समीर जैन ने जो तनाव दिए उससे राजेंद्र माथुर उबर न सके : रामबहादुर राय

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रामबहादुर रायहमारा हीरो : रामबहादुर राय (भाग- एक) : हिंदी पत्रकारिता का बड़ा और सम्मानित नाम है- रामबहादुर राय। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स फेम रामबहादुर राय उन चंद वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं जो सिद्धांत, सच, सरोकार, समाज और देश के लिए जीते हैं। पत्रकारिता इनके लिए कभी पद व पैसा पाने का साधन नहीं रहा। पत्रकारिता को इन्होंने देश व समाज को सच बताने, दिशा दिखाने और बदलाव की हर संभव मुहिम को आगे बढ़ाने का माध्यम माना और ऐसा किया-जिया भी। छात्र राजनीति में सक्रिय रहे रामबहादुर राय चाहते तो राजनीति में जा सकते थे और आराम से सांसद-विधायक बन सत्ता सुख भोग सकते थे लेकिन एक्टिविज्म की राह पर निकले युवा रामबहादुर राय को राजनीति में जाना लक्ष्य से समझौता करने जैसा लगा। उन्होंने राजनीति में जाने की बजाय सक्रिय पत्रकारिता की राह का वरण किया। चुनाव लड़ने का बहुत ज्यादा दबाव बढ़ा तो झोला उठाकर हरिद्वार निकल पड़े।

सक्रिय पत्रकारिता में आने के बाद भी उन्हें कई बार लोकसभा चुनाव लड़ने को कहा गया, मगर हर बार उन्होंने विनम्रता से इंकार कर दिया। उन्होंने कई छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया। इमरजेंसी की जमकर मुखालफत की। उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगता है कि 'मीसा कानून' के अस्तित्व में आने के बाद वह इस धारा में गिरफ्तार होने वाले पहले राजनीतिक बंदी थे। 'जनसत्ता' के संस्थापक सदस्य और प्रभाष जी की टीम के प्रमुख स्तंभ रहे रामबहादुर राय ‘नवभारत टाइम्स’ में राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज के साथ भी काम कर चुके हैं। इन दिनों वे साप्ताहिक पत्रिका 'प्रथम प्रवक्ता' के मुख्य संपादक हैं। यह वही पत्रिका है जिसमें छपी रिपोर्ट के आधार पर इस साल पुण्य प्रसून वाजपेयी को प्रिंट का रामनाथ गोयनका एवार्ड दिया गया। रामबहादुर राय से बात करने पर क्रांति की वो लौ आज भी सुलगती दिखती है जिसकी अलख उन्होंने नौजवानी के दिनों में जगाई थी।

हिंदी पत्रकारिता के इस हीरो से भड़ास4मीडिया के रिपोर्टर अशोक कुमार ने विस्तार से बात की। सुबह 11 बजे वैशाली स्थित उनके निवास से शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला दो चरणों में शाम 4 बजे पंचशील पार्क के पास स्वामीनगर में समाप्त हुआ। सच, साफ और बेबाक तरीके से बोलने-जीने वाले रामबहादुर राय ने कई ऐसी बातें कहीं जिसे आमतौर पर कोई पत्रकार कहने की हिम्मत नहीं कर पाता। पेश है इंटरव्यू के अंश---

