भारतीय भाषाओं के अखबार संभवत: दुनिया के सबसे अंतिम कागजी अखबार होंगे

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: अभी कागज पर छपे अखबार खूब लहलहाएंगे : मारियो गार्सिया दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मीडिया डिजाइनर माने जाते हैं। अखबार की दुनिया उनको डिजाइनिंग गुरू मानती है। अपने 40 साल के लम्बे कॅरियर में 63 साल के मारियो 575 अखबार और वेबसाइट डिजाइन कर चुके हैं। मारियो क्यूबाई मूल के हैं और अमेरिका में काम करते हैं। अनेक देशों में कई भाषाओं के अखबारों को नया अवतार दे चुके हैं।

मारियो ने कॅरियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की और आज भी जब वह कोई अखबार डिजाइन करते हैं तो सम्पादकीय सामग्री ही उनके दिमाग में सबसे ऊपर रहती है। वह अपने आप में एक संस्थान हैं और पढ़ाना उन्हें सबसे अच्छा काम लगता है। मारियो ग्राफिक डिजाइन के टीचर के रूप में कई नामी विश्वविद्यालयों से जुड़े हैं। उनके सैकड़ों स्टूडेंट आज दुनिया के नामी अखबारों में काम कर रहे हैं। मारियो का मानना है कि लेखन, सम्पादन और डिजाइन का बेहतर मिलन ही किसी अखबार को सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

मारियो की ‘गार्सिया मीडिया’ ने जो सैकड़ों अखबार डिजाइन किए हैं उनमें ला ट्रिब्यून, डी मार्गेन, वॉल स्ट्रीट जनरल, कंसास सिटी स्टार, पेरिस मैच आदि प्रमुख हैं। भारत में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और एचटी समूह का ही बिजनेस अखबार ‘मिंट’ मारियो के डिजाइन की शानदार मिसालें हैं। वास्तव में मारियो रंगों और खाली स्पेस के संतुलित इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं। पिछले दिनों मारियो भारत में अपने कॅरियर के 576वें प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आए। प्रोजेक्ट था- ‘हिन्दुस्तान’ को नया कलेवर देना। इसी दौरान हमने उनके काम और दर्शन के बारे में बातचीत की। पेश है बातचीत के खास अंश-

मारियो, आपने दुनिया की कई भाषाओं के अखबारों को डिजाइन किया है। यह पहला मौका है जब आपने किसी हिन्दी अखबार को छुआ है। कैसा लगा?

शानदार और काफी कुछ सिखाने वाला! हिन्दी अखबारों का बाजार औरों से काफी अलग है। मुझे नहीं लगता किसी और भाषा का रीडर अपने अखबार में इतने सारे फोटो, इतने रंग और इतने इमोशन एक साथ देखना चाहता है। हिन्दी के अखबार खूब जीवंत और रूपहले हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के बाकी भाषाई पाठकों की तरह हिन्दी का पाठक भी अखबार से प्यार करता है। दुनिया भर में प्रिंट मीडिया आखिरी सांसें गिन रहा है। इंटरनेट और मोबाइल उसे लील रहे हैं। लेकिन भारत में नजारा उलट है। यहां जैसे प्रिंट मीडिया अपने शबाब पर आ रहा है। और जैसा कि रीडरशिप के आंकड़े गवाह हैं, इस शबाब में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी हिन्दी अखबारों की है।

दुनिया के कई मुल्कों में प्रिंट मीडिया आखिरी सांसें गिन रहा है, इस बात को जरा विस्तार से बताएंगे?

देखिए माना जा रहा है कि वर्ष 2040 में प्रिंट न्यूज पेपर दुनिया से विदा हो जाएगा। दुनिया का कोई भी कागजी अखबार तब नहीं बचेगा। सब कुछ डिजिटल हो चुका होगा। कई मुल्कों में, कई अंग्रेजी अखबार पहले ही अपना मृत्युलेख छाप चुके हैं। मैं यह कह रहा हूं कि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के अखबार संभवत: दुनिया के सबसे अंतिम कागजी अखबार होंगे। अभी भारत में बमुश्किल एक करोड़ लोग वेबसाइट या मोबाइल के जरिए समाचार पढ़ते हैं। मोबाइल के साथ अभी फोंट वगैरह की कई दिक्कतें जुड़ी हैं। इंटरनेट पर डाटा का फ्लो भी उतना तेज नहीं है। अभी सिर्फ एक दक्षिण भारतीय अखबार है जो टेबलेट पर अपना संस्करण लाने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब? यही कि भाषाई मीडिया में कुछ हिस्सों में डिजिटल ज्वार अभी आता नहीं दिखता। तब तक कागज पर छपे अखबार खूब लहलहाएंगे।

40 साल के अपने कॅरियर सबसे ज्यादा आनंद किन अखबारों को डिजाइन करने में आया? और कौन से प्रोजेक्ट थे जिन्हें आप आज याद नहीं करना चाहेंगे?

