष स्वतंत्रता सेनानी लीली चक्रवर्ती के निधन पर भी उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ करने की मांग की गयी थी पर राज्य सरकार ने इसपर ध्यान नहीं दिया था।

कोडरमा से संजीव समीर की रिपोर्ट.


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