-हर किसी का जीवनचक्र जन्म के साथ शुरू होता है। बातचीत भी यहीं से शुरू करते हैं।

-जन्म 1 जुलाई 1946 को हुआ मगर यह सरकारी तारीख है। वास्तव में मेरा जन्म 4 फरवरी 1946 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सेनारी गांव (तहसील- मुहम्मदाबाद) में हुआ। ठीक-ठाक गांव है। हमारे गांव में सामाजिक लिहाज से सभी जाति और धर्मों के लोगों के प्रेम से रहने की परंपरा है। छोटी सी नदी है ‘गंगहर’, 17-18 किलोमीटर लंबी नदी है। यह हमारे यहां ही आकर खत्म होती है। किसान परिवार है। दो जगह खेती है। गाजीपुर के अलावा बंगाल के मालदा जिले में भी पिछले डेढ़-दो सौ साल से खेती होती है। फिलहाल वहां मेरे भाई रहते हैं। पिताजी अध्यापक थे, मगर सरकारी नौकरी छोड़कर वह खेती में लग गए। शुरू में 10-11 साल तक पिताजी के साथ बंगाल में ही रहा। पढ़ाई छठवें दर्जे से शुरू हुई। एक ही बार पांचवी की परीक्षा दी फिर छठवीं में चला गया। गाजीपुर में अवथही मिडिल स्कूल है, वहां से 8वीं पास की। गांव से 3 किलोमीटर दूर एसएम इंटर कालेज से 9वीं क्लास पास किया। इसी समय मैंने जिंदगी में पहली बार खुद फैसला लिया। मां से कुछ पैसे मांगे और कहा कि अब गाजीपुर जाकर पढूंगा। वहां सीपीआई के सांसद थे सरयू पांडे। वह पिताजी के मित्र थे और मेरे एकमात्र परिचित। मैं उनसे मिला और बताया कि 9वीं पास कर गया हूं। उन्होंने गाजीपुर में 10वीं में एडमिशन करवा दिया। 10वीं का पेपर देने के बाद एक दिन एक ज्योतिषी मिला। मेरा हाथ देखकर उसने बताया कि मैं फेल हो जाऊंगा। मेरी उत्सुकता बढ़ गई क्योंकि पढ़ाई मैंने अच्छे ढंग से की थी। जिस दिन रिजल्ट निकलना था, मैं सुबह से ही अखबार ढूंढ़ता रहा। कई जगह अखबार ढूंढ़ने के बाद एक जगह इंतजार करने लगा। वहीं प्रकाश टाकिज में टिकट लेकर फिल्म देखने चला गया। तीन घंटे बाद निकला तो अखबार आ चुका था। मैं पास हो गया। ज्योतिषी की बात अब भी दिमाग में थी तो यह सोच कर कि कहीं मैं गलत तो नहीं देख रहा, दो-तीन और लोगों से दिखाया।  सन् 63 में बनारस आ गया। 11वीं में हरिश्चंद्र इंटर कालेज में दाखिला लिया। यहां से 12वीं करने के बाद बीएचयू के डीएवी डिग्री कालेज से पोलिटिकल साइंस (आनर्स) में ग्रेजुएशन और इकोनामिक्स में एमए किया। फिर लॉ और रिसर्च किया। नौवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान ही अखबार पढ़ने लगा था। बनारस से निकलने वाला ‘आज’, इलाहाबाद का ‘लीडर’ और कलकत्ता का ‘स्टेट्समैन’ पढ़ता था।

रामबहादुर राय-छात्र राजनीति से किस तरह जुड़े और फिर सक्रिय हुए?

--जब मैं हरिश्चंद्र इंटर कालेज में था तो गर्मी के दिनों में एक खबर पढ़ी। एबीवीपी की कोई खबर थी। सोचा कि साल भर से बनारस में हूं लेकिन इस बारे में कभी सुना नहीं। सो उत्सुकता जगी। साथियों से विद्यार्थी परिषद के बारे में पूछा। इस तरह विद्यार्थी परिषद की गतिविधियों में रुचि लेना शुरू किया। 1965 में संगठन का बिहार और उत्तर प्रदेश का संयुक्त सम्मेलन हुआ। पंडित दीन दयाल उपाध्याय, प्रो. राजेंद्र सिंह और प्रकाश वीर शास्त्री वक्ता थे। पहली बार इसमें शामिल हुआ। उन्हीं दिनों बनारस में एक आंदोलन खड़ा हुआ। तब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। सेक्युलरिज्म को मजबूत करने के लिए सरकार ने फैसला किया कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ‘मुस्लिम’ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ‘हिंदू’ शब्द हटा दिया जाए। इस आंदोलन का हिस्सा मैं भी बना और इसी तरह से छात्र राजनीति में सक्रिय हुआ। तभी मानस बना कि पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं करनी है। उन्हीं दिनों कैंपस में छात्रों की अपनी मांग को लेकर आंदोलन हुआ। मैने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। तब कालूलाल श्रीमाली बीएचयू के वीसी थे। कुल 46 छात्र एक्सपेल्ड किए गए। वीसी ने कहा कि जो माफी मांगेंगे उन्हें वापस ले लिया जाएगा। मुझे नहीं मांगना था, नहीं मांगा और निकाला गया। उन्हीं दिनों मुझे एबीवीपी का संगठन मंत्री बना दिया गया।

