कभी पिकनिक मनाने गए और कोई गरीब दिखा, उस पर कहानी दे मारी : राजेंद्र यादव

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: नई सदी कविता से मुक्ति का दौर है : वह हिंदी साहित्य में एक लंबा रास्ता तय कर चुके हैं। नई कहानी के दौर को आगे बढ़ाने से लेकर हंस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका को लगातार चलाते रहने तक राजेंद्र यादव के नाम से बहुत-सी उपलब्धियां जुड़ी हैं। हाल ही में शब्द साधक पुरस्कार दिए जाने के मौके पर प्रेम भारद्वाज ने राजेंद्र यादव से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश :

  • हंस पत्रिका 25 साल पूरे कर चुकी है। इतना लंबा सफर कैसे तय हुआ?

--बस दिमाग में एक ही बात थी कि हंस को निकालना है- यह लक्ष्य था। दिक्कतें भी आईं। शुरू में गौतम नवलखा के पिता ने पांच लाख रुपये हमें पत्रिका निकालने के लिए दिए, वे रुपये हमारी नासमझी के चलते बहुत जल्द समाप्त हो गए। लेकिन दूसरे लोगों, जैसे प्रभा खेतान ने काफी मदद की.., हमारे बाइंडर ने सहयोग किया और भी कई मित्र मददगार के रूप में सामने आए।

  • हंस के पीछे मूल सोच क्या थी?

--तय कर लिया था कि जो उस दौर में साहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं, हंस उनसे अलग हो। सामाजिक-राजनीतिक सवालों को भी जोड़ा और उनसे टकराया जाए। हिंदी का छूटा हुआ माहौल था, उसको फैलाया। जो सिर्फ मध्यवर्ग और पटना से दिल्ली तक ही सीमित था, उसे विस्तार दिया। पहले आलम यह था कि मध्यवर्गीय लेखक कभी गांव गए या सफर के दौरान किसी गरीब-दलित या वंचित वर्ग के व्यक्ति से मिले, तो उससे सहानुभूति दिखाते हुए कुछ-कुछ लिख देते थे। कभी पिकनिक मनाने गए और कोई गरीब दिखा, उस पर कहानी दे मारी। हमने गरीब, दलित, मुसलमानों को सामने लाने का काम किया।

  • कहा जा रहा है कि साहित्यिक पत्रकारिता लुप्त होती जा रही है?

--ऐसा कुछ नहीं है, साहित्यिक पत्रिका की पूरी गुंजाइश है। बहुत सारी पत्रिकाएं निकल भी रही हैं। अखबारों में पहले भी साहित्य ज्यादा नहीं था। रविवारीय में उसके लिए जगह थी, अब वह भी थोड़ी कम हो गई है।

  • खबरिया चैनलों में साहित्य कहां है?

--चैनलों में गरीब और किसान पूरी तरह से गायब हो गए हैं। वे सिर्फ अपराध कथाओं में बचे हैं। गांव और किसानों पर आखिरी धारावाहिक राही मासूम रजा का नीम का पेड़ था। अब तो वहां पूंजीपति हैं, अमीर लोग हैं।

  • आपने कहानी के जितने दौर देखे हैं, उनमें सबसे अच्छा दौर किसे मानते हैं?

--हमारे दौर की कहानी मध्यवर्ग की कहानी थी। उसमें लेखक भी मध्यवर्ग के थे। उनके पात्र और उनका जो कथा संसार था, वह भी मध्यवर्ग का था, पढ़ने वाले भी मध्यवर्ग के थे। नई कहानी आंदोलन की जो बहुत बड़ी सफलता थी, उसके पीछे कारण यही था कि एक चक्र पूरा होता था। पढ़ने वाले से लेकर लिखने वाले, विषय वस्तु, पात्र तक लगभग उसी वर्ग से थे। हमने दृष्टिकोण में सामाजिकता लाने की कोशिश की। नई कहानी पूरी तरह से मध्यवर्ग की कहानी है। मध्यवर्ग में भी स्त्री-पुरुष के बनते-बिगड़ते पारिवारिक संबंधों की कहानी। अस्सी के बाद पूरा परिदृश्य बदल गया। मध्यवर्ग हाशिये पर फेंक दिया गया। और फिर जनवादी कहानी आई। कहानी का क्षेत्र बदल गया। हालांकि वहां भी दिक्कत यही थी कि लिखने वाले उसी वर्ग के थे, पर जिस वर्ग के बारे में लिखते थे, वह उनके अनुभव का संसार नहीं था, वह उसके सिर्फ दर्शक थे।

