कैंसर वार्ड में छत निहारते हुए क्या सोचते हैं आलोक तोमर

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देश के जाने माने पत्रकार आलोक तोमर ने आज दिल्ली में अपने आवास पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शुक्रवार को होने वाली वर्कशाप और तम्बाकू विरोधी दिवस के लिए एक विशेष अपील जारी की. गौरतलब है कि आलोक तोमर इस समय गले के कैंसर से जूझ रहे है और उनका लगातार इलाज चल रहा है. अपील में आलोक तोमर ने तम्बाकू उत्पादों का इस्तेमाल करने वालों से इसे जल्द से जल्द छोड़ देने ने की गुजारिश की है. आलोक तोमर की पूरी अपील इस प्रकार है--

''हालाँकि मैंने लगभग २३ साल सिगरेट पी है मगर असल में तम्बाकू का स्वाद मुझे आज तक नहीं पता. मैं तो हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला जा रहा था और शायद तब तक उड़ाता रहता जब तक डाक्टरों ने कह नहीं दिया कि इस धुएं को नही छोड़ा तो खुद धुआं बनने में ज्यादा देर नहीं बची है. दरअसल छोड़ने पर भी बचने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी. फिर कैंसर का इलाज शुरू हुआ और सिगरेट का धुआं अचानक खतरनाक जहर मानी जाने वाली दावा कीमोथेरेपी में बदल गया. इसका इलाज बहुत महंगा है. अभी तक अलग अलग संसाधनों से बीस लाख से ज्यादा खर्च हो चुके हैं और पता नहीं यह आंकड़ा कहां तक जाएगा. कैंसर वार्ड में छत को देखते हुए अक्सर सोचता हूँ की अगर सिगरेट पर २३ साल में सौ रुपये के औसत से लाखों रुपए खर्च नहीं किए होते और इलाज का यह आंकड़ा जोड़ लेता तो अपनी और अपनों की बहुत सारी मुरादें पूरी कर लेता.

तम्बाकू जहर है. मगर इस जहर से हमारे देश की कल्याणकारी सरकार हर साल अरबों रुपए टैक्स और निर्यात में कमाती है. सरकार के जिन महापुरुषों ने इंडियन टोबैको कंपनी आईटीसी के मुखिया योगी देवेश्वर को पद्म विभूषण दिया है उन्हें जरा किसी कैंसर वार्ड में टहला कर लाना चाहिए. इन लोगों को खुद देखना चाहिए कि कैसे कैंसर का इलाज करवाने के चक्कर में लोगों के घर मकान बिक रहे हैं और तम्बाकू उत्पादों का विज्ञापन का खर्चा लगातार बढ़ता जा रहा है. सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर सिगरेट और तम्बाकू सेवन की मनाही की है, सजा भी तय की है मगर बड़े बड़े अफसरों के कमरे में ऊपर तक भरी एश ट्रे मिल जाती है. वे सरकारी नियमों का ही नहीं, अपना भी सत्यानाश कर रहे हैं.

आप इसे भले ही मौत से डरे हुए एक व्यक्ति का प्रायश्चित वाला बयान कहें मगर सच यह है कि परमाणु बमों से ज्यादा सिगरेट और तम्बाकू खतरनाक है. बम आपको एक मिनट में राख बना देता है और तम्बाकू आपको जीवन भर राख और जहर के खेतों की खाद बनाती रहती है. दुनिया के कई देशों ने कारोबार का लालच छोड़ कर अपने यहाँ तम्बाकू की खेती पर पाबंदी लगा दी है. वैसे भी तम्बाकू और कपास की खेती के मुनाफे में ज्यादा फर्क नहीं है. अगर हमारे देश को तम्बाकू बेचनी ही है और हमारे प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह को तम्बाकू के मामले में अपना धर्म द्रोह करना ही है तो उचित होगा कि तम्बाकू की कमाई सबसे पहले देश को कैंसर का मुफ्त इलाज उपलब्ध करने में खर्च की जाए और उस आम आदमी को जीते जी चिता होने से बचाया जाए, जो भोलेपन में  इस जहर का शिकार होता है. इस विष मुक्ति अभियान में जितने लोग जुड़ेंगे, देश का उतना ही कल्याण होगा.''

((आलोक तोमर की यह अपील लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने उनके घर पर लिखी))


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