टीआरपी के लिए 'हथकंडे' नहीं अपनाएंगे : राहुल देव

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राहुल देवसीएनईबी न्यूज चैनल के एक साल पूरे हो गए। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव के नेतृत्व में सीएनईबी टीम ने इस मौके को बिलकुल अलग तरीके से सेलीब्रेट किया। चैनल ने देश के विभिन्न शहरों में अलग-अलग क्षेत्रों के जाने-माने लोगों से लाइव बातचीत का प्रसारण किया। बातचीत का विषय था कि ''प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया'' (इस परिचर्चा की विस्तृत रिपोर्ट नीचे देखें)। चैनल के एक साल पूरे होने पर भड़ास4मीडिया ने राहुल देव से बातचीत की। सीएनईबी के सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल देव ने बताया कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती न्यूज चैनल से अच्छे लोगों को जोड़ने की थी जिसमें काफी हद तक सफलता मिली है।

राहुल देव के मुताबिक- ''हमने अच्छे लोगों को लाने और उनके सही इस्तेमाल की कोशिश की है और यह प्रक्रिया जारी है।'' चैनल को आगे बढ़ाने के लिए अर्थात ज्यादा टीआरपी हासिल करने के लिए रणनीति के सवाल पर राहुल देव कहते हैं- 'हम टीआरपी पाने के लिए कोई हथकंडा नहीं अपनाएंगे। हमारी घोषित नीति है कि हम अपराध, सेक्स और भूत-प्रेत पर आधारित कार्यक्रम नहीं दिखाएंगे। हम कंटेंट के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं, हथकंडों के बूते नहीं। हम अपनी मर्यादा में रहते हुए अपनी कल्पनाशीलता से रेटिंग के लिए कोशिश करेंगे। हम आम लोगों तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं।' ज्ञात हो, सीएनईबी न्यूज चैनल ने अभी कुछ महीने पहले ही खुद को टैम (टेलीविजन आडियेंस मीजरमेंट) में टीआरपी के लिए रजिस्टर्ड कराया है और इस चैनल ने एक फीसदी मार्केट शेयर हासिल करने में सफलता पा ली है।

सीएनईबी के कार्यक्रम 'लक्ष्य लोकसभा' के लिए प्रचार अभियानचुनाव पर किस तरह के प्रोग्राम दिखा रहे हैं? इस सवाल पर राहुल देव ने बताया- '' हम चुनाव में 'लक्ष्य लोकसभा', 'प्रधानमंत्री कौन' सहित कई कार्यक्रम चला रहे हैं। 'वोट यात्रा' के जरिए हम गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि आम आदमी की सोच को हम राजनीति का हिस्सा बनाएं। 'माननीय बाहुबली' नामक कार्यक्रम में अपराधी छवि के उम्मीदवारों का कच्चा चिठ्ठा लोगों के सामने रख रहे हैं।'' चैनल को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की मजबूती के सवाल पर सीएनईबी के सीईओ और एडिटर इन चीफ ने बताया कि हमारी पहुंच कई राज्यों में है। हम विदेशों में भी देखे जा रहे हैं। हम लोगों के पास नाइजीरिया से भी फोन आते हैं। मगर हमें और विस्तार की जरूरत है। हमें बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में खुद को आगे बढ़ाना है। डिस्ट्रीब्यूशन के सिस्टम को और मजबूत बनाने में हम लोग जुटे हैं।''

चैनल की पहली वर्षगांठ के मौके पर सीएनईबी पर ''प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया'' नामक लाइव आयोजन किया गया था। इस आयोजन के बारे में चैनल प्रमुख ने कहा- ''आमतौर पर यह शिकायत रहती है कि मीडिया सिर्फ बड़े लोगों पर फोकस करती है। आम जनता को कम जगह मिलती है और गंभीर मुद्दे बेदखल हो गए हैं। हम इन शिकायतों को ध्यान में रख कर योजना बना रहे हैं। इसीलिए हम लोगों ने चैनल के एक साल पूरे होने पर देश के विभिन्न क्षेत्रो के वरिष्ठ लोगों से यह जानने की कोशिश की कि वे लोग हमसे चाहते क्या हैं। यह प्रोग्राम उसी दिशा में उठाया गया एक कदम है।'' चैनल पर मंदी के असर के बारे में राहुल देव ने बताया कि सीएनईबी मंदी से बचा हुआ है। दूसरे जगहों पर छंटनी चल रही है तो हमारे यहां लगातार नए लोग जुड़ रहे हैं। एक अन्य सवाल पर राहुल देव चुनाव आयोग द्वारा एक्जिट पोल पर रोक लगाने का विरोध किया। आगामी योजनाओं के बारे में उनका कहना था कि हम कई नई चीजें करने वाले हैं। योजना बन रही है लेकिन अभी इसके बारे में बात करना ठीक नहीं होगा।


