भड़ास4मीडिया फिर फंसा संकट में

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जनसत्ता अखबार जब अपने चरम पर था, सरकुलेशन इतना ज्यादा दिल्ली में हुआ करता था कि मशीनें छापते-छापते हांफ जाया करती थीं तब प्रभाष जोशी जी ने अपने पाठकों से अखबार में संपादकीय लिखकर अपील की थी कि ''जनसत्ता को मिल-बांट कर पढ़ें, अपन की क्षमता अब और ज्यादा छापने की नहीं है''. तब दौर कुछ और था. अब दौर बदल गया है. अखबारों के सरोकार, संपादक व मालिक सब के सब बदल गए हैं. और तो और, पाठक तक बदल गए हैं. या यूं कहें कि भरी जेब वालों को ही सिर्फ पाठक - दर्शक माने जाना लगा है.

जो बीपीएल वाले घुरहू-कतवारू हैं, वे बाजार के लिहाज से अवांछनीय हो गए हैं. हालांकि मीडिया की अवधारणा व सरोकार इन्हीं बीपीएल वाले घुरहू-कतवारू के सुखों-दुखों से शुरू होकर राष्ट्र की नीतियों तक पहुंची थी ताकि उन नीतियों के कुप्रभाव-सुप्रभाव से बीपीएल वाले घुरहू-कतवारू को बचाया-सिखाया जा सके. लेकिन बाजार ने अब सबकुछ को मुद्रा मुद्रित बना रखा है.

ऐसे में नए जमाने की सच्ची पत्रकारिता की झलक वेब-ब्लागों में नजर आने लगी है. कम पूंजी और कहने-लिखने की आजादी ने वेब-ब्लाग को नए जमाने का सबसे तेजी से लोकप्रिय होता व पसंदीदा माध्यम बना दिया है. हिंदी फांट के यूनीकोडेड होने, हिंदी ब्लागिंग के तेजी से फैलने, वेब-पोर्टलों के बनने-लांच होने और इंटरनेट व ब्रांडबैंड के तेजी से विस्तार ने वेब-ब्लाग पत्रकारिता को कई पंख लगाए हैं. बेहद विनम्रता से मैं कुबूल करता हूं कि नशे-नशे में शुरू किया गया भड़ास4मीडिया मेरी उम्मीदों से बेहद अधिक विस्तार कर गया है. इसके पोर्टल के साथ मैं खुद भी हर रोज कुछ न कुछ सीखता रहा. संसाधन व कंटेंट जुटाने के लिए लड़ता-भिड़ता-जूझता रहा. दुनियादारों व समझदारों के आरोपों और शक की निगाहों से जूझता हुआ मैं बड़े-बड़े मीडिया हाउसों के दबावों-धमकियों से टकराता-जूझता रहा. पर हारा नहीं. यह वेबसाइट कई बार अटैक की शिकार हुई, कम संसाधन के कारण इसका संचालन बाधित हुआ लेकिन हर रोज सीखने, नया कुछ करने के जुनून व नए मिले अजीज दोस्तों की मदद से इसे उबारकर, बढ़ाकर आगे ले जाता रहा.

कम लोगों को पता होगा कि भड़ास4मीडिया की शुरुआत मैंने अपनी एक महीने की एडवांस मिली सेलरी से किया था. यह रकम लगभग 45 हजार रुपये के आसपास थी. इसी पैसे में वेबसाइट बनवाया, कुल पांच हजार रुपये में, 24 हजार रुपये में लैपटाप लिया और तीन-चार हजार रुपये में रिलायंस का इंटरनेट डाटा कार्ड. घर से ही शुरू हो गया. छह महीने बेहद मुश्किल में गुजरे. पड़ोस के पान वाले से सौ-दो सौ रुपये उधार लेता था, झूठ बोलकर कि बैंक बंद है. गाड़ी की किश्त भरने के नाम पर कुछ मित्रों से पैसा लिया और उससे घर का खर्च चलाया. पत्नी रोती थीं कि जाने क्या कर रहे हैं, आफिस जाना बंद कर दिया है और पता नहीं क्या करते रहते हैं घर में बैठकर. दिन भर काम करता और रात में एक पव्वा दारू का चढ़ाकर फिर शुरू हो जाता इंटरनेट आन करके. बहुत कम पुराने दोस्त काम आए. ज्यादातर ने एरोगेंट, आफेंसिव व एनार्किस्ट मानकर कन्नी काट लिया था. नए दोस्त मिले. शुभचिंतक सामने आए. थोड़े बहुत पैसे आने लगे तो मैं खुद को दुनिया का बेहद सफल आदमी मानने लगा.

