पुत्र ने संपादक पिता के खाते से उड़ाए लाखों रुपये, पुलिस नहीं कर रही कार्रवाई

E-mail Print PDF

गोरखपुर महानगर की पुलिस अपराधियों की धर-पकड़ तथा मामले के निस्तारण में कितनी सक्रिय है इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक माह का समय बीतने के बाद भी वृद्ध, बीमार पिता को नहीं मिल रहा है इंसाफ। पुलिस अभी तक जांच कर रही है कि क्या वास्तव में जो आरोप लगाये जा रहे हैं वह सही हैं अथवा नहीं। दोषी को एक माह से बुला रही है पुलिस लेकिन दोषी जो है वह अपने को कानून और पुलिस से ऊपर मानते हुए पुलिस को बीमारी का धोखा देकर भगा-भगा फिर रहा है।

ममला कुछ इस प्रकार है। राष्‍ट्र चिन्ह के संस्थापक व सम्पादक रामवचन प्रसाद का बीसों साल से ओरियन्टल बैंक आफ कामर्स बैंक रोड,  गोरखपुर में राष्‍ट्र चिन्ह के नाम से खाता है। उक्त खाते का संचालन शुरू से ही रामवचन प्रसाद बतौर मालिक करते चले आ रहे हैं। पिता-पुत्रों के बीच राष्‍ट्र चिन्ह के मालिकाना हक को लेकर काफी समय से विवाद चला आ रहा है। पिता अपने पुत्रों के अपराधों को अनदेखा करते आ रहे हैं,  लेकिन इनके पुत्र इन्हें हर तरह से परेशान करने की जिद किये बैठे हैं। राष्‍ट्र चिन्ह को हथियाने की नीयत से रामवचन प्रसाद जी के दूसरे पुत्र लालजी भ्रमर ने जब जनवरी 2011 में प्रयास किया और इसकी शिकायत जब रामवचन प्रसाद जी ने प्रशासन से की तो गुस्से से तिलमिलाये लालजी भ्रमर ने बैंक प्रबन्धक को अपने साजिश में लेकर राष्‍ट्र चिन्ह के खाते को पहले सीज करा दिया।

रामवचन प्रसाद ने जब काफी प्रयास करके अपने खाते को खुलवाया तो बैंक प्रबन्धक ने तत्काल खाता खुलने की सूचना लालजी भ्रमर को दे दिया। लालजी भ्रमर ने बीमार पिता से अस्पताल में ही एक चेकबुक पर हस्ताक्षर कराकर रख लिया था,  उस चेकबुकों पर स्वयं ही धनराशि भरकर जनवरी से लगायत जुलाई 2011 तक लगभग लाख रुपये का भुगतान ले लिया। इस बात की जानकारी रामवचन प्रसाद को हुई तो वह अवाक रह गये। रामवचन प्रसाद का कहना है कि उन्होंने बैंक प्रबन्धक को 3 मार्च 2011 को ही इस बात की सूचना दे दिया था कि 6 जनवरी 2011 के बाद जारी चेकबुक पर किसी भी प्रकार का कोई भुगतान न किया जाए। उसके बावजूद बैंक प्रबन्धक लालजी भ्रमर के साजिश में आकर उक्त खाते से विभिन्न तिथियों में लगभग लाख रुपये का भुगतान निकालने में सफल हो गये।

इस बात से नाराज रामवचन प्रसाद ने बैंक प्रबन्धक सहित पुलिस के आला अधिकारियों को लिखित रूप से अवगत कराया तथा लालजी भ्रमर व बैंक प्रबन्धक के विरूद्ध जालसाजी व गबन का आरोप लगाया तथा मांग किया कि उनके रुपये को उन्हें वापस दिलाया जाए। इस बात की लिखित सूचना रामवचन प्रसाद द्वारा कैंट गोरखपुर की पुलिस से लगायत डीआईजी व आईजी को भी दी गयी लेकिन परिणाम शून्य ही है। कैंट थानान्तर्गत जटेपुर की पुलिस आज तक मामले की जांच पूरी नहीं कर पायी है,  जबकि आईजी विजय कुमार ने व्यक्तिगत रूप से रूचि लेते हुए अपने पीआरओ से तत्काल कैंट थाने पर फोन के माध्यम से प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी का आदेश दिया था। वहीं इस मामले की जांच कर रहे उपनिरीक्षक का कहना है कि वह लगातार लालजी भ्रमर से सम्पर्क करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनसे सम्पर्क नहीं हो पा रहा है। लालजी भ्रमर का कहना है कि वह बीमार चल रहे हैं इसलिए कहीं आ जा नहीं सकते।

यहां प्रश्‍न यह है कि जब आरोपी कहीं नहीं आ जा पा रहा है तो उसके अन्य कार्य कैसे हो रहे हैं। क्या पुलिस को इस मामले में सक्रियता दिखाते हुए दोषी के विरूद्ध विधिक कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। आखिर कब तक सबल लोग कानून और प्रशासन से खिलवाड़ करते रहेंगे? एक माह का समय बीतने के बाद भी क्या अब पुलिस इस मामले में ठोस विधिसंगत कार्रवाई करते हुए रामवचन प्रसाद जी को न्याय दिला पायेगी? 86 वर्षीय वृद्ध और बीमार रामवचन प्रसाद जी इसी आस में आज भी बैंठे हैं कि शायद अब भी उनके साथ न्याय हो! यदि जीते जी उनके साथ न्याय नहीं हुआ और दोषी को सजा नही मिली तो उनके मरने के बाद मिलने वाले न्याय का क्या लाभ?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


AddThis