सीएनईबी के एक साल पूरे होने पर परिचर्चा ''प्रजातंत्र : हम, आप और मीडिया'' की रिपोर्ट

जनता भी कुछ कहना चाहती है मीडिया से

अपनी तमाम सकारात्मक व रचनात्मक भूमिका के बावजूद दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करता है, जबकि वह देश के बाकी हिस्सों में हो रही घटनाओं की उपेक्षा करता है। इतना ही नहीं, वह संपन्न क्षेत्रों व तबकों को ज्यादा तवज्जो देता है। ऐसा मानना है देश की जनता का, जो इस मीडिया के पाठक या दर्शक हैं। यह बात सीएनईबी समाचार चैनल द्वारा आयोजित एक परिचर्चा 'प्रजातंत्रः हम, आप और मीडिया' में उभर कर सामने आई। यह परिचर्चा सीएनईबी चैनल के एक साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित की गई थी। चैनल के प्रधान संपादक राहुल देव इस परिचर्चा का संचालन कर रहे थे।

राष्ट्र-समाज के प्रति राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका को लेकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सोच में तीखापन था।  'पानी वाले बाबा' के नाम से मशहूर मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह को वर्तमान मीडिया में गांधी व तिलक युग की झलक नही दिखाई पड़ती। उन्हें लगता है कि समाज और मीडिया में एक हद तक अलगाव है। जरूरत है कि मीडिया लोगों की जिंदगी की समस्याओं को उठाये, समाज के अच्छे काम को समझे और देश का मन समझने से पहले अपने मन को ठीक करे। कुछ ऐसी ही सोच प्रसिद्ध शिक्षाविद् जगमोहन सिंह राजपूत की भी सामने आई। उनकी दृष्टि में दिल्ली में बैठकर समाज को नहीं समझा जा सकता। मीडिया ने जनता की राजनीतिक समझ में जरूर बढ़ोतरी की है, लेकिन समाज के अहम मुद्दों (किसान, नक्सल हिंसा) के बजाय स्लमडाग मिलेनियर जैसे विषयों पर ज्यादा उर्जा खर्च कर रही है। जनसेवा और विकास के जनसेवी प्रयासों के प्रति मीडिया पर उपेक्षा भाव अपनाने की चर्चा करते हुए उन्होंने निष्पक्षता का सवाल भी उठाया।

एक सवाल के जवाब में पटना के समाजशास्त्री शैवाल गुप्ता का कहना था कि मीडिया में राष्ट्रीय मुद्दों पर ग्रहण लगता जा रहा है, जबकि क्षेत्रीय मुद्दे हावी होते जा रहे हैं। शैवाल की निगाह में राजनीति में जिस तरह से विचारधारा व मुद्दों का अभाव होता जा रहा है, उसकी अभिव्यक्ति मीडिया में हो रही है। दैनिक हरिभूमि के संपादक देशपाल सिंह पंवार ने खुद सवाल उठाया कि मीडिया का जनता से कितना जुड़ाव है। उन्होंने ब्रेकिंग न्यूज के बजाय 'ब्रेकिंग इश्यू' पर जोर देने की बात उठाई। वैसे जनता की दिलचस्पी गंभीर बातों के साथ-साथ मनोरंजन में भी प्रकट हुई।

समस्या के कारण रूप में मीडिया को बाजारोन्मुखी बताया गया। इस संदर्भ में टीआरपी होड़ की बात भी उठी। लेकिन क्या मीडिया बाजार से बाहर जा सकता है? क्या वह व्यावसायिकता की उपेक्षा करके अपने वजूद को कायम रख सकता है? इन चुभते सवालों के बीच अनुराग बत्रा का कहना था कि प्रसारक और विज्ञापनदाता कुछ समय के लिए रेटिंग को छोड़ दें,  हालांकि उन्होंने सरस्वती व लक्ष्मी के साथ रहने की जरूरत व्यक्त की। वहीं प्रसारकों व विज्ञापनदाताओं से प्रो. राजपूत की अपेक्षा थी कि वे अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करें। समस्या के समाधान स्वरूप मीडिया गुरु सुशील पंडित का कहना था कि दर्शकों के सर पर ठीकरा फोड़ने की बजाय सफलता की परिभाषा बदलनी होगी। ज्यादा दर्शक जुटाना सफलता की परिभाषा नहीं है, बल्कि प्रबुद्ध वर्ग पैदा करना ही सफलता की कसौटी हो सकती है। गंभीर विषयों के लिए नीरस होना भी जरूरी नहीं है। आज कुछ चैनल क्वालिटी की तरफ कदम बढ़ा भी रहे हैं।


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