एक अखबार के प्रकाशक का खुला पत्र डीएवीपी महानिदेशक के नाम

E-mail Print PDF

डीएवीपी किसी भी अखबार के लिए संजीवनी का काम करता है, खासकर छोटे अखबारों के लिए. छोटे अखबारों को बिना डीएवीपी किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, डीएवीपी के लिए कितनी भागदौड़ चिरौरी करनी पड़ती है, इसे आम पत्रकार या आम आदमी नहीं जानता है. डीएवीपी के लिए कई बार प्रयास करने के बावजूद यहां के नियम-कानूनों से परेशान न्‍यूज ऑफ जेनरेशन एक्‍स के संपादक मोहित कुमार शर्मा ने डीएवीपी के महानिदेशक को एक खुला पत्र लिखा है.

मोहित ने पत्र में खुद के साथ एवं छोटे अखबारों के साथ आने वाली समस्‍याएं तथा डीएवीपी में मौजूद गड़बडि़यों के बारे में भी लिखा है. कई बार पत्राचार करके हार चुके मोहित भड़ास के माध्‍यम से अपनी आवाज डीएवीपी के महानिदेशक तक पहुंचाना चाहते हैं. नीचे मोहित द्वारा लिखा गया पत्र-

सेवा में

महानिदेशक डीएवीपी
नई दिल्ली

विषय:- लघु समाचार पत्रों को उदारतापूर्वक मान्यता प्रदान किये जाने के सम्बंध में

महोदय,

भारत सरकार द्वारा डीएवीपी का गठन समाचार पत्रों में केन्द्र सरकार की नीतियों के प्रचार-प्रसार एवं अखबारों को आर्थिक मजबूती देने के लिए किया गया था। इस विभाग पर लाल फीताशाही कुछ इस कदर हावी हो चुकी है कि विज्ञापन मान्यता के नाम पर इतना गोलमाल किया जा रहा है, जिससे न तो सरकार का भला हो रहा है, न ही अखबारों का हित सध रहा है। झूठ एवं फरेब के मायाजाल पर तैयार कागजों के दम पर सरकारी पैसे की लूट हो रही है। डीएवीपी भी आंखें मूंद कर बैठी है। नेताओं से लेकर महकमे के अधिकारियों में जिसकी घुसपैठ है,  वह विज्ञापन में मालामाल है। मैंने आपके विभाग के इस गोरखधंधे को जानने के लिए आरटीआई का सहारा लिया तो वहां भी जबाव गोलमाल मिले। खैर यह तो आप जाने कि आपको अपने विभाग को कैसे चलाना है लेकिन इतना तय है कि यदि आप खुद कागज पेन लेकर हिसाब लगाने बैठेंगे तो मेरी हर बात आपको सच नजर आयेगी। प्रसार संख्या के खेल से लेकर समाचार पत्रों में मुद्रित होने वाली सामग्री के आधार स्रोत्र, रिपीटेशन, रिप्रोडक्शन आदि नियमों के जंजाल में लघु पत्रकारिता दम तोड़ती नजर आ रही है।

महोदय मैं खुद 2007 से एक दैनिक समाचार पत्र न्यूज ऑफ जेनरेशन एक्स का प्रकाशन कर रहा हूं। आपके यहां मैंने दो दफा फाइल लगायी लेकिन वह रिपीटेशन एवं रिप्रोडक्शन के नाम पर रिजेक्ट हो गयी। अगस्त 2010 में ऑनलाइन आवेदन के बाद मन ही नहीं हुआ कि आपके यहां फाइल लगाऊं सो हार्ड कॉपी जमा ही नहीं की। फरवरी 2011 में भी फाइल नहीं लगायी। महोदय मैंने अखबार को अपना करियर बनाया था। बीजेएमसी एवं एमजेएमसी करने के बाद विधिवत रूप से कई अखबारों में काम करने के बाद मैंने एक दैनिक समाचार पत्र का स्वामी बनने का साहस किया। मुझे गर्व है कि मैं एक लघु समाचार पत्र का स्वामी हूं लेकिन विज्ञापनों का अभाव एवं डीएवीपी से एप्रूव न होने का ऐसा तमगा मुझे मिला कि सरकारी विज्ञापन को मेरा अखबार तरसा रहा। चार साल एक अखबार के मालिक के रूप में मैं इस बात को समझ चुका हूं कि प्रसार संख्या का खेल जब तक रहेगा, मेरे जैसे दुस्साहसी प्रकाशकों का अंत होते देर नहीं लगेगी। मेरा उद्देश्य आपका ध्यान इस समस्या की ओर अवगत कराना है, हालांकि मेरी बिरादरी के कई लोग मुझे समझा चुके हैं कि चुपचाप किस तरह से अखबार को एप्रूव कराकर उसको जिंदा रखा जा सकता है। महोदय कम खर्च का अखबार प्रिंट कर मुझ जैसा प्रकाशक अपने शहर या जिले में जिंदा रह सकता है लेकिन आपके यहां विज्ञापनों के रूप में धड़ल्ले से मुनाफे की मोटी फसल काट रहे कई अखबार जादुई प्रेस पर छपकर अपने मालिकों को संजीवनी प्रदान कर रहे हैं।

