अब चुप क्यों हैं सिद्दीकी, हेमंत और प्रभात?

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: काहे फट गया यूपी के मुखर पत्रकारों का नगाड़ा : यशवंत सर, नमस्‍ते। आपके भड़ास पर लखनऊ के पत्रकारों की करतूतों पर खूब लिखा गया है। भड़ास पर छपे कई ऐसे महान पत्रकारों ने भी अपनी लेखनी तोड़ी है, जिसमें क्रांति की ज्‍वालाएं भड़कती दिखी हैं। उनके लेखों से साफ लगता था कि अब पत्रकारों की दलाली पर लखनऊ के पत्रकार चुप नहीं रहेंगे और आग लगा कर सारा कुछ स्‍याह-सफेद कर देंगे।

इसकी शुरूआत की थी आपने हिसामुल इस्‍लाम सिद्दीकी के उस लेख से जिसमें उन्‍होंने कई धाकड़ पत्रकारों की इस करतूत का खुलासा किया था जिन्‍होंने हजरतगंज के सौंदर्यीकरण की योजना में करोड़ों रूपये पी लेने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में शरद प्रधान ने उन्‍हें कांग्रेस का दलाल करार दे दिया। इसके बाद दसियों साल से बेरोजगारी में दारू-मुर्गा-मालपुआ नोंच रहे हेमन्‍त तिवारी को जोश आया और उन्‍होंने भी बेइमानों के खिलाफ ताल ठोंकने का ऐलान किया। बोले थे कि पत्रकारों की जन अदालत लगायेंगे और उनसे उनकी हैसियत और दलाली के आरोपों की कैफियत पूछेंगे। मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार एसोसियेशन के पिछले चुनाव में जमकर दुलत्‍ती खा चुके हेमन्‍त तिवारी का दावा था कि वे यह सारा काम 15 सितम्‍बर से पहले करेंगे ताकि पत्रकारिता के चेहरे पर लगी कालिख को दूर कर सकें।

इसके बाद पितरपक्ष में किन्‍हीं प्रभात त्रिपाठी ने अपना नाड़ा बांधा कि वे दलाल पत्रकारों की कलई खोलेंगे और यह काम करने का दायित्‍व उन्‍होंने पितरपक्ष के बाद नवरात्रि में करने का दावा किया। बड़ी हवा-हवाई तलवारबाजी करते हुए वे बोले थे कि उनके पास ऐसे-ऐसे पत्रकारों की दलाली और बेइमानी के ऐसे-ऐसे सबूत हैं कि पूरा यूपी थर्रा उठेगा। लेकिन हैरत की बात है कि इन सभी तलवारबाज जमूरों ने केवल हवा में ही तलवारें भांजीं, नतीजा कुछ नहीं निकला। जरा इनसे पूछिये तो सही कि आखिर इन लोगों ने अपना इरादा क्‍यों त्‍याग दिया। कहीं ये लोग ही तो सबसे बड़े दलाल नहीं हैं और इसीलिए अब खुद ही चुप्‍पी साध गये हैं। मेरा अनुरोध है कि मेरे नाम या ईमेल पते को आप सार्वजनिक न करें।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


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