पद्मश्री तो इस इलाहाबादी को मिले

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एसकेएस गौर: पर ये मारे-मारे यहां से वहां भटक रहे हैं : ऐसी खोज कर दी है कि देश की तकदीर संवर सकती है : खोज का पेटेंट भी करा चुके हैं : लेकिन बड़ी कंपनियों की आरएंडडी विंग इन्हें मालिकों तक नहीं पहुंचने दे रही : दर्जनों जगह दिखा चुके हैं करामात : इन दिनों दिल्ली में डाले हुए हैं डेरा : आप सबकी मदद की दरकार है इन्हें :

इनका नाम शैलेंद्र कुमार सिंह गौर है. इलाहाबाद के हैं. बीएससी करने के बाद एलएलबी किया लेकिन जो काम कर डाला वह एलएलबी की डिग्री से बिलकुल संबंध नहीं रखता. उन्होंने ऐसी तकनीक ईजाद की है जिसमें कोई भी सामान्य बाइक 0.36 लीटर (दशमवलम तीन छह) पेट्रोल में पचास किलोमीटर तक फर्राटे से दौड़ सकती है. आपको भी यकीन नहीं होगा, जैसे मुझे यकीन नहीं हुआ. लेकिन इनके पास मौजूद सारे कागजातों, पेटेंट के पेपर आदि को देखने के बाद आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा. सन 2001 की बात है जब उन्होंने बजाज बाक्सर बाइक को एक लीटर पेट्रोल में 115 से 125 किमी तक चला आए. उसके बाद वे लगातार शोध करते रहे. अपने शोध को पेटेंट कराने में जुटे रहे. अपने शोध का कई उचित मंचों पर प्रदर्शन किया और सर्टिफिकेट हासिल किया. 45 साल के इस बेरोजगार देसी वैज्ञानिक की तकनीक को अगर आटोमोबाइल इंडस्ट्री अपना ले तो चमत्कार हो जाएगा.

डीजल व पेट्रोल की खपत बेहद कम हो जाएगी, सो, इसके दाम भी कम हो सकते हैं जिससे डीजल-पेट्रोल जनित महंगाई धड़ाम से नीचे आ सकती है. डीजल व पेट्रोल पर ढेर सारे चीजों के दाम निर्भर होते हैं. शैलेंद्र कुमार सिंह गौर ने अपनी तकनीक का प्रदर्शन कई बड़ी कार व बाइक कंपनियों के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेक्शन में किया लेकिन आरएंडडी वालों ने तकनीक को मान्यता देने के बावजूद इसे अपने मालिकों तक पहुंचने नहीं दिया क्योंकि आटोमोबाइल इंडस्ट्री की आरएंडडी की टीम अरबों-खरबों रुपये खर्चा कराकर व सेलरी लेकर जो काम नहीं कर-करा पाई वह काम एक इलाहाबादी ने मिना कहीं से अनुदान मिले अपने दम पर दस वर्षों की अथक साधना के बल पर कर दिखाया. सच कहिए, इस इलाहाबादी को पद्मश्री नहीं मिलना चाहिए?

इसी इलाहाबादी को भारत रत्न के लिए नामित नहीं किया जाना चाहिए? लेकिन बाजार व कारपोरेट के शिकंजे में फंसी दुनिया की मुक्ति का काम अगर इतना आसान होता तो जाने कबका हो गया होता. बाजार वाले व कारपोरेट वाले कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसी चीजें हों जिससे बाजार से पैसा उगाहने की गति में कमी आए. या फिर कोई नया खिलाड़ी पैदा हो जाए और सारा मुनाफा वही ले जाए. इसी कारण डरी हुई कारपोरेट कंपनियों अपने पैसों से वैज्ञानिकों को खरीदकर अपने यहां शोध कराती हैं ताकि शोध के सफल नतीजों को वे अपनी कंपनी के नाम पेटेंट कराकर उसके प्रोडक्ट को बाजार में बेचें व भारी मुनाफा कमाएं. लीजिए, अपने इलाहाबादी शैलेंद्र कुमार सिंह से संबंधित कुछ खबरें, विश्लेषण, उनकी ईजाद की गई तकनीक का फार्मूला पढ़िए-देखिए, जो उन्होंने मेल के जरिए मुझे फारवर्ड किए हैं.

मेरी निजी अपील मीडिया के साथियों से है कि वे शैलेंद्र कुमार सिंह गौर के इस अविष्कार को खुद देखें-परखें और इनकी मुलाकात आटोमोबाइल इंडस्ट्री के उद्योगपतियों से कराएं जिससे ये सही जगह अपने हुनर का प्रदर्शन कर उसके उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करा सकें. इस नेक काम में मदद के लिए हर सभी का स्वागत है. शैलेंद्र कुमार सिंह गौर से कोई भी जानकारी आप उनकी मेल आईडी This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए ले सकते हैं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

THE  OLD  BIKE  WITH  NEW  RESULTS

1-RESULTS-

The 2001 model bajaj boxer motor bike after changes / modifications is now giving fuel economy / mileage of 115 to 125 km/l at approx  constant speed of 45 to 50 km/h at Allahabad and driver weight 65 kg.the results variation  depending upon the frequency of traffic obstacles.