साल भर गुजरने के बाद आर्थिक स्थिति संतोषजनक होने लगी. आफिस मेनटेन किया. एकाध-दो साथी साथ रखे. दो-चार साथी पार्ट टाइम पर रखा. घर-आफिस के खर्च के बाद भी कुछ पैसा बचने लगा. भड़ास4मीडिया ने देखते ही देखते इतना बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लिया कि मैं इस पोर्टल के संचालन के प्रति दिन प्रतिदिन ज्यादा चिंतित रहने लगा. ज्यादा ट्रैफिक के कारण वेबसाइट कई बार बंद होने लगी. तब इसे दूसरे सर्वरों पर ट्रांसफर किया गया. लेकिन हर जगह शेयर्ड होस्टिंग ही थी. शेयर्ड होस्टिंग बोले तो एक सर्वर पर ढेर सारी वेबसाइट्स के बीच भड़ास4मीडिया भी. लेकिन अब वो दिन आ गया है जब मुझे आप सभी से अपील करना पड़ रहा है कि भड़ास4मीडिया को साथ मिलकर देखें-पढ़ें और कम से कम देर तक खोले रखें. आप जितनी देर तक इसे खोले रखते हैं, उतनी ज्यादा बैंडविथ कंज्यूम होती है. उतना ज्यादा शेयर्ड होस्टिंग का सिस्टम गड़बड़ाता है.

पिछले कुछ हफ्तों से भड़ास4मीडिया दिन के पीक आवर में बार-बार बाधित हो रही है, इरर आने लगा है. अभी हम शेयर्ड होस्टिंग पर साढ़े पांच हजार रुपये महीने खर्च करते हैं. सोचिए, कभी पांच हजार में एक साल के लिए साइट बनी भी थी और होस्ट भी हुई थी और अब साढ़े पांच हजार रुपये महीने देने पड़ रहे हैं. 220 जीबी बैंडविथ प्रत्येक महीने इस्तेमाल हो रहा है. 24 घंटे में साढ़े छह लाख हिट्स हो रहे हैं. सपना सरीखा लगता है यह. लेकिन सच है यह. आंकड़े मंगा कर देख सकते हैं. मेरे तकनीकी साथी का कहना है कि ये तो शुरुआत भर है. जो ट्रेंड साइट शो कर रही है उसके मुताबिक अगले छह महीने में यह वर्तमान में जिस औकात में है, लगभग उसकी डबल हो जाएगी. अपने वर्तमान औकात में यह साइट शेयर्ड सर्वर पर चलने की सारी सीमाओं को लांघ चुकी है. शेयर्ड साइट होस्ट करने वाली कंपनी की तरफ से चेतावनी रूपी पत्र आ गया है, एक अक्टूबर से व्यवस्था देख लो. पढ़िए ये दो पत्र-


Dear Yashwant ji,

Please find below the traffic report from 27-Aug-10 to 22-Sep-10) . In approx 25 days traffic usage has been 186 GB against the agreed limit of 125 GB per month. Looking at the trends I calculate that monthly traffic is reaching around 220GB. At this stage, it is important that you look for a VPS or a dedicated server to maintain the status of the site that it is gradually achieving. If you can specify monthly budget that you would want to afford for a VPS/dedicated solution, I may help you with finding something useful.

Regards,

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Dear Yashwant Ji

The server is having problems and problems are expected to continue to come in the next week as well. Hence please be aware that there may be periodic downtime for 10-15 minutes every day. But be assured there won’t be any data loss or any unexpected event. It is a well monitored event and we will cause the mysql to stop when we see any serious problem to the server and hence the downtime.

Because of these issues we have to take actions on our server and possibly down it. We will take action on server on 1-Oct-10. As discussed, please ensure that you are able to move your site off from our servers by end of this month.

