भाई साहब, मेरी श्रद्धांजलि में यही लिख दीजिएगा

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वरिष्‍ठ पत्रकार एवं दैनिक 1857 के चीफ एडिटर एसएन विनोद ने कहा कि लोग कहते हैं पत्रकारिता में आजकल मूल्‍यों का ह्रास हो गया है, नैतिकता नहीं रही, सिद्धांत गौण हो गए हैं, निडरता की जगह चाटुकारिता ने ले ली है, अगर इन सब को एक साथ चुनौती देना हो तो आलोक तोमर को सामने खड़ा कर दो. आलोक तोमर एक ऐसा व्‍यक्ति जिसने कभी समझौता नहीं किया. जिंदगी में संघर्ष किया, दुख झेले पर कभी झुके नहीं. जीवटता ऐसी की कैंसर का पता होने तथा जिंदगी के कुछ लमहों के बचे होने के बावजूद उन्‍होंने अपना लेखन जारी रखा.

एसएन विनोद ने कहा कि उनके जैसा जीवट पत्रकार मैंने आज तक नहीं देखा. पिछले दिनों कीमियोथेरेपी, रेडियोथेरेपी के बाद मैं उनसे बात कर रहा था. उनके गले से आवाज पतली आ रही थी फिर भी बात कर रहे थे, मैंने कहा कि यह जीवटता आपमें ही हो सकती है. इस पर उन्‍होंने कहा कि भाई साहब आप मेरी श्रद्धांजलि में यही लिख दीजिएगा. इस पर मैंने कहा कि अभी जीना है आपको, लेकिन शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था.

उन्‍होंने बताया कि पिछले दिनों मेरे अखबार के लिए स्‍तंभ आना बंद हो गया था. पांच-छह दिन पूर्व मेरे मोबाइल पर एक संदेश आया कि अब वे अपना स्‍तंभ नियमित करेंगे. एक लेख भी मेरे मेल पर आ गया था. मुझे बहुत खुशी हुई. परन्‍तु दो घंटे बाद ही मुझे पता चला कि उनकी तबीयत बिल्‍कुल खराब हो चुकी है. पूछताछ में पता चला कि यह लेख उन्‍होंने अपने किसी सहयोगी को बोलकर लिखवाया है. लेख लिखवाते समय ही उनकी हालत खराब हुई और उन्‍हें अस्‍पताल ले जाया गया.

एसएन विनोद ने कहा कि पत्रकारिता के प्रति जो पीढ़ी समर्पित है, उसके रोल माडल बन चुके थे आलोक तोमर. उन्‍होंने कम आयु में ही अपने आप को एक श्‍लाका पुरुष के रूप में स्‍थापित कर लिया था. पत्रकारिता के लिए उनका योगदान अतुलनीय है. ऐसे कई मौके आए जब उन्‍होंने अपनी पत्रकारिता से समझौता नहीं किया. उन्‍होंने अपनी लेखनी की धार कभी कुंद नहीं होने दी. अस्‍वस्‍था से पहले एक बार किसी बात को लेकर मैंने आलोक को समझाया, इसी बीच सुप्रिया ने मोबाइल ले लिया और मुझसे कहा कि मैं इन्‍हें समझाती हूं कि विवाद में मत पड़ा कीजिए पर सुनते ही नहीं. इस पर आलोक ने कहा कि भैया जहां बात चरित्र और उसूल की होगी वहां मैं आपकी और सुप्रिया की बात भी नहीं मानूंगा. ऐसे व्‍यक्ति के जाने से दुखद बात कोई हो ही नहीं सकती.

