जागरण से किसी का फोन नहीं आया : जरनैल

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जरनैल सिंहकिसी के साथ अन्याय हो तो पीड़ा होती है : मुझे राजनीति में नहीं आना : गृह मंत्री चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार जरनैल सिंह ने भड़ास4मीडिया से कई मुद्दों पर बात की। 16 फरवरी 1973 को दिल्ली में जन्में जरनैल ने शुरुआती पढ़ाई लोकल सरकारी स्कूल से की। स्नातक और आगे की शिक्षा साउथ कैंपस के डीएवी कॉलेज में हुई। एक दशक से वे दैनिक जागरण के साथ हैं। अच्छे समाज के निर्माण में अपनी भूमिका तलाशते हुए जरनैल पत्रकारिता में आए।

वह चाहते हैं कि सबके साथ न्याय हो। कहते हैं- 'किसी के साथ भी अन्याय हो तो मुझे पीड़ा होती है।' भड़ास4मीडिया के रिपोर्टर अशोक कुमार ने जरनैल से मोबाइल पर जो बातचीत की, वह इस प्रकार है-

-आप इस तरह का कदम उठाने के लिए क्यों मजबूर हुए?

--सिख दंगों के आरोपी कांग्रेसी नेताओं को सीबीआई से क्लीनचिट मिलने पर चिदंबरम ने कहा था कि मैं खुश हूं, क्योंकि मेरी पार्टी के लोगों को क्लीनचिट मिल गई। मेरा कहना था कि आप सिर्फ किसी पार्टी के नेता नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के गृहमंत्री हैं। आप खुश कैसे हो सकते हैं, जब एक समुदाय को लंबे समय से न्याय नहीं मिला और वह दुखी है।

-क्या एक पत्रकार को ऐसा करना चाहिए था?

-नहीं। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। एक पत्रकार होने के नाते मेरा कदम गलत था। लेकिन एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक होने के नाते मैं समझता हूं कि लोगों को न्याय मिलना चाहिए। मेरा इश्यू ठीक था।

-क्या आपने यह नहीं सोचा कि आप पर बड़ी कार्रवाई हो सकती थी? डरे नहीं आप?

-मेरा इरादा बुरा नहीं था। मैं उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था। मैंने उनके साइड में जूता फेंका। मेरा विरोध सांकेतिक था।

-आपको नहीं लगता कि अगर आम चुनाव नहीं होते तो आपको इतनी आसानी से नहीं छोड़ा जाता?

-इस बारे में मैं कैसे कुछ कह सकता हूं। लेकिन उन्होंने मुझे छोड़ दिया, यह समझदारी भरा फैसला था। उन्होंने समझा कि मैंने भावावेश में ऐसा किया। मैं चिदंबरम की तारीफ करता हूं।

चिदंबरम पर जूता फेंकने के बाद जरनैल को ले जाते सुरक्षाकर्मी-घटना के बाद आपके साथियों की क्या प्रतिक्रिया थी?

-सभी शॉक्ड् थे। किसी ने एक्सपेक्ट नहीं किया था कि मैं ऐसा कर सकता हूं। मैंने हमेशा मर्यादित जर्नलिज्म की बात की है।

-क्या दैनिक जागरण के आफिस से फोन आया था? संजय गुप्ता या फिर किसी और का?

-नहीं, मुझसे अभी तक किसी ने कोई बात नहीं की है। मुझे कोई मैसेज नहीं मिला है।

-आप आफिस जा रहे हैं?

-नहीं।

-आपने पत्रकारिता को क्यों चुना?

-अच्छे समाज के निर्माण के लिए मैने यह क्षेत्र चुना था। हमारे समुदाय से काफी कम लोग इस फील्ड में आते हैं, यह भी एक वजह थी। मैं समझता हूं कि हमें न्याय के लिए लड़ना चाहिए। मुझमें हमेशा निष्पक्ष पत्रकारिता का जज्बा रहा है।

-घरवालों की क्या प्रतिक्रया थी?

-सभी सदमें में हैं। जब से घटना हुई है, मैं घर नहीं गया। घर पर कई पॉलिटिकल लीडर आ रहे हैं। मैं उनसे बचना चाह रहा हूं।

-अकाली दल ने आपको टिकट देने की बात कही है, क्या आप राजनीति में आएंगे?

-मुझे टिकट नहीं चाहिए। न ही मुझे राजनीति में आना है। मैं नहीं चाहता कि इस मुद्दे को लेकर कोई राजनीति हो या कोई पार्टी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंके। देश में जाति, मजहब, या क्षेत्र की राजनीति बंद होनी चाहिए। एक टीवी चैनल ने इस मुद्दे पर बहस कराई थी। उसमें 82 फीसदी लोगों ने कहा कि जरनैल का (मेरा) मुद्दा सही है। वह सभी धर्मों के लोग थे। मैं चाहता हूं कि आमलोग जागरूक हो।

-क्या 84 के दंगों में आपके परिवार का कोई सदस्य भी शिकार हुआ था?

-हां। लेकिन वह कोई इश्यू नहीं था। मैं भारतीय नागरिक की तरह बात करता हूं। सबके साथ न्याय होना चाहिए। किसी के साथ अन्याय हो तो मुझे पीड़ा होती है।


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