बात हम आपकी विज्ञापन नीति 2007 से प्रारम्भ करते हैं। आप दो हजार से कम प्रसार संख्या वाले अखबारों को विज्ञापन लायक नहीं समझते, लेकिन आप जरा अर्थगणित पर नजर दौड़ायें तो आपका पता चल जायेगा कि देश भर में यदि इस गणना को लागू किया जाये तो शायद पांच सौ अखबार छापने की हैसियत, आम प्रकाशकों तो छोडि़ए, पत्रकार संगठनों को चला रहे प्रकाशकों की भी नहीं निकलेगी। आपका एवं विभिन्न प्रदेशों की विज्ञापन नीति के तहत समाचार पत्र का न्यूनतम आकार चार पृष्ठ फुल साइज होने चाहिए। कम से कम लघु एवं मध्यम अखबार तो रील पर नहीं बल्कि शीट पर छपते हैं। इसकी कीमत मौजूदा बाजार दर से 80 पैसे से एक रुपये के बीच बैठती है। यदि एक प्रकाशक चार पेज का दैनिक अखबार 2000 प्रतियों में प्रकाशित करता है तो 30 दिन में उसका औसत खर्चा 50 से 60 हजार रुपये के बीच आयेगा। इसके बाद आता है प्लेट का खर्चा। यह भी 2 प्लेट बैठती हैं। बाजार दर में 100 से 125 प्लेट मेकिंग एवं 100 से 125 प्रिंटिग पर प्लेट का खर्चा आता है। प्रिंटिग का खर्चा न्यूनतम 6000 रुपये महीना। इसके बाद समाचार संकलन हेतु संवाददाता, फोटोग्राफर, टेक्निकल स्टॉफ का खर्चा औसतन 10 से 15 हजार के करीब बैठता है। यानी 2000 प्रसार संख्या बाले अखबार का मासिक खर्चा 70 से 80 हजार के बीच बैठता है। इसमें न्यूज संकलन एवं आर्टिकल आदि उपलब्ध कराने के लिए किसी न्यूज या फीचर एजेंसी का खर्चा शामिल नहीं है। कुल मिलाकर एक साल के प्रकाशन का खर्च तकबरीन नौ से दस लाख रुपये।

मजे की बात यह कि आपके पास 18 महीनों के बाद जो अखबार पहुंचते हैं। उनके पास प्राइवेट विज्ञापन न के बराबर होता है। लिहाजा आप यह सोंचे कि दो हजार अखबार भी छपते हो तो यह भी गलत है। बिना आमदनी के 10 लाख का खर्चा अखबार का प्रकाशक नहीं कर सकता। जमीनी धरातल पर होता यह है कि पांच सौ प्रतियों के साथ शुरू होने वाला प्रकाशन सिमट कर पचास सौ पर रह जाता है। यह किसी एक प्रदेश नहीं बल्कि समूचे देश की बात है। लाखों का दावा करने वाले पूंजीवादी अखबार भी शहरी क्षेत्रों में कुछ हजार के प्रकाशन से ही काम चला रहे हैं। चूंकि आपका महकमा सब कुछ जानकर भी अनजान बना हुआ है,  लिहाजा सीए की मुहर पर फर्जी सर्कुलेशन का अंकगणित कभी आपके महकमे नहीं लगाया। जब भी शिकायत होगी तो फंसना तो अखबार के प्रकाशक को ही है। लिहाजा आप पर क्या असर पड़ता है। इससे अच्छा होता कि आप लघु समाचार पत्रों को मान्यता उनकी प्रसार संख्या की जगह नियमितता के आधार पर देते। आपसे अनुरोध है कि या तो प्रसार संख्या के सभी दावों को सख्ती से परखा जाये अथवा लघु समाचार पत्रों को इससे मुक्ति प्रदान की जाये।

दूसरी ओर पत्रकार संस्थाओं के सहारे अखबारों का संचालन कर रहे चंद प्रकाशक मुनाफे की मोटी फसल काट रहे हैं। अगस्त 2010 में आवेदित जिन अखबारों को आपके विभाग द्वारा मान्यता दी गयी। उनके अथवा पत्रकार एवं प्रकाशक संस्थाओं के नेताओं के अखबारों के प्रसार की यदि आपका महकमा इमानदारी से जांच कर लें तो अपने आप ही आपके द्वारा संस्तुत 80 फीसदी लघु अखबारों का नाम पैनल से हट जायेगा। मेरा किसी अखबार या उसके मालिक अथवा आपके विभाग से कोई बैर नहीं है। मेरा आशय बस इतना है कि दूरदराज के छोटे शहर से हम जैसे पत्रकारों की भी आपके यहां सुनवाई हो। मूलभूत रूप से लघु समाचार पत्रों को मान्यता उनकी नियमितता के आधार पर सुनिश्चित कराकर आप एक ऐसा कदम उठा सकते हैं। जिसके द्वारा वास्तव में लघु समाचार पत्रों की समस्याओं का निदान हो पायेगा।

पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा में।

मोहित कुमार शर्मा

स्वामी/प्रकाशक/सम्पादक

दैनिक न्यूज ऑफ जेनरेशन एक्स

मुरादाबाद


AddThis