उन्‍होंने कहा कि आलोक ने लेखन से कभी समझौता नहीं किया. उनके खबर के प्रतिकूल प्रभाव से कोई अपना भी प्रभावित हुआ तो उन्‍होंने व्‍यक्तिगत रूप से इसके लिए क्षमा मांग लेते थे, पर कहते थे कि यह मेरा पेशा है, इसी की रोजी-रोटी खाता हूं, इससे दगाबाजी नहीं कर सकता. एसएन विनोद ने कहा कि उनका जो आखिरी लेख आया है, उसे अभी प्रकाशित नहीं किया है. पर यह अंतिम लेख कल के अखबार के पहले पन्‍ने पर प्रकाशित होगा. उन्‍होंने कहा कि अब पत्रकारिता में ऐसा कोई नहीं है, जिससे आलोक की तुलना की जा सके. आलोक अतुलनीय थे और अतुलनीय ही रहेंगे. दूसरा आलोक नहीं पैदा होगा.

वरिष्‍ठ पत्रकार और जी न्‍यूज के संपादक पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि उनकी लेखनी ही उनकी पहचान थी. पत्रकार बहुत हुए परन्‍तु उनकी भाषा का पैनापन और सरलता अदभुत थी. किसी मुद्दे को छूते तो दिल में उतर जाता था. उनके साथ कभी काम करने का मौका तो नहीं मिला पर उनसे  पहली मुलाकात मध्‍य प्रदेश चुनाव के दौरान बीहड़ में हुई थी. वो आए और बताया कि मैं आलोक तोमर हूं, तो मुझे झटका सा लगा कि इतना बड़ा पत्रकार और इतना सरल. ये शायद उस मिट्टी का प्रभाव था जहां से वे आते थे. उनका जाना पत्रकारिता की बहुत बड़ी क्षति है.

एनडीटीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा एंकर रवीश कुमार ने आलोक तोमर के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि वे आखिर तक अपनी बीमारी से अकेले लड़ते रहे. उन्‍होंने फेसबुक स्‍टेट्स के जरिए अपनी जिंदगी तीन महीने बताई, उसके बाद भी उन्‍होंने इस पर कोई बात नहीं किया बल्कि 2जी स्‍पेट्रम और ऐसे ही मामलों पर लिखते रहे. कैंसर जैसी बीमारी के पीछे का निजी दुख सबके सामने नहीं लाए. जितना जूझ सकते थे इस बीमारी से जूझे, किसी से याचना नहीं किया. उनका जाना बहुत ही दुखद है. एक जीवट इंसान थे. रवीश कुमार अपने मन का दर्द भी नहीं छुपा सके. उन्‍होंने कहा कि ऐसा कोई सिस्‍टम नहीं है जो पत्रकारों के लिए खड़ा हो. आलोकजी अकेले कैसे इस बीमारी से लड़े, कैसे इलाज कराया, यह सोच कर तकलीफ होती है.

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा साधना न्‍यूज के कनसल्टिंग एडिटर एनके सिंह ने कहा कि आलोक तोमर जी जैसे कम ही लोग होते हैं पत्रकारिता में. ऐसे वैल्‍यू सिस्‍टम के लोग कम रह गए हैं. आज जब मीडिया फिसलन की स्थिति में है ऐसे में आलोक जी की अत्‍यंत जरूरत थी. उनके जाने से इस अभियान को बड़ा झटका लगा है. जहां भी पत्रकारिता का क्षरण होता था वे खुलकर विरोध करते थे. उन्‍होंने सदैव मूल्‍यों की पत्रकारिता की, कलम के धार को भी कुंद नहीं होने दिया. उनका जाना बहुत बड़ा नुकसान है.

सीनियर जर्नलिस्‍ट और न्‍यूज एक्‍सप्रेस के हेड मुकेश कुमार ने कहा कि आलोक तोमर जी का निधन बहुत बड़ा सदमा है. पिछले डेढ-दो दशक में उन्‍होंने अपनी लेखनी और सक्रियता से जो जगह और पहचान बनाई, वैसा कोई दूसरा नहीं बना पाया. वे पत्रकारीय मूल्‍यों के बहुत बड़े रक्षक थे. हमने एक बड़ा स्‍तम्‍भ खो दिया है.

डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चेयरमैन और पत्रकार निशीथ राय ने कहा कि यह खबर सुनकर मैं स्‍तब्‍ध रह गया. यह मेरी नितांत व्‍यक्तिगत क्षति है. आज की तारीख में जब पत्रकारों की फौज बौनी होती जा रही है, तो असली पत्रकारिता के प्रमाण थे आलोक भाई. वो कहा करते थे कि मैं किसी से हारने वाला नहीं हूं. उनकी जिजीविषा ही थी कि बीमार होने के बावजूद काम करते रहते थे. उन्‍होंने कहा था कि जनसत्‍ता के बाद डीएनए में मुझे पत्रकारिता की आग दिखती है, इसके लिए मैं जरूर कुछ करूंगा. उन्‍होंने डीएनए के तीन साल होने के अवसर पर एक आर्टिकल लिखा था, जिसे आज भी संजोकर रखे हुए हूं. आलोक जी नए लोगों के वाणी और संबल थे. उनके तेवर और उनके कार्यों को आगे बढ़ाना ही उनके लिए सच्‍ची श्रद्धाजंलि होगी.

वरिष्‍ठ पत्रकार उदय सिन्‍हा ने कहा कि आलोकजी के जाने का सहसा विश्‍वास ही नहीं हो रहा है. आलोक से मेरा पिछले बाइस सालों का संबंध था. व्‍यस्‍तता की वजह से हम काफी समय तक एक दूसरे को मिलते नहीं थे, लेकिन गाढ़े समय में हमेशा एक दूसरे को याद करते थे. आलोकजी के परिवार के लिए जो कुछ बन पड़ेगा उसके लिए मैं तैयार हूं और यही मेरी उनके प्रति श्रद्धांजलि है. आलोक का निधन नहीं मेरे भाई का निधन हो गया है. भगवान सुप्रिया तथा परिवार को दुख सहने की शक्ति दे. मैं आने वाले पत्रकारों को संदेश देना चाहूंगा कि किसी को पत्रकार बनना है तो आलोकजी जैसी सरल भाषा और उसका उतार-चढ़ाव सीखना पड़ेगा. उनसे बेहतर आदर्श पत्रकारिता में नहीं हो सकता है.

सीएनईबी के सीओओ अनुरंजन झा ने कहा कि दिल्‍ली पुलिस मुख्‍यालय में उनके नाम का डंका बजा करता था. पुलिस वाले भी मानते थे कि आलोक जितना बेबाक और निडर क्राइम रिपोर्टर दूसरा नहीं है. मैं भी आलोक जी की लेखनी का कायल रहा. आलोक जी को दूसरी पीढ़ी के पत्रकार समझ ही नहीं पाए. उनके साथ काम करने वाले लोग भी उनकी अच्‍छाइयों को उजागर नहीं किया. सही मायने में बोलने, लिखने और करने वाले पत्रकार थे. उनके जैसा संवेदनशील पत्रकार मैंने नहीं देखा. बीमार रहने के दौरान भी उन्‍होंने लिखना नहीं छोड़ा.

अनुरंजन ने एक वाकया सुनाते हुए कहा कि जब आलोक में जनसत्‍ता में थे, तब त्रिलोकपुरी में झुग्‍गी-झोपड़ी की एक स्‍टोरी कवर करने गए थे. उन्‍होंने भूखे और नंगे लोगों पर स्‍टोरी कवर की. इसके बाद वो जिस कपड़े में स्‍टोरी की थी, उसी को पहन कर तीन दिनों तक ऑफिस आए. इसके बाद एक दिन कुर्ता पायजामा पहन आए. साथ काम करने वालों ने पूछा कि आलोक ये क्‍या है, पहले तुम कई दिन तक एक ही कपड़ा पहन कर आफिस आए, आज यह फटा पुराना कुर्ता-पायजामा पहन कर आए हो. इस पर आलोक ने बताया कि उस दिन गया था त्रिलोकपुरी में स्‍टोरी कवर करने, उन लोगों की हालत मुझसे देखी नहीं गई. उन सबों को सारे कपड़े और बर्तन उठाकर दे आया. ये जज्‍बा था आलोक जी में. वे कहने, लिखने तथा करने वाले पत्रकार थे.

