चुपचाप चले गए अनिल भैया

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अनिल सिन्‍हामेरे बड़े भैया यानी अनिल सिन्हा चुपचाप चले गए। मैं पिछले दो दिनों से निणर्य नहीं कर पा रहा था कि उनके बारे में यहां लिखा जाए या नहीं। पर आज रहा नहीं जा रहा है। कम से कम अखबारी दुनिया के ज्यादातर वरीय लोग जानते हैं कि अनिल सिन्हा मेरे सबसे बड़े भाई हैं और अतुल सिन्हा सबसे छोटे। अनिल सिन्हा पटना छोड़कर लखनउ भले ही आकर बस गए थे पर उनके मन में पटना और अपने पुराने मित्रों का मोह आखिर तक बसा रहा था।

वे कई साल लखनउ में अमृत प्रभात और नवभारत टाइम्स में काम करने के साथ लेखन और साहित्य से जुड़े रहे। इस बार जनवरी में संभवतः वे 70 की उम्र पूरा करके अपनी बिटिया रितु और निधि के पास दिल्ली आए थे। दिल्ली में उनका इलाज चलता रहता था। मैं पिछली बार भारत गया था तो वह लखनउ थे और मैं उनसे मिल भी नहीं सका था। इसी बीच उगांडा में तनावपूर्ण चुनाव का माहौल बना और हम सब लगभग नजरबंद से हो गए थे, अपने अपने घरों में। मेरा स्थाई वीसा भी अभीतक नहीं हो पाया है इसलिए मेरा यहां से निकलना भी संभव नहीं हो सका और भैया चल दिए। हम उन्हें बार बार पारिवारिक औपचारिकताओं से बचने की सलाह देते थे, क्योंकि ज्यादा यात्राएं करना उनके लिए ठीक नहीं था। पर वे मानते नहीं थे।

इस बार भी वे पटना जा रहे थे क्योंकि उन्हें एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होना था। रेल यात्रा के दौरान ही उन्हें ब्रेन हैमरेज जैसा आभास हुआ। पटना में खबर भेजी गई। संयोग से अतुल भी दूसरी रेल से पटना जा रहे थे। उन्हें पता चला तो दानापुर में अतुल इसी रेल में आ गए और सभी साथ ही पटना पहुंचे, जहां से उन्हें तुरंत एक अस्पताल ले जाया गया। उन्हें आईसीयू में वेंटिलेटर पर जब रखा गया तभी लोगों को अंदाज हो चला। पूरा प्रयास किया गया कि उनके पुत्र शास्वत के अमरीका से आने तक उन्हें जीवित रखा जा सके, पर संभव नहीं हो पाया। और अंततः वे पटना में ही 25 फरवरी को अंतिम सांस लेकर विदा हो गए। मैं उनसे नहीं ही मिल सका।

भैया के बारे में मैं कुछ कहने की हालत में भी नहीं हूं। मुझे पटना में उनके वे दिन कभी नहीं भूलते जब वे बार-बार अपने जीवन की गहरी निराशा का बयान करते रहते थे। मैं वे दिन भी कैसे भूल सकता हूं जब जेपी आंदोलन के दौरान मैं इमरजेंसी में जेल में बंद था तो महीनों-महीनों वे मेरी जमानत के लिए निचली अदालत से लेकर पटना उच्च न्यायालय के चक्कर काटते रहे थे। और जब मेरी रिहाई का आदेश उन्हें मिला तो वे कैसे फुलवारीशरीफ की जेल में फरवरी की गहरा गई शाम को ही आदेश लेकर आ गए थे। वे मुझे जेल से बाहर लाकर कितना खुश हुए थे, मैं आजतक भूल नहीं सका।

वैचारिक रूप से कई बार मेरी उनसे खूब बहस होती थी। वे साम्यवादी विचारों के लिए बेचैन रहते थे और जन संस्कृति मंच के माध्यम से लगातार सक्रियता बनाए रखते थे। मैं जेपी और गांधी के विचारों से प्रभावित रहा हूं। इसलिए कई बार हमारी खूब लबी बहस होती थी। पर इसके कारण कभी हमारे रिश्ते के बीच कोई तनाव नहीं होता था। वे मुझे बहुत मानते थे। उनके बच्चों ने भी मुझे बहुत प्यार किया है। मैं भी उनके तीनों बच्चों को अपने बच्चों की तरह ही मानता रहा हूं। इन सारी बातों के बावजूद मैं उनसे आखिरी समय में मिल नहीं सका, उगांडा में रहने की यह पीड़ा मैं कैसे भूल सकूंगा? पटना और लखनऊ ही नहीं, देश भर के हिंदी साहित्य जगत ने आज एक अच्छा और सक्रिय पत्रकार और साहित्यकार खो दिया है।

लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले अंचल सिन्‍हाहुए हैं. अंचल सिन्‍हा वरिष्‍ठ पत्रकार एवं कामरेड अनिल सिन्‍हा के छोटे भाई भी हैं. अपने बड़े भाई के निधन से पहले उनसे न मिल पाने की पीड़ा को उन्‍होंने शब्‍दों के जरिए बयान किया है. अंचल सिन्‍हा से सम्‍पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल - This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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