क्‍या निर्मल जैन को जीते जी इंसाफ मिल पाएगा?

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निर्मल जैनभारतीयों ने जब अंग्रेजों से भारत छोड़ने को कहा तो उसके पीछे कई कारण थे, जिसमें क प्रमुख बात थी, भारतीयों को न्याय न मिल पाना। अंग्रेजी सरकार व न्यायपालिका भारतीय जनता के साथ न्यायसंगत व्यवहार नहीं कर रही थी। इन्हीं मूलभूत मुद्दों को लेकर हमने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। आज देश को आजाद हुए लगभग 63 साल हो गये हैं, लेकिन मध्यप्रदेश के दमोह जिले के निर्मल जैन के प्रकरण को देखकर लगता है कि हम आज भी अंग्रेजी शासन व्यवस्था की बुराईयों से उबर नहीं पाए हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकारें या न्यायपालिका पूरी तरह भ्रष्ट हैं, लेकिन इसी लोकत्रांतिक व्यवस्था में निर्मल जैन जैसे लोग भी हैं जिनको न्याय नहीं मिल पा रहा है। 1975 में आपातकाल के विरोध में एक साल से ज्यादा मीसा के तहत दमोह जिले के जेल में रहने के बाद से जैन की जिन्दगी तबाह हो गयी। जेल जाने से पूर्व वह दमोह जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की बिजौरी ग्राम सेवा सहकारी समिति में प्रबंधक थे। जैन के अनुसार आपातकाल का विरोध करने के कारण तत्कालीन बैंक अध्यक्ष ने उन पर 4816.40 रू. के झूठे गबन का आरोप लगाकर 1978 में नौकरी से निकाल दिया।

उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 409 के तहत एफआईआर भी दर्ज करा दी। 1978 से 1993 के बीच 16 सालों तक निचली अदालत में चले मुकदमें में अभियोजन पक्ष उनके गबन संबंधी सबूत पेश न कर सका। परिणामस्वरूप निचली अदालत ने जहाँ एक ओर निर्मल जैन को इस प्रकरण से बरी किया, वहीं दूसरी तरफ उनके खिलाफ बनाए गए झूठे गबन के आरोप के लिए बैंक प्रबंधक के विरुद्ध आईपीसी की दफा 406 के तहत मुकदमा भी दर्ज किया। बैंक प्रबंधक ने इस फैसले के खिलाफ पहले सत्र न्यायालय और फिर हाईकोर्ट में अपील की। लेकिन दोनों जगहों पर उनकी अपील खारिज हुई। सोलह सालों तक चले इस मुकदमें के फैसले के बाद निर्मल जैन ने राहत की सांस ली। लेकिन उन्हें क्या पता था कि इंसाफ की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

भारतीय सरकारी तंत्र की कार्यशैली का एक दूसरा भयावह रूप अभी दिखना बाकी था। 25 जनवरी 1993 को न्यायालय से दोषमुक्त सिद्ध होने के बाद कानूनी रूप से निर्मल जैन को तुरन्त प्रभावी रूप से नौकरी में बहाल किया जाना चाहिए था। इसके साथ ही पिछले 16 सालों के दौरान उनके समकक्षों को मिले क्रमोन्नोति, भत्ते आदि की समस्त राशि के साथ पूरा वेतन मिलना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। न्यायालय से दोषमुक्त सिद्ध होने के बाद भी उन्हें अपना पूर्व पद प्राप्त नहीं हुआ। पिछले 16 सालों से मुकदमा लड़ रहे जैन की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि वे न्यायालय कादरवाजा नहीं खटखटा सके।

उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल भाई महावीर से मुलाकात की तथा अपनी स्थिति से अवगत कराया। राज्यपाल ने उनकी बात को गम्भीरता से लेते हुए उन्हें मुख्यमंत्री के पास भेज दिया। इस तरह न्यायालय से दोष मुक्त सिद्ध होने के बाद भी जैन लगातार उच्च शासकीय पदों पर आसीन लोगों के यहां भटकते रहे। जैन ने राष्ट्रीय तथा राज्य मानवाधिकार आयोग के सामने भी न्याय की गुहार लगाई। उनकी व्यथा सुनकर देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वेंकटचलैया ने मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत पत्र लिखकर जल्द से जल्द न्याय दिलाने की बात कही थी। इन सब दबावों के बाद भी उन्हें कोर्ट से दोषमुक्त सिद्ध होने के 9 साल बाद और सेवा से बर्खास्त होने के 25 साल बाद सन 2002 में पूर्व पद समिति प्रबंधक का वापस मिला।