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा आज समाज के ग्रुप एडिटर राहुल देव से जब आलोक तोमर के निधन के बारे में पूछा गया तो वो इस कदर विचलित थे कि उन्‍होंने कहा कि इस समय मैं कुछ भी नहीं बोल पाऊंगा.

वरिष्‍ठ पत्रकार और लोकमत के ग्रुप एडिटर गिरीश मिश्र ने कहा कि आलोक तोमर के निधन से पत्रकारिता को ऐसी क्षति हुई है, जिसका भरपाई मुश्किल है. उनको मैं पिछले तीस वर्षों से जानता था. जनसत्‍ता में लम्‍बे समय तक उनकी पैनी लेखनी का असर दिखता रहा है. उनके तेवर से बहुतों को परेशानी होती थी, लेकिन पत्रकारिता की उन्‍होंने अपने उसी तेवर से बहुत बड़ी सेवा की. कलमकर्मियों को लम्‍बे समय तक उनका तेवर और पैनापन और किसी भी विषय के गहराई में जाकर पड़ताल करना और बेबाक विचार को प्रकट करना लम्‍बे समय तक पत्रकार साथियों को प्रेरणा देती रहेगी. ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करें.

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा सीवीबी न्‍यूज के एडिटर प्रदीप सिंह ने कहा कि पिछले पचीस सालों में इतना प्रतिभाशाली पत्रकार कोई दूसरा नहीं था. उसने अपनी प्रतिभा के साथ अत्‍याचार किया. पर अपनी कलम के तेवर कभी ढीले नहीं किए. वो अपने पीछे दोस्‍तों और शुभचिंतकों की एक बहुत बड़ी फौज छोड़ गया है.

वरिष्‍ठ पत्रकार और स्‍तंभकार शेष नारायण सिंह ने कहा कि आलोक तोमर की मौत वर्तमान हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े इंसान की मौत है. उन्‍होंने अपने लेखनी के सामने किसी की नहीं सुनी. उन्‍होंने ना तो किसी की निंदा की और ना ही किसी की परवाह किया, बस सच लिखा. आलोक अपनी हिम्‍मत से मौत को भी छकाते रहे. आज की तारीख में कोई दूसरा आलोक तोमर नहीं है और ना ही कभी पैदा होगा.

वरिष्‍ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े तो फफक कर रो पड़े. उन्‍होंने कहा कि मैंने अपना बड़ा भाई खोया है. मैंने आलोक जी से सीखा कि लड़ते कैसे हैं. उनके जैसा पत्रकारिता के प्रति समर्तित आदमी अपनी जीवन में नहीं देखा. भगवान सुप्रिया को यह दुख सहने का ताकत दें. अब इससे ज्‍यादा बोल पाना अभी मेरे लिए संभव नहीं है.

वरिष्‍ठ पत्रकार और सीएनईबी के सलाहकार संपादक किशोर मालवीय ने कहा कि उनका जाना निडर पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा धक्‍का है. उन्‍होंने कभी दबाव में आना या डरना नहीं सीखा था. क्राइम रिपोर्टिंग के तो जाने-माने नाम थे. उनकी 84 के दंगे की रिपोर्ट ने पुलिस वालों तक को हिलाकर रख दिया था. उनके साथ काम करने का तो बहुत मौका नहीं मिला पर उनको देखकर तो मैंने बहुत कुछ सीखा. वे मेरे लिए बड़े भाई जैसे थे. उनका जाना बेखौफ पत्रकारिता करने वालों के लिए बहुत बड़ा झटका है.