Regards

xxxxxxxxx


इसी कारण सूचना ये है कि इस साइट को जल्द से जल्द किसी डेडीकेटेड सर्वर पर ले जाना है. इसके लिए बीस हजार से पच्चीस हजार रुपये महीने लगेंगे. अन्यथा यह वेबसाइट अत्यधिक ट्रैफिक के दबाव में नष्ट होने लगेगी. लेकिन सवाल यही है कि बेहद छोटे मीडिया हाउसों के दो, पांच, पंद्रह हजार रुपये महीने के कुछ विज्ञापनों की कमाई से हम लोग भड़ास4मीडिया से जुड़े लोगों का खर्चा निकालें या फिर भड़ास4मीडिया को चलाने में होने वाले सर्वर के खर्च में लगाएं. बिकने के मौके कई बार आए लेकिन हम लोगों ने उस रास्ते को नहीं अपनाया. जिन लोगों ने विज्ञापन दिया, उनकी ओर से आने वाली प्रेस विज्ञप्तियों, सूचानाओं को छापा. और जिन लोगों ने नहीं दिए, उनकी भी विज्ञप्तियों, सूचनाओं को छापा. हां, कुछ साथी जो भड़ास4मीडिया से जुड़े सरोकार व संवेदना को समझ पाए, वे नियमित तौर पर कुछ न कुछ मदद करते रहे जिससे हम लोगों को दिक्कत नहीं आई. पर हम लोग कई फंड इकट्ठा नहीं कर सके हैं. हम लोग कोई बैंक बैलेंस नहीं बना पाए हैं. यह इरादा भी नहीं है.

जिस दिन पूंजी के चक्कर में पड़ जाएंगे उस दिन भड़ास4मीडिया से भड़ास शब्द की प्रासंगिकता गायब हो जाएगी. फिर पीआर4मीडिया टाइप की वेबसाइट हो जाएगी भड़ास4मीडिया. और ऐसी पीआर4मीडिया टाइप वेबसाइटें हिंदी में आने भी लगी हैं. कई ऐसी भी वेबसाइटें आने लगी हैं जो सिर्फ कंटेंट चोरी के दम पर संचालित होती हैं. उनके संपादकों का काम पीआर करना होता है. बेहतर नौकरी हासिल करना होता है. खैर, जाके रही भावना जैसी. खुले बाजार का दौर है. किसी को कुछ भी करने से नहीं रोका-टोका जा सकता. कहना सिर्फ यह चाहता हूं कि अगर आप लोगों में से कुछ ऐसे लोग आगे आ सकें जो प्रत्येक महीने के लिहाज से या वार्षिक लिहाज से कोई रकम हम लोगों को दे सकें ताकि भड़ास4मीडिया के डेडीकेटेड सर्वर पर जाने से आने वाले नए खर्च का भार वहन कर सकें, तो बड़ी कृपा होगी.

यह भी एक तरह का भीख मांगना ही है. लेकिन बड़े संदर्भों में देखें तो मैं उनके पास हाथ फैला रहा हूं जिनकी पक्षधरता के लिए इस साइट का संचालन करता हूं. बड़ा आसान है उनके आगे हाथ फैलाना जो नहीं चाहते कि उनके बिजनेस की बर्बरता के बारे में भड़ास पर कुछ छपे. वे बुलाते रहते हैं, पुचकारते रहते हैं, विज्ञापनों के प्रलोभन देते रहते हैं. लेकिन हम लोग उन्हें दूर से ही नमस्कार करते हैं. विज्ञापन उन्हीं के लिए जिनका लेने का दिल हुआ. या फिर जिन्होंने कंटेंट सपोर्ट नहीं मांगा, सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन चलवाया. जिन्हें मैं चाहता हूं, उनकी अच्छाइयों की वजह से, उनके मैं साथ खड़ा हुआ. उन्होंने विज्ञापन दिए तो लेने में हिचका भी नहीं. रेट की कभी किसी से बारगेनिंग नहीं की गई. जिसने जो रेट लगाया, स्वीकार किया. यही कारण है कि हम लोग आर्थिक मोर्चे पर तभी तभी सक्रिय हुए जब-जब पैसे सारे के सारे चुक गए. और, जब कहीं से कुछ आ गया तो तब तक कंटेंट में डूबे रहे जब तक कि वह खर्च न हो जाए. इसी कारण उस जनता के पास हम जाना चाह रहे हैं जिसे लगता है कि भड़ास4मीडिया में उसकी आवाज है, भड़ास4मीडिया में साहस है, भड़ास4मीडिया में तेवर है, भड़ास4मीडिया उसका अप्रत्यक्ष दोस्त, साथी व जिंदगी व दिनचर्या की जरूरत है. ऐसे लोगों से मदद मांगना अगर भीख मांगना है तो समझिए हम भीख ही मांग रहे हैं.