The results for 50 ml in separate bottle with perfection of fuel measurement have been tested about more than 500 times with approx constant results of 5.9 to 6.1 km/50ml.[less variation in results because 6 km road with less obstacles] before changes / modification the mileage was 60 to 70 km/l with same driver and other parameters. The bike is ready for any demonstration

2-REASON--

The piston has been off-set maximum possible as shown in the attachment.Due to which the heat energy so far lost to the atmoshphere is better converted in to mechanical energy, we know that so far 26% of the content of the fuel is converted into mechanical work and rest 74% is lost to the atmoshphere in different forms as radiation exhaust etc. out of 26% exploitable so far 6% is lost in the internal friction and merely 20% reaches at wheel and is responsible for the current fuel economy. [approx data...there might be variation in present data]

3-MY BIKE--

The present prototype is at present exploiting approx 46% of the content of the fuel and approx 40% is reaching at wheel due to which is the current improvement in the mileage / fuel economy with maintaining same power of the bike as original.  [approx data based on resuls of road testing and logic]

4-REASON FOR INCOMPLETE REASULT--

The prototype has been prepared with the help of crude / road side engineering at allahabad where perfection up to the desired level was not possible. due to which desired changes in the conecting rod, crank and crank case etc are not possible.

5-THE BEST POSSIBLE RESULTS--

If the prototype is fabricated /made as per my guidance and design with perfection at a modern R&D center, the exploitation of energy from content of fuel would be more than 66% and the mileage of the prototype would  be with 200% approx improvement to the base data.

the changes has been done in petrol engine,but that could be applied to any engine running through any fuel as diesel,gas etc.The gain per fuel economy will variate as per fuel and its' current efficiency.

6-SUPPORTING WORK DONE BEFORE--

In 1920 Mr Russel Bourke claimed that his engine scotch-yoke desine will offer 300% improvement in fuel economy and a emission to negligible level but his design was not  same as calculated /perceived and scotch yoke was offering same design with different vision [scientifcally] and thats why he failed on testing.

7-R&D NEGATION BASE FOR BRIGHT POSSIBILITY--

A-  side thrust that will be actually less than the conventional design because the side thrust is major in power stroke where responsible factor sin of angle [in my design] is decreasing and maximum angle is approx same that in conventional with pressure inside substantiaaly less than conventional engine, for the reason that, only one third fuel will be burnt ,[approx half fuel being burnt in present prototyoe]

though the solution for any extra side thrust lies with the lenth of the connecting rod up to the practical limit.

B-  Durability is another point of concern as new thing needs but that is simply engineering problem as the new design contains changes in crank,crank case,connecting-rod and carburator or fuel-injector etc for which so many options in matterial and other concerned respect are available.

though in my opinion nothing new of engineering will be needed but only changes will have to be incorporared perfectly.

the prototype with crude engineering has so far been tested for about 15000+ kms on road and approx 14 hours in one shift in standby mode for about 20 times with acceleration for approx40 km/h,the bike has not shown any inconsistancy in results indicating durability.

C--the power of the bike has not been changed that means the results of improvement in the fuel economy are not at the cost of power as the bore,stroke and compression ratio for the bike are same as per base bike and on road testing it easy to get speed of 70+with total of about 200kg+.

8-MATHEMETICAL ANALYSIS--

The mathemetical analysis also support the results as the work done ratio with fix parameter for base engine to modified engine is 1533 to 3814 with common friction of 6% indicating approx 200% improvement for final complete prototype.

9-CURRENT STAUS--

The patent at india and America has been applied. PCT applied/achieved.

10-EXTRA-BENEFIT--

Road side pollution test data for CO is 0.17 for my bike[though crude testing but indicating major improvement in comparision, as with same machine] in comparision to new other bike which was 1.07. other emission parts decreases as per fuel saving percentage.

testing with Mr tutu Dhawan at delhi offered 156 km/l at delhi.perhaps for better fuel quality,free and smooth roads or poor /crude fuel measurement.[attachment]

एसकेएस की बजाज बाक्सर बाइक, जिसे वे अपने ईजाद की गई तकनीक के जरिए चलाते हैं.

एसकेएस गौर की बाइक को प्रदूषण प्रमाणपत्र

एसकेएस गौर की तकनीक से चलाई गई हीरोहोंडा कंपनी की बाइक को मिला प्रदूषण प्रमाणपत्र.

एसकेएस गौर की वो तकनीक जिसके जरिए वो एक बाइक के पेट्रोल खर्च को कई गुना बचा लेते हैं. फीगर-1

एसकेएस गौर की वो तकनीक जिसके जरिए वो एक बाइक के पेट्रोल खर्च को कई गुना बचा लेते हैं. फीगर-2

एसकेएस गौर की वो तकनीक जिसके जरिए वो एक बाइक के पेट्रोल खर्च को कई गुना बचा लेते हैं. फीगर-3

एसकेएस गौर की वो तकनीक जिसके जरिए वो एक बाइक के पेट्रोल खर्च को कई गुना बचा लेते हैं. फीगर-4


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