क्‍या ईमानदारी का यही सिला मिलता है?

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यशवंत भाई... यह सच है कि भारत के हर क्षेत्र में मीडिया में काली भेड़ें हैं इसमें शक की कोई कोई गुंजाइश नहीं है, परन्तु इमानदार पत्रकारों की भी कोई कमी नहीं है. मै पिछले 17 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हुआ हूं और एक ईमानदार पत्रकार की हैसियत से जागरण, अमर उजाला, नव-जम्मू, जम्मू के स्थानीय जेके चैनल काम किया. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि समाज के हर वर्ग के लोगों में मेरी छवि एक ईमानदार पत्रकार के रूप स्थापित है लेकिन आज के युग में ईमानदार पत्रकार होना शायद एक अभिशाप सा लगने लगा है.

यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ऐसा मेरे साथ हुआ है और आज मैं ईमानदारी की सजा कह सकते हैं भुगत रहा हूं लेकिन अपनी ईमानदार छवि के चलते हर वर्ग का सहयोग पा रहा हूं. बात को थोड़ा पीछे ले जाना चाहता हूं--- करीब 7 साल तक मैंने स्थानीय जेके चैनल में बतौर कैमरामैन- संवाददाता के रूप में काम किया और काफी इज्जत भी पाई. एक दगाबाज, जिसे हम जैसे एक पत्रकार पंजाब केसरी के सांबा से संजीव चौधरी ने कपड़े का काम करने वाले एक नौसिखिए को बतौर छायाकार समाचार पत्र में काम दिलवाया तथा उसे मैंने एक हफ्ते के अंदर कैमरा चलाना सिखाया.

कुछ साल तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा फिर अपनी कला में माहिर व बेईमानी का पुतला वह अहसान फरामोश जिस किसी फंक्शन में जाता बिना पैसे लिए वापिस नहीं आता. यहां तक कि जिस इंसान ने इस हरामजादे की रोजी रोटी लगवाई, उसी की बुराइयां कर लोगों को उस से उपर होने को एहसास दिलवाने लगा. एक दिन संजीव चौधरी ने उस कमीने इंसान को पंजाब केसरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया और वह मेरे कार्यालय में आकर बैठने लगा. उस पर तरस कर मैंने अपने साथ जेके चैनल का एक अखबार भी निकलता है, में लगवा दिया. कुछ देर पश्चात अंदर ही अंदर उस हरामी इंसान ने इधर भी कोई खिचड़ी पकानी शुरू कर दी और यह कहने लगा कि हम अपना समाचार पत्र शुरू करते हैं. मै उसके झांसे में आ गया और दिल्ली से अपने पेपर के लिए परमीशन लेने को पत्राचार शुरू कर दिया.

पेपर का नाम भी आ गया और मैंने अपना पेपर निकालने पर अपने चैनल में जबाब दे दिया,  जब कि उसने वहीं रहने का फैसला कर मुझे आधे रास्ते में छोड़ दिया और मैं एकदम अकेला पड़ गया.  हालांकि कुछ लोगों ने उस समय मुझसे कहा था कि यह व्यक्ति भरोसे वाला नहीं है लेकिन मैंने यह सोच कर अपने साथ रखा कि शायद उसकी सोच बदल जाए, लेकिन ऐसा सोचना मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी भूल थी. आज मैं खुद एक संपादक के रूप में जम्मू के सांबा जिला से पिछले दो महीनों से सप्ताहिक जन चेतना समाचार पत्र निकाल रहा हूं.

आर्थिक तंगी बहुत है, बीबी-बच्चे नाराज हैं क्योंकि पिछले पांच महीनों से वेतन के रूप में मिलने वाले रुपए घर नहीं आए और सोचिए गुजाऱा कैसे चल रहा होगा यह भगवान ही जानता है. पर मैंने हिम्मत नहीं हारी और ईमानदारी के रास्ते पर चल निकला हूं यही सोच कर कि शायद कोई तो होगा जो मेरी ईमानदारी को देखते हुए मेरे साथ जुड़ेगा और जन चेतना को एक नई पहचान देने में मेरी मदद करेगा. मै भी यहां एक बात बताता चलूं कि अपनी पत्रकारिता के जीवन में मैंने आज तक कभी किसी अधिकारी अथवा किसी कार्यालय से एक नया पैसा भी नहीं लिया और न ही लूंगा. अब आप ही बताएं कि क्या ईमानदारी का यही सिला मिलता है?

सोम दत्‍त

संपादक

जन चेतना

सांबा

मो- 094192-52956


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