रामबहादुर रायसन् 1971 फरवरी की बात होनी चाहिए। जेपी यानि लोकनायक जयप्रकाश नारायण से नजदीकी का अवसर एक सेमिनार में मिला। गांधी विद्या संस्थान में सेमिनार था। विषय था 'यूथ इन रिवोल्ट' (युवा विद्रोह)। सन 66-68 तक पूरी दुनिया में छात्र विद्रोह हो रहा था। फ्रांस में शुरू हुआ यह सिलसिला यूरोप होते हुए भारत आया। तीन दिवसीय सेमिनार था। बीएचयू से मैं डेलिगेट के रूप में गया था। तभी जेपी को करीब से देखा। पहली बार जेपी के प्रति आदर का भाव पैदा हुआ। लगा कि इनके कहने पर कुछ भी किया जा सकता है। उस समय बांग्लादेश (तब का पूर्वी पाकिस्तान) में चुनाव के बाद शेख मुजीब की पार्टी जीती थी। शेख मुजीब के नेतृत्व में शासन के अधिकारों के लिए विद्रोह हुआ। मुजीब ने ‘मुक्तिवाहिनी’ नाम से सेना बनाकर लड़ाई की। जेपी शेख मुजीब के संघर्ष की हिमायत कर रहे थे और बीएचयू में आए थे। मैं उन्हें सुनने गया। भाषण ‘टाउन हॉल’ में था। मैं काफी प्रभावित हुआ। सभा खत्म हुई तो मैं उनके पास गया। मैंने साफ कहा कि मैं आपके भाषण से प्रभावित हूं। मैं क्या कर सकता हूं? उनकी पत्नी प्रभावती उनके साथ ही थीं। जेपी ने उनकी तरफ देखा। उन्होंने कहा कि सुबह 8 बजे नास्ते पर बुला लो। मैं सुबह गया। उन्होंने कहा कि कुछ भी करने से पहले बांग्लादेश में जाकर संघर्ष देख आओ। तुम्हारा मन बने तो मैं 2-3 चिट्ठियां दे दूंगा ताकि तुम्हें वहां दिक्कत न हो। मैंने साथियों से बात की। मेरे साथ एक साथी और तैयार हुआ। हम दो लोग राजशाही और ढाका के बीच 40 दिनों तक घूमते रहे। मई में वापस बनारस लौटा। मेरे लौटने पर छात्र संघ ने सभा की। सभा बहुत बड़ी थी। उसमें बीएचयू के वीसी, राजनारायण जो बड़े नेता थे, ‘आज’ अखबार के मालिक सत्येंद्र कुमार गुप्त और ‘गांडीव’ के डा. भगवान दास अरोड़ा भी मौजूद थे। मैने वहां जो देखा था, वह बताया। बोलकर मंच से उतरा तो सत्येंद्र कुमार गुप्त ने बुलाया। उन्होंने कहा कि दफ्तर आओ। दफ्तर में कहा कि सब लिख डालो। वह मेरा पहला लेख था, जो लगातार तीन दिन तक छपा।