नेटवर्क10 के सीईओ बसंत निगम ने कहा कि आलोक जी की कलम और लेखनी हमेशा सच बोलती रहती थी. सच के लिए उन्‍होंने किसी की परवाह नहीं की. इस तरह की बेबाक कलम मिलना शायद ही अब मुमकिन हो पाए. वो वन एंड वनली आलोक तोमर थे. जो बोलते थे वाले लिखते थे, डंके की चोट पर. उनका जाना मूल्‍यों की पत्रकारिता को बहुत बड़ा नुकसान है.

टोटल टीवी के वाइस चेयरमैन शशिरंजन ने कहा कि उनके जैसा बेबाक पत्रकार मौजूदा पत्रकारिता में नहीं था. कई ऐसे मोड़ आते हैं जब पत्रकारों को समझौता करना पड़ता है पर आलोक जी ने कभी समझौता नहीं किया, भले ही उनके कितना भी बड़ा नुकसान क्‍यों न उठाना पड़ा हो. वो विषम परिस्थितियों में भी किसी के सामने झुके नहीं.

दैनिक जागरण, वाराणसी के संपादकीय प्रभारी डा. राघवेंद्र चड्ढा ने कहा कि आलोक जी का जाना वर्तमान पीढ़ी के लिए बहुत बड़ा नुकसान है. पत्रकारिता के मूल्‍यों को लेकर जो डेडिकेशन उनके अंदर था, वो आज कम देखने को मिलता है. उनकी लेखनी उनकी पहचान थी. जितने सच्‍चे इंसान थे उनकी लेखनी उतनी ही तीखी थी. भगवान उनके परिवार को दुख सहने की शक्ति दें.

वरिष्‍ठ पत्रकार और मार्निंग न्‍यूज के संपादक वीर सक्‍सेना ने कहा कि आलोक एक प्रतिभाशाली और योग्‍य पत्रकार थे. दिल्‍ली में पत्रकारिता के दौरान आलोक के नजदीक रहने का सौभाग्‍य मिला. देश के जो कुछ जागरूक और प्रखर पत्रकार थे उनमें एक आलोक को मानता हूं. मुझे भड़ास से ही यह खबर मिली कि मैंने अपना साथी और ईमानदार पत्रकार खो दिया है. उनका जाना मुझे व्‍यक्तिगत रूप से खलता रहेगा.

देशोन्‍नति ग्रुप के चेयरमैन प्रकाश पोहरे ने कहा कि जैसे ही आलोक जी के देहावसन की खबर सुनी, कुछ पल के लिए यूं लगा कि जैसे समय ठहर गया हो. एक जीवट आदमी का संघर्ष करते-करते यूं चले जाना किसी को रास नहीं आ सकता. फिर भी जिंदगी बस एक उम्मीद भरी डगर है. मौत एक हकीकत है. लेकिन आखिर दम तक अपने पसंदीदा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मौत से रुबरू होने का नसीब कम लोगों को ही मिलता है. सच को सच कहने का माद्दा बस आलोक जी में ही था. पत्रकारिता के उच्चतर मूल्यों को बनाए रखने का वह संघर्ष जिसे प्रभाष जोशी ने आरंभ किया, उसकी धुरी आपने बखूबी संभाली.आलोक जी आपका जाना दुःखद है लेकिन आपका सफर सुकुन भी देता है, क्योंकि इसमें ये अहसास छिपा है कि अपनी शर्तों पर भी जिदंगी को बख़ूबी जिया जा सकता है. कलम के इस अद्वितीय सिपाही को पूरे सम्मान और गौरव के साथ भावभीनी श्रद्घाजंलि.

आईआईएमसी के एसोसिएट प्रोफेसर आनंद प्रधान कहा यह पता था कि उनकी तबीयत खराब थी, पर उनके जाने की खबर हतप्रभ कर देने वाली न्‍यूज है, सहसा विश्‍वास नहीं होता. उनका जाना एक बड़ा शून्‍य पैदा कर गया है हिंदी पत्रकारिता के लिए. जिस तरह से होली के दिन वो हमसबको छोड़ कर गए इस नुकसान को बयान करना मुश्किल है. मैंने अपने छात्र जीवन में जनसत्‍ता से पत्रकारिता के कई गुण सीखे उनमें आलोक जी का लेखन भी महत्‍वपूर्ण था. जनसत्‍ता में उन दिनों उन्‍होंने जिस प्रकार की रिपोर्टिंग की वो हमेशा याद रखी जाएगी.

