मैं संपादकीय राजनीति का शिकार हुआ : विनोद वार्ष्णेय

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विनोद वार्ष्णेयइंटरव्यू : विनोद वार्ष्णेय

कथित मंदी के नाम पर छोटे-बड़े मीडिया हाउसों के प्रबंधन की अंधी कार्यवाहियों के चलते देशभर के जिन हजारों पत्रकारों को बेरोजगार होना पड़ा है, बेहद अपमानजनक स्थितियों में संस्थानों से कार्यमुक्त किया गया है, उनमें से एक हैं वरिष्ठ पत्रकार विनोद वार्ष्णेय। वे दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली के नेशनल ब्यूरो चीफ हुआ करते थे। अलीगढ़ के रहने वाले विनोद ने दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली में बतौर प्रूफ रीडर करियर शुरू किया।

36 साल तक इसी सस्थान में रहे। अपने काम, लगन व मेहनत के बल पर एक-एक पायदान चढ़ते हुए नेशनल ब्यूरो चीफ बने। विनोद वार्ष्णेय देश के उन दो तिहाई से ज्यादा पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मुंह में चांदी का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुए, जिनके रिश्तेदार पत्रकारिता में नहीं थे, जिनके मां-बाप बड़े लेखक नहीं थे जिससे पत्रकारिता में आसानी से इंट्री मिल सके बल्कि अपने संघर्षों व मेहनत की बदौलत कछुआ चाल से आगे बढ़े, धीरे-धीरे, सीखते-पढ़ते, जूझते-झेलते। वे ऐसे हजारों पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने किसी एक संस्थान को अपने कीमती जीवन का सबसे बहुमूल्य समय दिया लेकिन संस्थानों ने इनसे अचानक कुछ यूं मुंह फेरा जैसे ये कभी इनके हिस्से ही न रहे हों।

आमतौर पर इंटरव्यू उन्हीं का किए जाने की परंपरा है जो सफल माने जाते हैं, जो संपादक जैसे पदों पर आसीन होते हैं, जो ग्रुप एडिटर या चीफ एडिटर होते हैं। लेकिन भड़ास4मीडिया इस मान्य परंपरा को तोड़ते हुए इस बार विनोद वार्ष्णेय के रूप में एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार का विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित करने जा रहा है जो बेशक किसी संस्थान से निकाले गए हैं लेकिन वास्तव में कहीं बेहतर पद के हकदार थे। पर क्या किसी को किसी संस्थान से निकाल देने से, बेरोजगार कर देने से उस व्यक्ति की गरिमा, शख्सियत, ज्ञान, मेधा, समझ, सरोकार को छीना या लिया जा सकता है? कतई नहीं। विनोद जी आज भी बहुत कुछ कर रहे हैं, बस फर्क यह है कि उनका किया हुआ किसी एक संस्थान के लिए नहीं बल्कि हर उस संस्थान के लिए है जो सच्चाई को संपूर्णता के साथ बयान करने का साहस रखता है। यह इंटरव्यू पढ़कर आप न सिर्फ अवसाद में जा सकते हैं बल्कि मीडिया में काम करते रहने के अपने इरादे के बारे में पुनर्विचार करने पर भी मजबूर हो सकते हैं।

विनोद जी के बयान समकालीन मीडिया की ट्रेजेडी और भयावहता की गाथा हैं। समय बीतने के साथ मीडिया के मानक में लगातार क्षरण को वे बारीकी से देख व भोग चुके हैं। इसके बारे  में साफ-साफ बताया है विनोद वार्ष्णेय ने। विनोद का स्वर कथित मंदी के नाम पर कार्यमुक्त किए गए पत्रकारों की पीड़ा का प्रतिनिधि स्वर है। विनोद वार्ष्णेय की जिंदगी हम सबकी जिंदगी है। जिस संघर्ष और मेहनत से यह शख्स प्रूफ रीडर से नेशनल ब्यूरो चीफ की कुर्सी तक पहुंचा और जिस स्वाध्याय से इस शख्स ने हिंदी पत्रकारिता में कई नई प्रयोगों को अंजाम दिया, वह न सिर्फ हमारे आपके लिए प्रेरणादायी है बल्कि पत्रकारिता के नए विद्यार्थियों के लिए एक सबक भी है कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता।

इंटरव्यू पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया से विनोद वार्ष्णेय को जरूर अवगत कराइए, साथ में यह भी कहिए, विनोद जी, देर है पर अंधेर नहीं। बुराई और बुरे लोग कुछ देर तक चमकते हुए दिख सकते हैं लेकिन जब उनकी आभा उतरनी शुरू होती है तो फिर उनकी जगह इतिहास के डस्टबिन में भी खोजने से ही मिलती है।

- यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया


ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के साथ विनोद वार्ष्णेय--पहले आप अपने बारे में बताएं? जन्म स्थान कहां है, पढ़ाई-लिखाई कहां तक हुई, मीडिया में कैसे आए?