  • आप धीरे-धीरे रचनात्मक साहित्य से दूर होते गए, इसकी वजह?

--पहले मैं जिस तरह की कहानी लिखता था, उसमें मैंने बार-बार प्रयोग किया। इतना कि मैं शिल्पाग्रही समझा जाने लगा। कहीं न कहीं मुझे कहानी के पुराने ढांचे नाकाफी लगे, जो मुझे प्रयोग और फैंटेसी की तरफ ले गए। फिर मैं विश्व साहित्य के क्लासिक्स के अनुवाद की तरफ गया। मैंने तुर्गनेव चेखव और कामू को अनूदित किया और लोगों का कहना है कि मैंने बहुत खराब नहीं किया। फिर भी मुझे लगा कि मैं पाठक से सीधे संवाद नहीं कर पा रहा हूं। सीधे संवाद के लिए ही मुझे वैचारिक लेखन में आना पड़ा और उससे भी ज्यादा सीधे संवाद के लिए मुझे संपादन में आना पड़ा। मेरी यात्रा या बेचैनी का कारण अगर कहा जाए, तो ज्यादा से ज्यादा पाठकों से सीधे संवाद करना है। मुझे मालूम है कि मैं जो कहता हूं, उसका सामने वाले पर क्या असर होता है। कहानी से यह नहीं हो सकता था, क्योंकि वह एकतरफा संवाद था।

  • आपने शुरुआती दौर में कविताएं लिखीं, फिर कविता से विरोध क्यों?

--ये संघर्ष का दौर था। इलाहाबाद में एक तरफ अक्षेय थे, धर्मवीर भारती थे, शाही थे, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना थे। परिमल के लोग थे। दूसरी तरफ, प्रगतिशील लेखक संघ के लोग थे, जिसमें मैं, कमलेश्वर, मार्कण्डेय, भैरव प्रसाद गुप्त आदि थे। ये विचार का द्वंद्व था। इसके पीछे ये मंशा नहीं थी कि कविता बहुत प्रसिद्ध हो रही है, मैं नहीं हो रहा। मेरे खयाल से ये जो नई सदी है, कविता से मुक्ति की सदी है। कविता धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती चली जा रही है। 70 के दशक तक जो विचारक थे, वे कविता को उद्धृत करते थे। आज देरिदा वगरैह जितने विचारक हैं, उनमें से कोई कविता के उद्धरण नहीं देता। मेरा मतलब ये है कि विचार के केंद्र में आज जितना समाजशास्त्र है, उतनी कविता नहीं है, बल्कि कविता है ही नहीं। कविता ठीक है हमारे साथ तीन हजार साल से है। हमें कविता की आदत है। हम उसके मानसिक रूप से अभ्यस्त हैं और कहना चाहिए कि एक संस्कार बन गया है। साहित्य के सारे शास्त्र और थ्योरीज कविता को लेकर बने हैं। अब इस सबसे मुक्त होने के बाद की कविता कविता ही शायद नहीं है, इस बात के संघर्ष में सौ-पचास साल और लगेंगे। गद्य ज्यादा विकसित सभ्यता की देन है। औद्योगिक युग की पहली जुबान गद्य है।

  • मौजूदा दौर की युवा कहानी के बारे में आपकी क्या राय है?

--मुझे लगता है कि युवा कहानी के कहानीकारों में वैचारिक स्पष्टता का अभाव है, जो हमारे दौर की नई कहानी में सबसे मजबूत चीज थी।

साभार : दैनिक हिंदुस्तान

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