उन दिनों चौधरी चरण सिंह सीएम होते थे। बनारस में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ आए थे। छात्र संघों पर रोक के कारण लोगों ने तय किया कि सीएम और पीएम को काला झंडा दिखाया जाए। सभा के एक दिन पहले मुझे ढूंढ़ने के लिए बीएचयू के 25-26 हॉस्टलों पर छापा मारा गया। मैं बच गया। सभा में मै काला झंडा दिखाने में सफल हो गया। मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। फिर विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय सचिव और बिहार प्रदेश के संगठन का जिम्मा मिला। तब केंद्र पटना हो गया। 73, जुलाई में 1 साल रामबहादुर रायघूमने-फिरने के बाद संगठन बना। सन् 73, जुलाई में ही पटना छात्रसंघ का चुनाव हुआ। अध्यक्ष पद पर लालू यादव, जनरल सेक्रेट्री के लिए सुशील मोदी और सेक्रेट्री पद पर रविशंकर जीते। इस तरह से छात्रसंघ का मंच मिला। अरुण जेटली दिल्ली में विजयी रहे थे। उन्होंने राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया। मैं लालू यादव सहित कई लोगों को लेकर पहुंचा। वहां छात्र संघर्ष समिति बनी। 18 मार्च 1974 में बिहार विधानसभा के घेराव का फैसला हुआ। देश भर का विपक्ष मन से टूटा था। मुझे याद है विपक्ष के कई नेता जिनमें कर्पूरी ठाकुर, कैलाशपति मिश्र, सतेंद्र नारायण सिंह, रामानंद तिवारी आदि थे, पूछते थे कि कितने लोग आएंगे। लोग रात से ही आने लगे। लालू यादव और नीतीश कुमार पटना विवि से ही विधानसभा पहुंचे। उसी समय बिहार में आंदोलन शुरू हुआ। दूसरे दिन जेपी से मिले। जेपी कमरे में सोए थे। उन्होंने कागज निकाला और सवाल पूछे। मैने जवाब दिया और उनसे छात्र आंदोलन के पक्ष में बयान देने का आग्रह किया। उन्होंने पाया कि छात्र आंदोलन का पक्ष सही है। 22 मार्च को उन्होंने बयान दिया और 8 अप्रैल को मौन जुलूस का नेतृत्व किया। जुलूस खत्म हुआ तो जेपी ने बुलाया। कहा कि यहां से चले जाइए। डीएम आपको गिरफ्तार करने के लिए ढूंढ़ रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि मुझे गोली मरवा दिया जाएगा। मैं हट गया। दूसरे दिन सत्याग्रह था। मैं शामिल हुआ। यहीं गिरफ्तार कर लिया गया। तब पहली बार मुझ पर मीसा लगा। 10 महीने तक बंद रहा। फिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया और नवंबर 74 में मैं छूटा। इमरजेंसी के दौरान 30 जून को बनारस में गिरफ्तार हुआ। इमरजेंसी खत्म हुई तो कई साथी विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। मुझे लगा कि यह लक्ष्य से समझौता करना है। मैंने कोशिश नहीं की।

-एक्टिविज्म से अचानक जर्नलिज्म की ओर कैसे रुख किया?

रामबहादुर राय--जैसा मैंने बताया कि कई साथी चुनाव लड़ रहे थे। तब मैंने सोचा कि आंदोलन की बात बताने के लिए दूसरे रास्ते की तलाश करनी चाहिए। तब पत्रकारिता में आया। सन 77 में गाजीपुर लोकसभा सीट से जनता पार्टी की ओर से मेरा और गौरीशंकर का नाम था। मैने कोशिश नहीं की। 79 में जनता पार्टी ने फिर बनारस से लड़ने को कहा। सन् 1991 में बीजेपी की ओर से बनारस से लड़ने का प्रस्ताव आया था। हमारा नाम तय था, अगर हम चाहते। इतना दबाव था कि सुबह-सुबह भीड़ लगती थी। एक दिन गोविंदाचार्य बनारस आए। कहा कि लखनऊ बुलाया जा रहा है। मैं दुविधा में था। एक दिन झोला उठाकर हरिद्वार चला गया। यहां 6-7 महीने रहा। सुबह 5 बजे उठ जाता। गोशाला जाता। वहीं दूध लेकर थन का दूध ही पी जाता। पहाड़ की ओर जाता तो 9 बजे लौट कर आता। दिन में अंकुरित अन्न और रात को एक रोटी खुद से बनाकर खाता। पूरे दिन पढ़ाई करता। यह सिलसिला 6 महीने चला। सन् 78 में राजनीति देखकर मन खिन्न हो गया। जैसा सोचता था, राजनीति वैसी नहीं थी। हरिद्वार में रहने के दौरान ही दो घटनाएं हुई। पहला, जेपी के मरने की अफवाह और दूसरा जनता पार्टी की सरकार नहीं रहेगी, वह डिजॉल्व होगी। जेपी की मृत्यु की वास्तविक खबर भी यहीं मिली। हरिद्वार से लौटकर सीधे पटना गया। वहां जेपी के राजकीय सम्मान सहित तीन-चार बातों को लेकर विवाद था। सभी बड़े दिग्गज नेता पटना पहुंचे थे। एक होटल में चंद्रशेखर और बगल के कमरे में अटल बिहारी वाजपेयी ठहरे थे। मैने रात बारह बजे चंद्रशेखर को जगाया और चीजें तय कीं। फिर जनता पार्टी के सभी घटक दलों की राय थी कि मुझे चुनाव लड़ना चाहिए। चुनाव का काफी दबाव था।