अगर ऐसा न हुआ तो मेरे पास दो विकल्प हैं. एक यह कि इस वेबसाइट को बेच दिया जाए, जिस भी दाम पर बिके. 50 लाख रुपये तक की इसकी बोली लग चुकी है. न चला पाने की स्थिति में इसे किसी भी औने-पौने दाम पर बेचकर इससे छुटकारा पा सकता हूं. दूसरा विकल्प यह है कि कुछ बड़े मीडिया हाउसों के साथ गठजोड़ करें और उनसे पैसे लें. यहां मैं साफ कर देना चाहता हूं कि भड़ास4मीडिया न तो कोई प्रेस है, न न्यूज चैनल और न पंजीकृत मीडिया संगठन. हम न तो कोई सरकारी लाभ पाते हैं और न ही सरकारी विज्ञापन और न ही पत्रकार व मीडिया होने के लाभ. हम यह सब न लेकर भी खुद को 90 फीसदी ईमानदार घोषित करते हैं. दस प्रतिशत बेइमानी, अगर बेइमानी है तो यह है कि हम अपने यहां जिन कुछ मीडिया हाउसों के विज्ञापन लगाते हैं या उन्हें कंटेंट सपोर्ट देते हैं, उनके खिलाफ आक्रामक नकारात्मक खबरें नहीं छापते, छापते भी हैं तो कम छापते हैं. हालांकि कई बार या अक्सर विज्ञापनदाताओं के यहां होने वाले नकारात्मक घटनाक्रमों को भी प्रमुखता से हम लोगों ने छापा है, वह भी तब, जब उनका विज्ञापन लगा हुआ था. यह मानकर कि अगर वे अपने विज्ञापन हटा लेंगे तो हटा लें, उनके विज्ञापन के दम पर हम लोग जिंदा नहीं हैं.

प्रचंड बाजारवादी दौर में खुद के व इस पोर्टल के सरवाइवल के लिए इतनी बेइमानी हम करते हैं और इसे स्वीकारने में मुझे कोई झिझक नहीं है. मेरा इसके उलट एक बात और कहना है कि जो अपने को सौ फीसदी ईमानदार घोषित करे और वह किसी उद्यम में हो, तो वह बहुत बड़ा झूठ बोल रहा है. अगर किसी प्रोडक्ट पर कमीशन रूपी लाभ लेकर कोई दुकानदार खुद को सौ फीसदी ईमानदार घोषित करता है तो मैं उससे बड़ा ईमानदार हूं. एक पत्रकार के उद्यमी बनने की जब कभी कथा लिखूंगा, उद्यमी के अर्थशास्त्र की व्याख्या करूंगा तो मैं अपने सारे अनुभवों को विस्तार से लिखूंगा ताकि मेरे जैसे दूसरे लोग खुद का कोई काम शुरू करें तो उन्हें कुछ बेसिक अनुभव व जानकारियां मिल सकें. मैं अपने अनुभवों पर हर वक्त चर्चा के लिए तैयार भी रहता हूं. इसी साफगोई व ईमानदारी की ताकत है कि कोई आजतक यह नहीं कह सका कि मैंने उससे पैसे लिए तो लौटाए नहीं या मैंने उससे पैसे हासिल करने के लिए दबाव बनाया.

सैकड़ों अज्ञात नंबरों से फोन आए होंगे मेरे पास, भड़ास4मीडिया पर विज्ञापन लगाने के लिए, रेट की जानकारी के लिए या लाखों रुपये का विज्ञापन देने के लिए, लेकिन उन अज्ञात बंधुओं को रेट बजाने की बजाय गालियां देकर भगाने में ज्यादा मजा आया. कोई लोग पीछे पड़े कि यशवंत का स्टिंग किया जाए पैसा मांगते हुए लेकिन अपन की जुबान व दिल में पैसे की चाह हमेशा से बस उतनी ही रही जितने में दाल-रोटी चल जाए और जब दाल-रोटी चल जाने भर पैसे खुद ब खुद आने लगे हों तो किसी के प्रलोभन में कोई कैसे पड़ सकता है. सो, ढेर सारे लोगों की तमन्ना अधूरी है. अब उन्हें कोई कैसे समझाए कि फक्कड़ व फकीर को जो मजा किसी गाने में मिल सकता है, वो नोटों की गड्डियों में नहीं. महल-हवेली सब यहीं रह जाने हैं. अकेले आए हैं और अकेले चले जाएंगे. यही संदेश है जीवन का. लेकिन दुश्मन हैं कि बूझते नहीं, दोस्ते हैं कि मानते नहीं.