---जन्म अलीगढ़ में हुआ। बीएससी तक पढ़ाई-लिखाई वहीं हुई, बाकी नौकरी करते हुए दिल्ली में। लेकिन हासिल स्वाध्याय से ही अधिक हुआ। किशोरावस्था बवंडरी थपेड़ों से भरी रही। पिताजी स्वतंत्रता सेनानी थे। 1942 में चौदह महीने जेल में रहे। एमएससी थे, लेकिन सारी जिन्दगी बेरोजगार रहे। बाबा जब तक थे, परिवार में कोई आर्थिक संकट नहीं था। चार भाई बहनों में सबसे छोटा था, तो बाबा के निधन के बाद पिताजी के सामने जब आर्थिक संकट गहराया तो उसका सबसे अधिक शिकार मुझे होना पड़ा। हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में अच्छे अंकों से फर्स्ट डिवीजन था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और बिरला इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी, मेसरा (रांची) में मेरिट के अधार पर इंजीरियरिंग में दाखिला हो गया था, लेकिन पिताजी चाहते थे अलीगढ़ मे पढूं, मेरी जिद थी कि मैं इंजीनियरिंग करुंगा तो बड़े भाई की तरह हॉस्टल में रहकर। अलीगढ़ से बाहर ही पढ़ूंगा। पिता बाहर भेजकर पढ़ाई का खर्च नहीं झेल सकते थे, लेकिन समझाकर यह बात कह भी नहीं सकते थे। नतीजा यह हुआ कि इंजीनियरिंग में नहीं जा सका। अलीगढ़ में बीएससी करने वार्ष्णेय डिग्री कॉलेज चला गया।

इस कॉलेज के तीन मूल संस्थापकों में मेरे पिता भी थे। कॉलेज की छात्र राजनीति ने शिक्षा प्रणाली गड़बड़ा रखी थी। छात्र राजनीति के चक्कर में पहला साल कब निकल गया और पढ़ाई पूरी तरह गुल रही। अगले साल धर्म कॉलेज चला गया, तब कुछ पढ़ाई शुरू हुई। मूल स्वभाव अध्ययनशील था और तेवर जिज्ञासु, लेकिन छात्र राजनीति का भूत यहां भी छूटा नहीं। क्लास में प्राध्यापकों का कोर्स आगे चला करता, मैं पीछे रह जाता, इसलिए कुछ समझ में नहीं आता। नतीजा यह कि क्लास से गायब रहने में कोई अपराधबोध नहीं होता था। लेकिन इम्तहान के दिनों खुद मशक्कत कर कोर्स पूरा करने की कोशिश करता, जो संभव नहीं हो पाता था। नुकसान यह हुआ कि फर्स्ट डिवीजन आने का सिलसिला टूट गया और घर का यह नियम भी कि या तो फर्स्ट डिवीजन लाओ, वरना नहीं पढ़ो।

घर में अक्सर दिख रहे आर्थिक संकट, पिता से अनबन, छात्र राजनीति के बहाने हासिल हुई सामाजिक राजनीतिक असहमति और निजी स्तर पर शिक्षा में पिछड़ते जाने से संवेदनशील मन लेखन की ओर मुड़ गया और कहानी लिखने लगा। पिताजी ने मेरी हरकत पकड़ ली थी, लेकिन कुछ कहा नहीं। बड़े भाई इंजीनियर थे। वे बहुत नाराज हुए कि बजाए कोर्स की किताबें पढ़ने के, फालतू चीजें लिखने में समय जाया करता हूं। लेकिन मै शिक्षा, समाज, राजनीति, सांप्रदायिकता, साहित्य, भष्टाचार, अपराध, अन्याय से लेकर चीन, रूस, अमेरिका तक सोचने और बहस करने लगा था। शायद पत्रकारिता का प्रशिक्षण शुरू हो चुका था। भाई साहब का कहना था कि मैं तो इक्कीस साल की उम्र में इंजीनियर होकर कमाने लगा, तुम ऐसा नहीं कर सकते। बात दिल को लग गई। नतीजा यह ठीक 21वीं सालगिरह के दिन मैंने घर छोड़ दिया।