रामबहादुर रायतब हिंदुस्तान समाचार {न्यूज एजेंसी} में बालेश्वर अग्रवाल प्रधान संपादक और जनरल मैनेजर थे। मैने उन्हें पत्र लिखा कि मैं हिंदुस्तान समाचार में शामिल होना चाहता हूं, अगर आप अवसर दें तो। एक अन्य ऑफर था। मेरा सोचना था कि स्वतंत्र काम करूं। तब प्रिंटिंग प्रेस खोलने का फैसला किया। मगर मेरे एक मित्र ने मना किया। (मित्र का नाम पूछने पर राय साहब बताने से इंकार करते हैं, सिर्फ इतना कहते हैं कि बहुत बड़े आदमी थे, अभी जितने लोग हैं, उनसे भी बड़े} कहा कि तुम्हारा स्वभाव कारोबारी नहीं है। उन्होंने ही मुझे पत्रकारिता की ओर आने को कहा। हां, तो बालेश्वर अग्रवाल ने पत्र के जवाब में तीन बातें लिखी, आप आएंगे तो हमारे समाचार एजेंसी को प्रतिष्ठा मिलेगी। हम आपको अधिक पैसा नहीं दे पाएंगे। और यह कि मैं इन-इन तारीखों में दिल्ली में हूं, आओ तो बात करेंगे। सन् 1979, अक्तूबर में मैं दिल्ली आया। उन्होंने कहा कि मोरार जी भाई की लिस्ट में तुम्हारा नाम सबसे ऊपर है (बालेश्वर जी मोरार जी के करीबी थे) यहां क्या कर रहे हो? मैने कहा कि मैं डेस्क पर काम नहीं करूंगा। रिपोर्टिंग करूंगा। संस्थान के नियम के अनुसार मुझे ट्रेनिंग के लिए भोपाल भेजा गया। (बीच में कहते हैं, मेरे ट्रेनिंग की बात सुनकर एसपी सिंह, अशोक टंडन और दीनानाथ मिश्र को अजीब लगा था। उन्होंने टोका भी था) मैंने भोपाल में अपने जानने वालों को चिठ्ठी लिखी। पहुंचा तो उसी दिन सुंदर लाल पटवा के खिलाफ प्रदर्शन था। मेरे पहुंचने की सूचना पाकर लोगों ने अखबारों में मेरे द्वारा प्रदर्शन का नेतृत्व करने संबंधी खबर दे दी थी। वहां के इंचार्ज ने खबर दिखाकर कहा कि आप ट्रेनिंग लेने आएं हैं या आंदोलन करने। चूंकि खबर छप गई थी इसलिए मैंने नेतृत्व किया।

1980 के लोकसभा चुनाव के समय भोपाल में ही था। दो-तीन अच्छी खबरें लिखीं, जो चर्चा में रही और रेडियो तथा स्टेट्समैन अखबार जिसके ब्यूरो प्रमुख अमिताभ बच्चन के ससुर तरुण भादुड़ी थे, ने उसका फालोअप भी किया। यहीं अर्जुन सिंह से परिचय हुआ। ट्रेनिंग छह महीने की थी लेकिन बालेश्वर अग्रवाल ने मुझे 2 महीने बाद ही दिल्ली बुला लिया। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें अरुणाचल भेजना चाहता हूं। 80-82 तक इटानगर में रहा। सन 82 में जब इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आईं तो बालेश्वर जी को हटा दिया गया। मैने मन बना लिया कि अब हिंदुस्तान समाचार में नहीं रहना है। मैं सामान समेट कर दिल्ली पहुंचा। बालेश्वर जी ने सलाह दी कि इस्तीफा मत दो। 6 महीने की छुट्टी ले लो। एक दिन राजमाता विजयराजे सिंधिया से भेंट हो गई। पूछा कि कहां हो? मैने कहा कि रहने की जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे पास बहुत जगह है, आ जाओ। उन्होंने एक कमरे का सेट और एक नौकर दिला दिया।

-इसके बाद किस संस्थान से जुड़े?

