'करियर बनाने दिल्ली आई थी, अब कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रही हूं'

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शाहला निगार: महिला पत्रकार ने हास्टल से नियम विरुद्ध बाहर किए जाने के खिलाफ संघर्ष शुरू किया : जामिया के वाइस चांसलर मौन हैं. देखते देखते एक महिला पत्रकार को मनमाने तरीके से हास्टल से निकाल फेंका गया लेकिन किसी अधिकारी - आयोग - प्रशासन की तंद्रा नहीं टूटी. निकाले जाने के पहले शाहला ने कोर्ट में स्टे के लिए याचिका दायर की थी लेकिन जब उन्हें जबरन निकाल दिया गया तो कोर्ट ने स्टे याचिका को अप्रासंगिक मान लिया.

अब इस मामले की सुनवाई 17 फरवरी को की जाएगी. शाहला लड़ाई को बंद करने के मूड में नहीं हैं. वे कहती हैं- अगर इसी तरह लड़कियां मुंह बंद कर सब कुछ सहती रहीं तो उन पर अत्याचार बढ़ता शाहला निगारजाएगा. मैं आखिरी दम तक न्याय के लिए लड़ूंगी ताकि किसी और लड़की को कल इस तरह के वाकये से दो-चार न होना पड़े. शाहला ने दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से भी मुलाकात की. शीला ने आश्वासन दिया कि वे इस मुद्दे पर कुछ करेंगी. देखना है कि वे क्या करती हैं. शाहला आज महिला आयोग पहुंचीं और अपनी आपबीती सुनाई. महिला आयोग ने कार्यवाही का आश्वासन दिया है. फिलहाल आश्वासनों के सहारे आगे बढ़ रही हैं शाहला. शाहला को उम्मीद है कि महिला आयोग, शीला दीक्षित, कोर्ट में से कहीं न कहीं जरूर इंसाफ मिलेगा. शाहला का कहना है कि उनका सामान जबरन फेका गया और जब उन्होंने अपने सामान को चेक किया तो काफी सामान मिसिंग है.

शाहला के मुताबिक - ''जिस दिन मुझे हास्टल से नियम विरुद्ध और जबरन निकाला गया, उस दिन मैं सुबह से भूखी थी, दोपहर दो बजे के आसपास हास्टल की एक रेजीडेंट ने मुझे अपने रूम पर बुलाकर ब्रेकफास्ट कराय. उस रेजीडेंट ने मेरे पर मानवता दिखाई लेकिन जामिया प्रशासन ने उसे सजा दे दी. उस रेजीडेंट को हास्टल खाली करने के लिए नोटिस थमा दिया गया है. उस रेजीडेंट से कहा गया कि ये वीसी साहब का आदेश है. इस वाकये से सभी रेजीडेंट्स डरी हुई हैं कि कब और किस बात पर किसको निकाल दिया जाए. मैं बताना चाहती हूं कि ये हास्टल मिनिस्ट्री आफ वोमेन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट के अंतर्गत आता है. मंत्रालय की तरफ से ही इसे फंड किया जाता है, सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव पार्ट जामिया के हाथ में है. इस समय इस हास्टल में एक तिहाई सीटें खाली हैं, फिर भी कोई नया एडमिशन नहीं किया जा रहा है. यहां कुछ रेजीडेंट्स ऐसी हैं जो 15 साल से ज्यादा समय से रह रही हैं. कुछ को उनका समय पूरा होने से पहले ही निकाल बाहर कर दिया जा रहा है. ये दोगलापन क्यों. जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और मैं एक्शन कराके ही दम लूंगी. प्रोवोस्ट और वार्डेन ये सारे अंधेरगर्दी वाइस चांसलर के नाम पर मचाए हैं. मैं दिल्ली अपना करियर बनाने आई थी लेकिन मुझे नहीं पता था कि कोर्ट, कचहरी, आयोग के चक्कर लगाने पड़ेंगे. मैं बहुत अपसेट हूं. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं.''

शाहला से संबंधित इसके पहले की खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें- महिला पत्रकार का हास्टल से सामान फेंका


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