कोई नौकरी सामने न थी। यह भी समझ न थी कि नौकरी मिलती कैसे है। कुछ महीने बारहवीं क्लास के विद्यार्थियों को गणित के ट्यूशन पढ़ाने के बाद अंतत: प्रशिक्षु प्रूफरीडर के रूप में हिन्दुस्तान में ठिकाना मिला। नौकरी ज्वाइन करते समय दिमाग में बात साफ थी कि मै यहां केवल पढ़ने के लिए आया हूं क्योंकि पढ़ाई अधूरी रह गई है। ढाई महीने बाद ही एमएमएच गाजियाबाद में एमए अंग्रेजी के लिए दाखिला ले लिया। रात की ड्यूटी ली। रात को दफ्तर में ही सो जाता। सुबह छह बजे उठकर सिंधिया हाउस से लालकिला के लिए डीटीसी बस पकड़ता। ट्रेन पकड़कर गाजियाबाद जाता। फिर पैदल स्टेशन से कॉलेज। तब तक पहला पीरियड निकल चुका होता। बचे रहे तीन पीरियडों मे भी मजा आता। वापसी में फिर कालेज से पैदल स्टेशन, ट्रेन से गाजियाबाद से दिल्ली लालकिला, फिर डीटीसी बस से कस्तूरबा नगर। तब तक दोपहर के ढाई बज जाते। दो घंटे सोकर शाम छह बजे आफिस रवाना होता। अधिकांश पढ़ाई रेल या बस में सफर करते या दफ्तर में टेबल पर काम न होने के दौरान या छुट्टी के दिन हो पाती। बीमारी भी उन दिनों खूब होती। दो बार तो पैरा-टायफायड हुआ। कमरे का किराया, खाना, पढ़ाई और सफर के खर्चे की वजह से पैसे की बेहद तंगी रही। लेकिन कर्ज भी नहीं लेना पड़ा। नौकरी करते हुए एमए अंग्रेजी और एमए हिन्दी कर ही लिया।

चीन यात्रा के दौरान मशहूर चीनी दीवार के पास विनोद वार्ष्णेय--हिन्दुस्तान अखबार में कुल कितने समय तक रहे और किस तरह के दायित्व निभाए?

---जिन्दगी के सबसे सक्षम कार्यशील साढ़े 36 साल हिन्दुस्तान में ही बिताए। पता नहीं चला कि कैसे इतना समय बीत गया। प्रशिक्षु प्रूफरीडर से शुरू कर उप-संपादक, वरिष्ठ उप-संपादक, मुख्य उप-संपादक, विशेष संवाददाता, संयुक्त ब्यूरो प्रमुख और फिर ब्यूरो प्रमुख। अखबार के काम से जुड़ी चीजें पढ़ना ही इकलौता शौक था, कभी दूसरे काम की ओर नजर नहीं फेरी। लेकिन नौकरी के आखिरी पांच साल बुरे बीते। मृणालजी के संपादक बनने के छह महीने के अंदर ही माहौल खराब होना शुरू हो गया। चमचों की पौ-बारह हो गई। हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड के पुराने मैनेजमेंट में बेहतर काम के लिए प्रोत्साहित करने की अनोखी प्रणाली थी, जिसमें अतिरिक्त काम के लिए अलग से पेमेंट होता था। इसलिए लिखने और अनुवाद का खूब मौका मिला। अंग्रेजी की असली बारीकियां अनुवाद के दौरान ही सीखीं।

मैंने खुशवंत सिंह के 'मौलिस टुवडर्ज वन एंड आल' का अनुवाद लगभग चौदह साल किया। खुशवंत सिंह अनुवाद से बेहद खुश थे और तीन मर्तबा अपने कॉलम में उन्होंने मेरे नाम का जिक्र किया। उन्होंने अंग्रेजी भाषा संबंधी किसी भी समस्या के लिए फोन पर डिसकस करने की पूरी छूट दे रखी थी। अनुवाद के अलवा डेस्क पर रहते हुए फीचर और मैग्जीन के पन्नों पर लिखता रहता था। चीफ सब एडीटर के रूप में समय से पहले पेज छोड़ने, खबरों की पहचान और बेहतरीन हेडलाइन, ले-आउट के मामले में खासी प्रशंसा अर्जित की। पूरे नौ साल की चीफ-सबी के दौरान रात की ड्यटी में छुट्टी नहीं ली। लेकिन पूरी निष्ठा से 36 साल काम करने के बाद अब अफसोस है कि दो बार अन्यत्र मौका मिलने के बावजूद यहीं क्यों टिका रहा। चार साल पहले वीआरएस दिये जा रहे थे,  तो मैंने भी पूछताछ की, तो मृणालजी के प्रतिनिधि प्रमोद जोशी ने मना कर दिया। बोले, हमें काम के भी तो आदमी चाहिए। पर बाद में क्या हुआ, सब जानते हैं।

इसे धोखा देना नहीं, तो और क्या कहते हैं? जो लोग वीआरएस लेकर चले गये, वे बेहतर रहे।

--आपने एचटी ग्रुप में कुल कितने एडिटरों के साथ काम किया और आपने किस-किस तरह के बदलाव देखे?