वरिष्‍ठ पत्रकार नीरज भूषण ने कहा कि इतने कम उम्र में आलोक जी का चले जाना उनके परिवार के लिए सबसे बड़ा नुकसान है. हमलोगों को केवल बयानबाजी न करते हुए उनके परिवार के ऊपर टूटी विपत्तियों उनके साथ खड़ा होना चाहिए. हम सभी पत्रकार एक फंड क्रियेट करें ताकि उनके परिवार को एक मदद मिल सके, क्‍योंकि सबको पता है एक ईमानदार पत्रकार अपने पीछे क्‍या छोड़कर जाता है. उनका जाना शाकिंग हैं.

जनता टीवी के मैनेजिंग एडिटर विवेक सत्‍यमित्रम ने कहा कि यह बहुत ही दुखदायी खबर है. आलोकजी बेहतरीन पत्रकार होने के साथ एक जिंदादिल इंसान थे. उसूलों और पत्रकारिता के मूल्‍यों के लिए वो व्‍यवस्‍था से लोहा लेते रहे. वे हमेशा आम आदमी की बात करते थे. निश्चिततौर पर जब आज आम लोगों की धारणा में पत्रकार और दलाल के बीच फर्क कम हो गया है, ऐसे में आलोक जी पत्रकारिता के एक प्रकाशपुंज थे. एक बहुत बड़ा गैप क्रिएट हुआ है. हिंदी मीडिया में उनके स्‍तर का कोई दूसरा व्‍यक्ति नहीं है.

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा साधना न्‍यूज के एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर संजीव चौहान ने कहा कि रिपोर्टर तो बहुत पैदा होंगे पर आलोक तोमर दूसरा पैदा नहीं हो सकता है. नाम से आलोक तोमर पैदा हो सकता है पर काम से अब आलोक तोमर पैदा नहीं होगा. अब देश में लोगों का असली चेहरा सामने लाने वाला पत्रकार चला गया. जिन लोगों को आलोक तोमर ने कलम चलानी सिखाई थी, वे लोग ही उनसे दूरी बना लिए थे. आलोक तोमर को देखने जब दो महीने पहले उनके पास गया था तो उन्‍होंने यही कहा था कि आगे बढ़ना पर किसी के सामने झुकना मत. पर क्‍या पता था कि इतनी जल्‍द हमसब को छोड़ कर चले जाएंगे.

मैजिक टीवी के ऑपरेशन हेड प्रसून शुक्‍ला ने कहा कि आलोक तोमर यानी योद्धा. अंतिम दम तक लड़ने वाला योद्धा. हर मोर्चे पर आखिरी सांस तक लड़ने वाला योद्धा. यही तस्वीर आलोक जी की मेरे अंदर बनी हुई है. आलोक तोमर जी से मेरी पहली मुलाकात एक साल पहले हुई थी. उस दिन से लेकर आज तक कभी नहीं लगा कि आलोक जी को मौत मात दे पाएगी, लेकिन मृत्यु की खबर ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया. लेकिन उनकी जीवट लेखनी ने उन कोई लोगों को नया रास्ता दिखा दिया है, जो पत्रकारिता के गिरते स्तर को नए मुकाम तक ले जाना चाहते हैं. मेरे और मैजिक टीवी परिवार की ओर से आलोक तोमर को श्रद्धांजलि.

न्‍यूज17 के इनपुट हेड चंदन प्रताप सिंह ने कहा कि आलोक जी का जाना तो मेरे लिए व्‍यक्तिगत नुकसान है. अभी मैं इससे ज्‍यादा कह पाने की स्थिति में नहीं हूं.