जिन्दगी के पचीस साल का संघर्ष बिना किसी अपराध के झेलने वाले निर्मल जैन ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि न्याय की लड़ाई अभी बाकी है। मानवाधिकारों की तिलांजलि देते हुए बैंक प्रबंधक ने उन्हें तीन हजार रू का मासिक वेतन देने का निर्णय किया। 25 साल की लड़ाई लड़ने के बाद यह घटना किसी सदमे से कम नहीं थी, और वह भी तब जब उनके समकक्ष अधिकारी 12 हजार या इससे ज्यादा पा रहे थे। इसके साथ ही उन्हें सेवानिवृत्ति की आयु से दो साल पहले ही हटा दिया गया। पूरे सेवाकाल के दौरान बन रहे भत्ते, ग्रेच्यूटी आदि की समस्त धनराशि जो करीब 17 लाख के आस पास थी, उसके जगह सहकारी बैंक ने उन्हें दिये मात्र 1.46 लाख रुपये। नर्क सी बन गई जिन्दगी का यह मात्र एक पहलू है।

इसके अलावा आपातकाल के दौरान एक वर्ष से ज्यादा समय दमोह जिले के जेल में काटने के बाद, आज तक उन्हें लोकनायक जयप्रकाश सम्मान से वंचित रखा गया है। जिसके तहत 6 हजार रुपया महीना आजीवन सम्मान निधि दी जाती है। निर्मल जैन के पक्ष में दमोह के कलेक्टर तथा लोकतंत्र रक्षक मीसाबंदी संघ भी सिफारिश कर चुके हैं, लेकिन वे अभी भी इस सम्मान तथा धनराशि से वंचित होकर अनाज बेचने का फुटकर काम कर रहे हैं। अपने जीवन की परवाह किये बिना जिस व्यक्ति ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक वर्ष से ज्यादा का समय जेल में बिताया, वह आज दर-दर की ठोकरे खाने के लिए मजबूर है।

34 सालों से लड़ी जा रही यह दु:खद दास्ताँ यहाँ भी खत्म नहीं होती है। नौकरी चले जाने और मुकदमे के खर्चे के कारण घर की माली हालत बहुत खराब हो गई थी। जिसके कारण परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो गया था। आर्थिक तंगी के कारण मकान भी बेचना पड़ गया। पूरा परिवार ने धर्मशाला में जाकर शरण ली। इस दौरान बीत रही मानसिक प्रताड़ना के कारण जैन के इकलौते पुत्र और एक पुत्री ने आत्महत्या कर ली। जैन की माँ क्षय रोग से पीड़ित होने के बाद इलाज की कमी के कारण भोपाल के गांधी नगर आश्रम में तड़प- तड़प कर मर गई। पत्नी पिछले 25 सालों से भयंकर पेट दर्द से पीड़ित है, तथा इस दु:ख और प्रताड़ना के कारण अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है।

आखिर क्या कारण हैं कि स्वतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाले निर्मल जैन को लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल का विरोध करने के कारण इतना कष्ट झेलना पड़ा?  आपातकाल से शुरू हुई उनकी लड़ाई दो बच्चे वा माँ को खोने के बाद आज भी जारी है। 34 सालों से न्याय की आस में निर्मल ने जो मानसिक, शारीरिक, आर्थिक प्रताड़ना झेली आखिर उसकी भरपाई कौन करेगा? इस प्रकरण के विषय में जब निर्मल जैन से बात की तो उन्होंने स्थानीय विधायक से लेकर राज्य सरकार तक फैले भ्रष्टाचार को अपनी बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बताया। विकास की नई से नई मिसालें पेश करने वाली सरकारें आखिर निर्मल जैन जैसे प्रकरण सामने आने के बाद आँखे क्यों मूंद लेती हैं? उभरते, चमकते भारत की तस्वीर पेश करने वाली ये सरकारें आखिर एक आदमी की सुध क्यों नहीं ले रहीं हैं? अपना सबकुछ गवां चुके जैन की आँखों में अभी भी आशा है न्याय पाने की।

लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि न्याय की कसौटी क्या होगी? निर्मल जैन और उनके परिवार पर इन 34 सालों के दौरान हुई मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक क्षति की भरपाई की बात तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए क्योंकि निर्मल जैन की तंत्र से लड़ाई की कहानी तो अभी भी जारी है। श्री जैन को न्याय दिलाने के लिए क्या कोई जनसंगठन आगे आएगा। श्री निर्मल कुमार जैन का फोन नंबर है- 09329117290  और उनका पता है निर्मल कुमार जैन,द्वारा हिंदुस्तान ट्रेडर्स, मोदी केमिस्ट, नया बाजार नंबर-2, दमोह (मप्र)।

लेखक देवाशीष मिश्रा माखनलाल चतुर्वेदी विश्‍वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र हैं.


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