---रतनलाल जोशी, चंदू लाल चंद्राकर, विनोद कुमार मिश्र, हरिनारायण निगम, आलोक मेहता, अजय उपाध्याय, मृणाल पांडे, कुल सात संपादकों के साथ काम किया। उनमें रतनलाल जोशी को मैं सबसे बेहतरीन मानता हूं। उनकी गरिमा ही अलग थी। उनको जो सम्मान एडिटोरियल में मिलता था, वह बेमिसाल था। बाद में इंदिरा गांधी की सरकार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शामिल हो जाने के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स की यूनियन में जो बदलाव आया, उसके चलते राजनीतिक कारणों से उनकी कब्र खोदने की मुहिम चलाई जाती थी, तो उसे देखकर मुझे इंसानी स्वभाव के घटियापन पर अचरज होता था। रतनलाल जोशी पहले संपादक थे जिन्होंने हिन्दुस्तान के इतिहास में सबसे बड़ा री-लांच किया। यह कंटेंट आधारित री-लांच था, आज के किस्म का रंग-रोगन वाला री-लांच नहीं। सबसे पहले उन्होंने यूनिवर्सिटी के अच्छे डिग्री धारकों को ट्रेनी नियुक्त करना शुरू किया। उनसे पहले गुरुकुल से या राजनीतिक कार्यकर्ताओं में से पत्रकारों की नियुक्ति होती थी। चंदूलाल चंद्राकर गजब के फक्कड़ संपादक थे।

उन्होंने करीब सौ देशों की यात्रा की थी। उन्होंने संपादकीय साथियों में जातिवाद के आधार पर ऊंच-नीच की पर्तें नहीं बनाईं। वे युवा सहयोगियों की ऊर्जा के रचनात्मक इस्तेमाल पर जोर देते थे। उनकी हंसी गुंजाने वाली होती थी और जूनियर से जूनियर में आत्मविश्वास पैदा करती थी। लोकतांत्रिक स्वभाव था। उन्होंने फीचर पृष्ठों को पूरी तरह आंतरिक लेखन के लिए खोल दिया। तब मुझे भी फीचर लिखने के मौके मिले। उससे पहले केवल हिन्दुस्तान टाइम्स और इवनिंग न्यूज में ही महज तीन बार लिख पाया था। एडिट पेज पर 'खबरों के घेरे' कालम में लिखने का मौका शीला झुनझुनवाला ने दिया जो उस समय के संपादक विनोद कुमार मिश्र से अधिक असरदार थीं। एडिट पेज पर मेन आर्टिकल लिखने का मौका दिया हरिनारायण निगम ने। उनके काल में सबसे अधिक मजा आया। उस समय यूनियन बहुत ताकतवर थी। निगमजी यूनियन से डरकर किसी को कुछ कहते नहीं थे। माहौल ऐसा था कि जो काम करना चाहे करे, जो न करना चाहे, वह न करे। सबसे अधिक मेहनत मैंने उन्हीं दिनों की और अच्छे चीफ सब होने की तारीफ हासिल की।

मृणाल पांडे ने मुझे सबसे पहले मैग्जीन में लिखने को प्रोत्साहित किया। स्वास्थ्य संबंधी विषय पर संडे मैग्जीन में पहली कवर स्टोरी उन्होंने ही छापी। सबसे अधिक कवर स्टोरी देने का श्रेय शायद मुझे मिला। बाद में विज्ञान पर 'शोध और बोध' कालम लिखने का मौका दिया। उस समय मृणाल पांडे अधिकार क्रम में नंबर दो थीं। उनका रवैया उस समय आज जैसा नहीं था। आलोक मेहता का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने डेस्क से हटाकर विशेष संवाददाता बनाया, हालांकि मैं विनोद वार्ष्णेयमृणाल पांडे के पन्नों पर ही लिखना चाहता था। मैंने पाया कि जो संपादक रिपोर्टिंग के रास्ते आगे बढ़ते हुए संपादक बने, वे ही अच्छे संपादक निकले। मुंह में जन्म से ही चांदी की चम्मच की तरह ऊंचे संपर्कों के जरिए जिन्होंने संपादकी हथियाई, वे घटिया निकले। वैसे सबसे बुरे संपादक मुझे वो लगे जो जातिवाद का खेल करते थे। ऐसे संपादकों ने कंपनी की चेयरपर्सन तक को लजाया।

आलोक जी ने पहली बार विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य, अक्षय ऊर्जा जैसे अछूते क्षेत्रों में रिपोर्टिंग का मौका दिया। शुरू में मैं डरा। अब मैं उनका शुक्रगुजार हूं। उन्होंने सिद्ध किया कि इन क्षेत्रों में कितनी संभावनाएं हैं। हिन्दी में अंग्रेजी साइंस मैग्जीनों से नकल कर छापने का रिवाज रहा है, अब यह काम इंटरनेट से चुरा कर किया जाता है। विज्ञान से जुडी खबरें तलाशने का रिवाज हिन्दी पत्रकारिता में न था। मैं विज्ञान पर लेख फीचर लिखने में माहिर था, लेकिन खबरें? मुझे लगा कि मैं नाकामयाब होऊंगा। लेकिन जब करना शुरू किया तो मजा आया। स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामुद्रिक, अंतरिक्ष, परमाणु, स्वास्थ्य एंव पर्यावरण विज्ञान पर मौलिक खबरे की। आध दर्जन नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के इंटरव्यू किये।