डा. कुमार विश्‍वास ने कहा कि शब्द और उसकी चिरंतन चेतना के पहले पहले परिचय में एक नाम मेरे साथ साथ चला था "आलोक तोमर. आज उस के आगे "स्वर्गीय" जुड़ गया. इस अराजक समय में ईश्वर की ये हरकत बहुत नागवार गुजरी है. सुबह शवदाह के समय अधिकतर लोग खामोश आलोक भाई तक से आंख नहीं मिला पा रहे थे. जाहिर है ज्यादातर पत्रकार थे. एक शेर को आखिरी सलाम.

अनोखा अंदाज साप्‍ताहिक के संपादक विजय सिंह ने कहा कि आलोक तोमर जी का अचानक हमारे बीच से असमय चला जाना बेहद दुखद है. बरेली मीडिया इस खबर से हतप्रभ है. बरेली मीडिया क्‍लब प्रार्थना करता है कि ईश्‍वर आलोक तोमर की आत्‍मा को शांति प्रदान करें तथा परिवार को धैर्य.

मुंबई के पत्रकार बीएन गिरी ने कहा कि वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक जी के निधन के बाद आज देश के तमाम सच्चे और निर्भीक पत्रकार अपने आप को अनाथ महसूस कर रहे हैं. आलोक जी वास्तव में आज इस देश के तमाम युवा होनहार और सच्चे कलम के सिपाही के प्रेरणा पुंज थे. आज ऐसे समय में जब लोकतंत्र ही चौथा स्तम्भ भी भष्‍टाचार के लपेटे में आ गया है और आज पत्रकारों पीढ़ी सत्ताधीशों की चाटुकारिता करे रही है और पत्रकारों को भी अपनी रोटी रोजी चलाने के लिए दलाल की भूमिका निभानी पड़ रही है, ऐसे कठिन समय में जो मशाल आलोक जी ने जलाई, वो युगों-युगों तक जलाता रहेगा और कलम के सच्चे सिपाही को राह दिखता रहेगा ऐसे कलम के सच्चे सिपाही को एक पत्रकार का शत-शत नमन.

सीएनईबी के पत्रकार अनुराग अमिताभ ने कहा कि अलोक तोमर का जाना एक अपूर्णीय क्षति है. उनके लिए जो अभी भी पत्रकारिता को इन्कलाब लाने का एक माध्यम समझते है. अलोक जी इंकलाबी थे उनका ये इंकलाब प्रभाष जोशी से लड़ते वक्त जाहिर हुआ. अमिताभ बच्चन को कौन बनेगा करोड़पति के वक्त गरियाते हुए जाहिर हुआ. कैंसर हो चुकने के बाद जब संतसिंह चटवाल को पद्म पुरस्कार मिला तब उनके लेखनी ने उसका डंके की चोट पर विरोध किया. ये आवाज जरूर गुम हो गई है, लेकीन मरी नहीं है. हमारे जैसे आपके जैसे लोगों के लिए ये चिनगारी मशाल बनेगी. ये मेरा विशवास है और आलोकित विश्‍वास है.

पत्रकार प्रदीप महाजन ने कहा कि अलोक तोमर अब नहीं रहे परन्तु पत्रकारिता को सम्मान से कैसे रखें ये उनको आता था, जब मैंने उनको यशवंत के भड़ास पर इतना बेबाकी से लिखते देखा तो लगा कि पत्रकारिता अभी सम्मानित स्थिति में है. यशवंत का प्यार उनके साथ था उसकी वजह से भड़ास पर आलोक जी के द्वारा उनका लिखा हुआ कलम का सत्य, जब प्रकाशित होता था तो पत्रकारिता के दलालों को परेशानी होती थी बाकी प्रभु की लीला को जो मंजूर.

अगर आलोक जी के बारे में आप कुछ कहना चाहते हैं तो अपनी बात This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं.


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