बीड़ी-सिगरेट की पर्ची पर आदेश लिखने वाले अर्जुन सिंह

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याज्ञवलक्य वशिष्ठसोच में हूं, आज ही अर्जुन सिंह जी का निधन हुआ है. और आज ही कांग्रेस की शीर्ष कमेटी से उन्‍हें अलग किया गया. क्‍या यह केवल संयोग है. यह फैसला उस दस जनपथ की कोठी से निकला था जिस दस जनपथ के वे कभी सबसे करीब और सबसे विश्‍वासपात्र माने जाते थे. जाने कितने किस्‍से इस शख्‍स के हैं. जिस पर आज यकीन करना मुश्‍िकल है.

लेकिन अपने आसपास ही ऐसे कई हैं जो इस बात के जीवंत सर्टिफिकेट हैं कि जो बातें अर्जुन सिंह के बारे में कही जाती हैं वे सच हैं. पूरी तरह सच. एक बीड़ी या सिगरेट की पर्ची पर आदेश लिख देना, और फिर उसी तेजी से उसका पालन होना. रेहड़ भर भर्तियां होना. वह भी डंके की चोट पर. विंध्‍य से. फिर यह भर्तियों की रेहड़ पुलिस विभाग में हो या फिर किसी और विभाग में. मगर हुआ वही जो अर्जुन सिंह ने चाहा.

कई नेता बोल कर चर्चाओं में रहे. लेकिन अर्जुन सिंह की गिनती उन नेताओं में होती रही जो अपनी खामोशी की वजह से जाने गये. अर्जुन सिंह आत्‍मकथा लिख रहे थे. कई ऐसे सवाल जिनका जवाब कई मौकों पर मांगा गया लेकिन नहीं मिला. वे शायद उस आत्‍मकथा से मिलता लेकिन क्‍या ही गजब है, किताब के वे पन्‍ने भी अब हमेशा के लिए खामोश हो गए हैं.

लेखक याज्ञवलक्य वशिष्ठ जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.


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