आलोक मेहता के बाद अजय उपाध्याय ने विज्ञान से जुड़े मेरे काम को सराहा। वे खुद इंजीनियर थे, विज्ञान संबंधी खबरों की क्वालिटी या खोखलेपन को पहचानने की उनके पास दृष्टि थी। उनके दोस्ताना समर्थन से मुझे आत्मविश्वास मिला। अजय उपाध्याय का मैं कृतज्ञ हूं कि उन्होंने अमेरिका की कोकरन फेलोशिप के लिए रिकमंड करते हुए फार्म में मेरी तारीफ लिख दी। मेरा तुरंत सेलेक्शन हो गया। यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। एक महीने की इस फेलोशिप में मुझे क्रॉप बायोटेकनोलॉजी के विज्ञान, पॉलिटिक्स और व्यापार तीनों चीजों को गहराई से समझने का मौका मिला। स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्टिंग में वैज्ञानिक पहलुओं पर जोर देने के मेरे आग्रह को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने मुझे उगांडा में एड्स कार्यक्रम की सफलता का जायजा लेने के लिए मीडिया प्रतिनिधि के बतौर सरकारी प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट को कई विकासशील देशों की ओर से एक कार्यशाला के जरिये जोहानिसबर्ग में वल्ड समिट आन सस्टेनबल डेवलपमेंट कवर करने के लिए पत्रकार चुनने थे, सुनीता नारायण की इस संस्था ने मुझे चुना।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफी अन्नान से आधा मिनट खुलकर बात करने और हाथ मिलाने में जो मजा आया, वह याद आज भी ताजा है। करीब तेरह देश जाने का मुझे मौका मिला। एक बार चीनी दूतावास से फोन आया कि आपको पंचशील की 50वीं जयंती के अवसर पर पत्रकार एक्सचेंज कार्यक्रम में चीन जाने के लिए चुना गया है। दो दिन में वीजा का आवेदन और संपादक की मंजूरी का खत जमा करें। मैंने मृणाल जी को बताया तो उन्होंने दो टूक कहा कि अखबार इस समय अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए खर्च करने की स्थिति में नहीं है। मैं धक रहा गया। ज्यादातर अखबार इस तरह के मौकों को अखबार के लिए गौरव की बात मानते हैं। दस दिन की इस चीन यात्रा के लिए अंतरराष्ट्रीय विमान यात्रा का खर्च अखबारों को खुद करना था और मैनेजमेंट संपादक की सिफारिश पर ही पैसा मंजूर करता था। चीन में मेरी गहन दिलचस्पी सदा से रही है। नौ साल की उम्र से ही चीन के बारे में तमाम किस्म की बातें सुनता आया था। चीन के हमले और उसके डेढ़ साल बाद नेहरू के निधन के वक्त पिताजी की आंखों से बहे आंसू मुझे याद थे। मैं किसी भी कीमत पर इस चीन यात्रा छोड़ना नहीं चाहता था। आर्थिक स्थिति मेरी हमेशा कमजोर रही। हालत नहीं थी कि मैं अपनी जेब से इंटरनेशनल ट्रैवल खर्च करूं। लेकिन मैंने कहां कि मैं कंपनी पर बोझ नहीं डालूंगा, सारा खर्च अपनी जेब से करूंगा। तब मृणालजी ने अनुमति दे दी।

मेरे साथ के बाकी नौ पत्रकार दफ्तर के खर्च पर गये। अकेला हिन्दुस्तान ऐसा अखबार था जिसने अलग रूख अपनाया। मेरी जेब से लगभग पूरे महीने का वेतन खर्च हो गया, लेकिन वे दस दिन मेरी पत्रकारीय जिंदगी के अविस्मरणीय दिन हैं। लौटकर मैंने चीन संबंधी 13 वृतांत अपने अखबार में लिखे। साप्ताहिक सहारा समय ने रीक्वेस्ट किया कि वे चीन पर विशेष परिशिष्ट निकाल रहे है। उन्हें ताजी स्टोरी चाहिए थी, जेएनयू के प्रोफेसरों ने अपने लेखों में वे पिटी-पिटाई बाते ही लिखी थीं, जिन्हें सब जानते थे। उन्होंने कहा कि एक पीस उनके लिए भी लिख दूं। मैंने लिख दिया। अखबार के चरण-चाट कुछ महान चुगलखोरों में से एक ने मृणालजी से शिकायत कर दी। वे भन्ना गईं। मैंने कहा कि मेरे पास छदम नाम से लिखने के आफर हमेशा रहे हैं। लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं किया। इस लेख को भी मैं छदम नाम से लिख सकता था। विशेष किस्म की मांग की वजह से ही मैंने सिर्फ एक बार लिखा है और उसकी वजह से हिन्दुस्तान में छप रही सीरीज पर कोई असर नहीं पड़ा, वह जारी है और आगे किसी अन्य अखबार में लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं है। चीन के बारे में लिखने को बहुत कुछ रह गया था, लेकिन उस घटना से खिन्न हो मैंने हिन्दुस्तान में भी लिखना बंद कर दिया।

--इतने लंबे समय तक एचटी ग्रुप में काम करने के बाद आपको जिस तरह से कार्यमुक्त किया गया,  उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?  