जर्मनी का डी जी और वॉल स्ट्रीट जर्नल के साथ मेरा तजुर्बा बहुत रोमांचक रहा। मुझे इन दोनों प्रोजेक्टों से बहुत संतुष्टि मिली। सच कहूं तो जिन 576 डिजाइन प्रोजेक्टों पर मैंने आज तक काम किया, उसमें से एक भी ऐसा नहीं जिसे मैं याद नहीं करना चाहूंगा। वे सब मेरे प्रिय हैं। मैंने अपने हर प्रोजेक्ट पर कुछ नया सीखा है।

आपके सैकड़ों स्टूडेंट आज दुनिया भर में, ऊंचे ओहदों पर काम कर रहे हैं। उनमें कौन हैं जिनमें आप सबसे ज्यादा संभावनाएं देखते हैं?

मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे कॅरियर में काफी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने का मौका मिला। आज भी 29 से लेकर 95 साल की उम्र के लोग मेरे स्टूडेंट की सूची में मिल जाएंगे। यह भी सच है कि टाइम मैगजीन, न्यूयार्क टाइम्स समेत दुनिया के कई बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में मेरे स्टूडेंट काम कर रहे हैं। उनमें से कई सचमुच बड़े प्रतिभाशाली हैं। किसी एक का नाम लेना जरा मुश्किल है।

भविष्य का अखबार कैसा होगा?

भारत में फिलहाल तो कागजी अखबार ही निकलेगा। लेकिन भविष्य का अखबार जाहिर है डिजिटल ही होगा। शायद कंप्यूटर स्क्रीन तब न बचे। मोबाइल पर पूरा अखबार पढ़ना मुश्किल है और आगे भी यही हालत बनी रहेगी। तब आईपैड जैसे गैजेट ही अखबार पढ़ने के जरिया होंगे।

किसी अखबार में डिजाइन की जरूरत ही क्या है?

अहम सवाल है। डिजाइन हम किसी भी चीज की उपयोगिता बताने और बढ़ाने के लिए करते हैं। चाहे वो वाशिंग मशीन की डिजाइन हो या फ्रिज की। जो भी चीज अच्छी होती है, उसके पीछे कहीं न कहीं डिजाइन होती है। अखबार का डिजाइन करते वक्त हम तीन चीजें ध्यान में रखते हैं। पहला, खबर, सूचना या जानकारी को ऐसे पेश करें कि पढ़ने में आसानी हो। दूसरा, सूचना या खबर की तलाश आसान हो यानी पाठक आसानी से वहां पहुंच सके। तीसरा, सूचना या खबर को आकर्षक रूप में पेश करना।

हिन्दुस्तान के साथ काम करने का अनुभव?

हिन्दी अखबार के साथ काम करने का अनुभव अनोखा रहा। मुझे हिन्दी इलाके के दिमाग को समझने में मदद मिली। हिन्दी अखबारों को समझने में मदद मिली। मैंने यहां की संस्कृति, परम्परा और विरासत को ध्यान में रखते हुए काम किया। मेरा काम यहां की परम्परा से इतर कुछ देने का नहीं था। यू कांट टेक कैओस फ्रॉम हिन्दी न्यूजपेपर। (आप हिंदी अखबारों से रंगों और मनोभावों की भीड़ को हटा नहीं सकते।) मैंने इस कैओस को, इस भीड़ को सिर्फ कंट्रोल करने का काम किया। हिन्दुस्तान को डिजाइन करते वक्त मैंने खुले दिमाग से काम किया। मैंने खुद अपनी दोबारा तलाश की। खुद को बेहतर बनाया। मैंने भी काफी सीखा। यह सब हिन्दुस्तान की बदौलत मुमकिन हुआ।

इससे पहले आपने तेलुगू और मलयालम अखबार डिजाइन किया है? हिन्दी का अनुभव कैसा रहा?

सबसे बड़ा फर्क अक्षरों का है। वहां चित्रमय अक्षर हैं। हिन्दी के अक्षर एक रेखा में चलते हैं। मुझे इन एक रेखीय अक्षरों के साथ काम करने में मजा आया। यह एक खास तरह का डिजाइन स्पेस पैदा करते हैं। बेहतर काम करने का मौका देते हैं। मैंने हिन्दी की इस खूबी का इस्तेमाल आपके इस डिजाइन में करने की भरपूर कोशिश की है।

साभार : हिंदुस्तान


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