दूसरी तरफ देखिए तो बाजार की जो व्यवस्थाएं हैं, घोषणाएं हैं... एयरकंडीशनर के सुकून, विपरीत सेक्स के साथ जीवन के सुख-दुख, कारों की फर्राटा दौड़, फास्ट फूड के आनंद, ग्लैमर की उत्तेजना, मुद्रा मोचन के बाद मिलने वाले कथित ऐशो-आराम व रोमांच, इंद्रिय जन्य सुखों को सबसे परम सुख बताना... यह सब हम सभी को भ्रष्ट से भ्रष्टतम, निकृष्ट से निकृष्टतम, संवेदनहीन से परम अमानवीय होते जाने के लिए बाध्य कर रहे हैं. और इस दौड़ में हम कब खुद को लूटतंत्र का हिस्सा बना लेते हैं, स्टिंग के शिकार हो जाते हैं, दिल व आत्मा से कमजोर हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. लेकिन संवेदनशील आदमी जहां भी होता है, वहीं से ही अपने दम पर, अपनी सीमाओं में वृहद सोच के साथ कई तरह के काम करता रहता है कि ताकि दुनिया में अच्छे लोगों को अच्छे होने के चलते मिलने वाले बाजारू दुखों से कोफ्त न हो.

आप मदद करें या न करें, दुनिया चलती रहेगी. मैं भी जीता रहूंगा. मन में एक दबी इच्छा थी, सो सोचा साझा कर लूं. जैसे हर मुश्किल वक्त कट गया, यह भी कटेगा. लेकिन किस रूप में कटेगा, मैं नहीं जानता. फिलहाल पिछले दो दिनों से परेशान हूं, दुखी हूं, बात-बात पर भड़क रहा हूं, जिससे बात कर रहा हूं उसको काटने दौड़ रहा हूं, डाक्टर के यहां बीपी चेक कराया तो उसने 140/100 बताया, ब्लड सैंपल लिया है वजह जानने के लिए कि इतना क्यों बढ़ा है, लेकिन वजह मैं जानता हूं. जुनून का हद से गुजरना कई बार पागलपन का रूप लेता है. लेकिन मैं पागल नहीं होना चाहता.

मैं अकेले शहीद नहीं बनना चाहता. लेकिन चोरों की बस्ती में एक और चोर बनने की भी तमन्ना नहीं है. भड़ास4मीडिया से मुक्ति के बारे में सोचने लगा हूं. आगे क्या है, इस बारे में समय-समय पर लिखता रहा हूं. दो साल और काम करने की इच्छा है. 40 के होने तक. फिर सिर्फ घूमने और गाते रहने का आनंद उठाना है. देखते हैं, समय किधर ले जाता है. लेकिन तत्काल तो आंखों के सामने भड़ास4मीडिया को शेयर्ड से डेडीकेटेड सर्वर पर ले जाने का मुद्दा है. कई कंपनियों से प्रपोजल मंगा चुका हूं. महीने के 20 से 30 हजार रुपये का बजट देखकर आंखें बंद कर लेता हूं. आंखें बंद कर लीजिए, फिर तो कोई संकट ही नहीं है. सारे संकट आखें खुलने तक हैं. लेकिन अभी आंखें बंद करने के बाद खोलनी भी पड़ती हैं. फिर वही सवाल सामने होता है. चलिए, तलाश शुरू करते हैं मददगारों, खरीदारों की. वो इस मार्केट इकानामी के लिए कहा भी गया है न, कुछ इसी तरह के शब्दों में कि...

जब तक बिका न था, तो कोई पूछता न था
तूने मुझे खरीद कर अनमोल कर दिया.

आंधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला.

हम अंजुमन में सबकी तरफ देखते रहे
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला.

आवाज को तो कौन समझता की दूर दूर
खामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला

कच्चे घड़े ने जीत ली नदी चढ़ी हुई.
मजबूत कश्तियों को किनारा नहीं मिला.

आभार के साथ

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क : This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it , 09999330099


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