---आश्चर्य हुआ। ढाई महीने पहले ही कहा गया था कि दो साल के लिए कॉन्ट्रेक्ट रिन्यू किया जाता है। लगता है कि आज के कथित प्रोफेशनल मैनेजमेंट का विजन दो साल का भी नहीं होता या उनमें सामाजिक जिम्मेदारी का कोई मान नहीं होता। लेकिन 29 मार्च को हिन्दुस्तान में लिखे अपने लेख में मृणाल पांडे ने मंदी के बारे में जो तर्क दिये, उससे लगता है यह फैसला उनका था। वैसे वे एक से एक हुनर पत्रकार को पिछले पांच साल में निकालती आ रही है। ऐसा हिन्दुस्तान के इतिहास में कभी नहीं हुआ। मैंने जनरल मैनेजर को कहा कि मैं इस्तीफा देने को तैयार हूं लेकिन मुझे तीन दिन दिये जाएं जिससे मैं अपने त्यागपत्र में अपनी भावनाएं रचनात्मक और ईमानदार तरीके से व्यक्त कर सकूं और कुछ अच्छे सुझाव दे सकूं, लेकिन मैनेजर महोदय टर्मीनेशन का लैटर उछाल-उछाल कर दिखाते रहे।

लगा कि अब एचटी मीडिया महात्मा गांधी, जीडी बिड़ला, मदन मोहन मालवीय, केके बिड़ला, देवदास गांधी, जी एन शाही, रतन लाल जोशी जैसे लोग के आदर्श से संचालित कंपनी नहीं रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपील की थी कि कंपनियां स्लो डाउन के बहाने लोगों के मुंह से निवाले न छीनें। सब जानते हैं कि स्लो डाउन के वक्त नई नौकरी नहीं मिलती। इसलिए यह एक किस्म का सामाजिक अपराध माना जाता है। लोग बताते हैं कि एनडीटीवी कहीं ज्यादा गंभीर आर्थिक संकट में है, लेकिन इसने खर्च में कटौती के लिए मोटी सेलरी वालों की सेलरी कट का मॉडल अपनाया। जो मुझे जानते हैं, मेरे लेखन को जानते हैं, उनका कहना है कि मैं संपादकीय राजनीति का शिकार हुआ। मेरी मांग है कि शोभना भरतिया जी कंपनी में निजी पसंदगी-नापसंदगी के आधार पर फैसले लेने के संपादकों के अधिकारों के दुरूपयोग पर अंकुश लगाएं। जातिवाद की रोकथाम की भी व्यवस्था करें। यूनियन खत्म हो चुकी है इसलिए काम करने वालों की जायज शिकायतें सुनने के लिए कंपनी में ओमबुड्समैन नियुक्त करें। इसके साथ ही 360 डिग्री वाला अप्रेजल का सिस्टम लागू करें जिससे अधीनस्थ पत्रकार भी अपने संपादक के बारे में दो टूक राय दे सकें।

--मंदी के इस दौर के बारे में आपकी क्या राय है? मंदी के नाम पर जिस तरह से कंपनियां अपने कर्मचारियों को बाहर निकाल रही है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

---आर्थिक मंदी के तर्क में कोई दम नहीं। अखबारी कंपनियों में तो नौकरी से निकालने की कोई जरूरत वैसे भी नहीं। सरकार इन्हें दो-दो बार बेल-आउट दे चुकी है। 11 फरवरी को दूसरे बेल-आउट में न्यूज प्रिंट पर पहले ही लागू रियायती 3 प्रतिशत के आयात शुक्ल को शून्य कर दिया गया लाइट वेट कोटेड पेपर पर 5 प्रतिशत के रियायती आयात शुक्ल को भी शून्य कर दिया गया। सरकारी विज्ञापन देने वाली एजेंसी डी ए वी पी से जारी होने वाले विज्ञापनों की दर 15 प्रतिशत बढ़ा दी गई। इन सरकारी विज्ञापनों पर पहले 15 प्रतिशत की छूट अखबारों को देनी पड़ती थी, वह भी खत्म कर दी। इस तरह  सरकारी विज्ञापनों की प्रभावी दर 35.29 प्रतिशत बढ़ गई है। स्मरणीय है कि सरकार चार महीने पहले भी विज्ञापनों की दर 24 प्रतिशत बढ़ा चुकी थी। हिन्दुस्तान अखबार में तो लोगों को कार्यमुक्त करने की कोई आर्थिक वैसे ही नहीं थी।