रामबहादुर राय--सन् 82 में ही जनसत्ता के निकलने का विज्ञापन छपा। अप्लाई किया। इंटरव्यूह के लिए प्रभाष जी का पत्र आया। इंटरव्यू प्रभाष जी, जार्ज बर्गीज और एलसी जैन ने लिया। 83, जुलाई में रिपोर्टर के रूप में जनसत्ता ज्वाइन कर लिया। प्रभाष जी ने साल भर बाद ही चीफ रिपोर्टर बना दिया। उन्हीं दिनों राजेंद्र माथुर ‘नवभारत टाइम्स’ में आ गए। वे मुझे बुलाते रहें, मैं टालता रहा। फिर एक दिन मैंने हां कर दिया। सन् 86 में स्पेशल कारस्पांडेंट के रूप में नवभारत टाइम्स चला गया। माथुर साहब के रहने तक वहां था। इधर प्रभाष जी बीच-बीच में मुझे बुलाते रहते थे। कहते थे कि आ जाओ, तुम्हारा अखबार जनसत्ता है। 91 में फिर जनसत्ता लौट गया। 94-95 तक ब्यूरो चीफ था। 95 से 2004 तक जनसत्ता समाचार एजेंसी का संपादक रहा। फिर 'प्रथम प्रवक्ता' में आ गया।

(राय साहब अचानक राजेंद्र माथुर के बारे में बताने लगे, उनकी आवाज क्षण भर के लिए लड़खड़ाई, आंखें आकाश में गड़ गईं) 

जिस दिन माथुर साहब का देहांत हुआ, तीन दिन पहले मैं वीपी सिंह के चुनाव दौरे को कवर कर रहा था। फिरोजाबाद में सुबह वीपी सिंह का एक बड़े परिवार में नाश्ता था। उसके बाद हमें बदायूं जाना था। गाड़ी में बैठने की बात आई तो मुझे अचानक लगा कि यात्रा में मुझे आगे नहीं जाना है। मेरे साथ 'टीओआई' की अनीता कात्याल और 'अमर उजाला' के प्रबाल मैत्र थे। मैंने उन्हें बताया। मेरे साथ प्रबाल भी आ गए। हम आगरा पहुंचे। वहां अमर उजाला के मालिक अशोक अग्रवाल से मिले और उनसे दिल्ली का टिकट कराने को कहा। दिल्ली पहुंच कर अपने लौटने की बात आफिस में बताने के लिए फोन किया। कई बार घंटी बजने के बाद माथुर साहब के पीए विश्वंभर श्रीवास्तव (वर्तमान में लालकृष्ण आडवाणी के साथ) ने फोन उठाया। उन्होंने माथुर साहब के हार्ट अटैक की खबर दी।

मैं मानता हूं कि माथुर साबह की मौत नभाटा के अंदर की समस्याओं के कारण हुई। राजेंद्र माथुर को एडिटर गिरीलाल जैन ने आग्रह पूर्वक नवभारत टाइम्स बुलाया था। माथुर साहब का नभाटा को लेकर एक सपना था। यह सपना नभाटा को एक मुकम्मल अखबार बनाने का था। जब तक प्रबंधन अशोक जैन के पास था, उन्हें पूरी आजादी थी। मगर जब समीर जैन आए और उन्होंने टीओआई को प्रोडक्ट व ब्रांड के रूप में खड़ा किया, तब उनको अड़चन आने लगी। उन्हें लगा कि संपादक को संपादकीय के अलावा प्रबंधन के क्षेत्र का काम भी करना होगा तो वो द्वंद में पड़ गए। इससे उन्हें शारीरिक कष्ट हुआ। अपने सपने को टूटते-बिखरते हुए वे नहीं देख पाए। मृत्यु के कुछ दिनों पहले मेरी उनसे लंबी बातचीत हुई थी। एक दिन उन्हें फोन कर मैं उनके घर गया। माथुर साहब अकेले ही थे। वह मेरे लिए चाय बनाने किचन की ओर गए तो मैं भी गया। मैंने महसूस किया था कि वो परेशान हैं। मैने पूछा- क्या अड़चन है। उन्होंने कहा- देखो, अशोक जैन नवभारत टाइम्स पढ़ते थे। उनको मैं बता सकता हूं कि अखबार कैसे बेहतर बनाया जाए। समीर जैन अखबार पढ़ता ही नहीं है। वह 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इकोनामिक टाइम्स' को प्रियारिटी पर रखता है। उससे संवाद नहीं होता। उसका हुकुम मानने की स्थिति हो गई है। यही माथुर साहब का द्वंद था। 

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इस इंटरव्यू पर अपनी प्रतिक्रिया रामबहादुर राय तक पहुंचाने के लिए 09350972403 पर एसएमएस भेज सकते हैं या फिर This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर मेल कर सकते हैं।


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