कंपनी को अगर कोई घाटा है तो वह हिन्दुस्तान अखबार की वजह से कतई नहीं। वैसे भी कंपनी के तीसरे क्वार्टर के वित्तीय नतीजे बताते हैं कि कंपनी को कोई घाटा नहीं, सिर्फ तीसरी तिमाही में नेट प्राफिट में कमी आई थी। कंपनी की आपरेशनल इनकम कम नहीं हुई। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक मुनाफे में कमी इसलिए थी क्योंकि कंपनी ने इस तिमाही के दौरान अपनी अधीनस्थ कंपनी फायरफ्लाई ई वेंचर्स लिमिटेड में 14.50 करोड़ और एच टी बरडा मीडिया लिमिटेड में 2.39 करोड़ रूपये की इक्विटी फंडिंग की थी। इसके अलावा एचटी म्यूजिक एंड एंटरटेनमेंट कंपनी लिमिटेड की शेयर कैपीटल के कुछ हिस्से को राइट आफ किया था। ऐसी चीजों से हुए घाटे से हिन्दुस्तान के पत्रकारों का क्या लेना देना था। यह एक किस्म का अन्याय है जिसका कोई खामियाजा अभी शायद कोई कानून में नहीं। जहां तक एचटी मीडिया के मुनाफे का सवाल है, इसकी वेबसाइट बताती है कि चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही में कंपनी के रेवेन्यू में पांच प्रतिशत की बढ़तरी हुई है, इंटरेस्ट, टैक्स और डेप्रीशिएशन से पहले मुनाफा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 15 प्रतिशत बढ गया है। इससे पता चलता है कि कंपनी की आर्थिक सेहत पर न्यूज प्रिंट के दाम बढ़ने और विज्ञापनों में आ रही कमी की वजह से कोई खास असर नहीं पड़ा। हिन्दुस्तान तो कमाई के मामले में और भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।

यही वजह है कि ताबड़तोड़ विस्तार का सिलसिला जारी है। 29 जनवरी को हिन्दुस्तान का इलाहाबाद से नया संस्करण भी शुरू किया गया। हाल ही में फिक्की और कंसलटैंसी फर्म के पीएमजी इंडिया के अध्ययन रिपोर्ट जारी की जिसके मुताबिक देश में अगले पांच सालों में विज्ञापन व्यय 10 प्रतिशत की चक्रवर्ती दर से बढ़ते रहने की संभावना है। लेकिन शायद अखबार मालिकों की चिंता इस बात को लेकर है कि पिछले तीन सालों के दौरान तो विज्ञापन 16 प्रतिशत की दर से बढ़ा था और अब यह 10 प्रतिशत ही क्यों बढ़ेगा। विज्ञापन के संदर्भ में खास बात यह है कि भारत में अभी विज्ञापन व्यय बहुत कम है, सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.47 प्रतिशत। एक साल बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से जीवंत होने जा रही है, तब भारत में विज्ञापन व्यय तेजी से बढ़ेगा। साथ ही अखबारों का मुनाफा भी तेजी से बढ़ेगा। यह देखते हुए मौजूदा कथित मंदी के हौवा खड़ाकर किसी को भी नौकरी से निकालने का काम सामाजिक अपराध है। यह क्रूरता है कि मृणाल पांडे ने अपने लेख में न्यू जर्सी, बाल्टीमोर सन और बोस्टन ग्लोब जैसे अखबारों की छंटनी के हवाले हिन्दुस्तान में अपने कदम के लिए नैतिक आधार खोजने की कोशिश की है।

विनोद वार्ष्णेय--पत्रकारिता की वर्तमान दशा और दिशा पर आपकी क्या राय है? क्या आज की पत्रकारिता बाजार के दबाव के आगे घुटने टेक चुकी है?

---यह आपने मेरे मुंह की बात छीन ली। पत्रकारिता का रंग तेजी से बदला है। कुछ अखबारों के लिए पत्रकारिता बाजारू हो गई है, वह केवल मुनाफा बढ़ाने के चक्कर में रहती है। पत्रकारिता पर नया दबाव नौकरियों के ठेका प्रणाली में बदल जाने से पैदा हुआ है। कई संपादकीय कार्यालयों में तो पत्रकार खुलकर बहस करना तो क्या संपादकों की ओछी चमचागीरी में लगे रहते हैं। पत्रकारों में संपादक की चाटुकारिता का गजब का आलम तो मैंने हिन्दुस्तान में खुद देखा। ये निश्चित रूप से सबसे घटिया पत्रकार हैं ये जनहित में न्याय या सचाई के हित में क्या लिख सकते है? पत्रकारिता की पर्सनैलिटी के विकास में सबसे अधिक मदद खुली बहस से मिलती है। मूद्दों की गहराई में जाने और अध्ययन से मिलती है। इनका मूल्य अब कम होता जा रहा है। कुछ संपादकों का पत्रकारिता करना लक्ष्य नहीं रहा गया है, बल्कि उसके बलबूते क्या फायदा उठाया जाए, इसी तिकड़म में लगे रहते है। हिन्दी पत्रकारिता के लिए यह वक्त चुनौती का है। देश को नॉलिज इकानॉमी में शिरकत करनी है, इसके लिए नये किस्म के नागरिक का निर्माण करना चुनौती है। हिन्दी को क्वालिटी पत्रकारिता के नये मानक कायम करने हैं। अभी चाहे साइंस हो या इकानॉमी, पर्यावरण हो या गवर्नेंस, वैदेशिक मामले हों या रेगूलेटरी मुद्दे, इन सभी पर हिन्दी में कुछ भी दमदार नहीं आता।

तमाम मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें सीखने समझने में ही लंबा समय लग जाता है। ऐसे में अधिक महत्व अनुभव का होता है। विषयों की गहराई से समझ जरूरी होती है। विशेषज्ञता के लिए समय और सुविधाएं देनी होती है। कंपनियों को पत्रकारों को न केवल बेहतर वेतन देने की जरूरत है बल्कि उन्हें अपनी क्षमता के विकास के लिए अन्य अध्ययन संबंधी सुविधाएं तथा नये ढंग की सोच को मान्यता देने की जरूरत है। इन सब चीजों को मैनेजर नहीं समझ सकते, इसलिए संपादक का मजबूत होना जरूरी होता है। संपादक जहां-जहां मजबूत होते हैं, वहीं पत्रकारों और पत्रकारिता के हितों की रक्षा हो पाती है। लेकिन जब संपादक खुद अपने अधीनस्थों की कब्र खोदने में लग जाएं तो उनकी मजबूती पत्रकारिता को मजबूती नहीं दे सकती। मैं देखकर हैरान हूं कि जहां मालिक खुद मैनेजर हैं, वहां इतनी हालत खराब नहीं जबकि इसका उल्टा होना चाहिए था। पत्रकारों का वेतन अहम मुद्दा है। अनेक कंपनियों ने वेज बोर्ड को धता बता दी है। कभी जिन अखबारों ने स्वतंत्रता की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भाग लिया था और सामाजिक पुनर्जागरण की अलख जगाई थी, वे ही आज कंज्यूमरों की घटिया रुचि के प्रोत्साहक बनकर सामने आ रहे हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए। बहरहाल अगली लहर वेब मीडिया की होगी जो परंपरागत मीडिया के घटियापन और संपादकों के आंतरिक सेंसर को खत्म करने और अंतत:  पत्रकारिता की गुणवत्ता को सुधारने में मदद करेगा। वेब मी़डिया इकतरफा नहीं, बल्कि इंटरेक्टिव और खुला है। इसलिए इसमें खरा बनकर उभरने की बेहतर संभावनाएं है।

--आपके जीवन में आपका रोलमाडल कौन रहा? किन परिष्ठ पत्रकारों से आप प्रभावित रहे?

---शुरू-शुरू मैं रतन लाल जोशी से बहुत प्रभावित रहा। जब कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया इंदिरा सरकार में भागीदारीबन गई, तो उस दल से जुड़ी हिन्दुस्तान टाइम्स यूनियन ने उन्हें बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके बाद जो भी संपादक आये वे हल्के रहे। पत्रकारिता में अपना गुरु मैं खुशवंत सिंह को मानता हूं। उन्हीं से पत्रकारिता के तीन उच्च आदर्शों-- वैज्ञानिक वस्तुपरकता, सत्य के प्रति प्रतिबद्धता तथा निरंतर अध्ययन को सीखा। मैं उनकी भाषा की सरलता, शब्दों के इस्तेमाल में सटीकता, वैज्ञानिक सोच, उदारता, जनहित, सेकूलर भावना और गहन पांडित्य के बावजूद घमंड और आत्मश्लाघा की जगह उनके बेहद सहज स्वभाव का प्रशंसक हूं। हिन्दी पत्रकारिता लेखन में राजेन्द्र माथुर और जोशी का मुरीद हूं। राजेन्द्र माथुर ने हिन्दी पत्रकारिता में तमाम उन विषयों में विशेषज्ञ पत्रकार पैदा करने की पहल की, जो पहले केवल अंग्रेजी के जिम्मे छोड़ा हुआ था। आज के कुछ संपादक जब अंग्रेजी से माल लिफ्ट करने को प्रोत्साहित करते हैं, तो मुझे गुस्सा आता है।


इस इंटरव्यू को पढ़ने के बाद अगर आप विनोद वार्ष्णेय से कुछ कहना चाहते हैं तो उन्हें 09810889391 पर रिंग कर सकते हैं या फिर उन्हें This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर मेल कर सकते हैं।

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