वे 20 माह नहीं दे रहे थे, मैंने 20 साल ले लिया : हरिवंश

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इंटरव्यू

हमारा हीरो : हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग एक : 15 अगस्त 2009 को प्रभात खबर की उम्र 25 वर्ष हो जाएगी। किसी अखबार की उम्र 25 साल होने का एक मतलब होता है। लेकिन यह अखबार अगर प्रभात खबर है तो इसके मायने औरों से कुछ अलग है। चोली-दामन का साथ रखने वाले हिंदी समाज और हिंदी पत्रकारिता को अगर इस बाजारू दौर में भी किसी अखबार ने अपनी ओर से बेस्ट देने की असल कोशिश की है तो वह प्रभात खबर है। खबरों के धंधे के इस दौर में प्रभात खबर ने चुनाव से ठीक पहले ऐलान किया कि खबरों का धंधा और लोग करते होंगे, हम कतई नहीं करते, न ही करेंगे और ऐसा करने वाले दूसरे अखबारों-मीडिया हाउसों को हर हाल में गलत कहेंगे। यह नैतिक साहस अगर प्रभात खबर में जिंदा है तो इसके पीछे एक व्यक्ति है। वह हैं हरिवंश।

पत्रकारीय पैमाने, पत्रकारीय कसौटी व पत्रकारीय मानक को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके सरल-सहज-देसज हरिवंश प्रधान संपादक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में जिस संतुलन के साथ अखबार निकाल रहे हैं,  जिस सामाजिक सरोकार और पत्रकारीय नैतिकता के साथ अखबार का संचालन कर रहे हैं, वह आधुनिक पत्रकारिता के विद्वानों, मीडिया मार्केट के विश्लेषकों व पत्रकारिता के छात्रों के लिए शोध का विषय है। पाठकों के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी का सौदा किए बगैर कोई अखबार कैसे चल सकता है, बाजार के दबावों की अनदेखी कर कोई अखबार कैसे जिंदा रह सकता है, सिर्फ और सिर्फ पाठकों के भरोसे और सहयोग के बूते कोई अखबार कैसे फल-फूल सकता है- यह सब जानना और समझना है तो हमें-आपको प्रभात खबर और हरिवंश को जानना-समझना होगा। इसी जानने-समझने की प्रक्रिया के तहत भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह पिछले दिनों प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश से मिले और विस्तार से कई दौर में बातचीत की। यह बातचीत दिल्ली में एक कंपनी के गेस्ट हाउस में हुई। दिल्ली से नाता न के बराबर रखने वाले हरिवंश महीनों बाद आफिस के काम से दिल्ली आए तो वादे के अनुरूप फोन करना नहीं भूले। उन्होंने बातचीत करने के लिए वक्त दिया। इस इंटरव्यू में सबसे खास यह है कि इसे बिना किसी संपादन के यहां प्रकाशित किया जा रहा है। इससे कुछ बातों-संस्मरणों-प्रकरणों का दुहराव संभव है। बिना संपादन प्रकाशित करने के कारण इंटरव्यू काफी लंबा हो गया है इसलिए हम इसे कई भाग में प्रकाशित करेंगे।

तो आइए, शुरू करते हैं हरिवंश जी से बातचीत-

-सर, प्रभात खबर के पच्चीस साल पूरे होने पर अग्रिम बधाई! आप इस अखबार से कब जुड़े? पत्रकारिता की शुरुआत कैसे की? आपके बचपन का जीवन कैसा रहा?

--धन्यवाद यशवंत। हम लोगों ने..... मैं जब भी हम 'लोग कहूं' तो इसका आशय मेरी पूरी टीम से है, सिर्फ मुझसे नहीं...... मिलजुल कर बाजार के इस कठिन दौर में पाठकों के भरोसे को कायम रखा है और ऐसा करते हुए हम 25 बरस के हो गए, यकीन नहीं होता। जहां तक मेरी बात है तो मैनें 1989 में प्रभात खबर ज्वाइन किया। मुझे इस अखबार में 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। मैं एक प्रयोग के तहत यहां पहुंचा। यह एक संयोग था। मैने पत्रकारिता की शुरुआत 'धर्मयुग' से की।

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बता दूं। मेरा जन्म 30 जून 1956 को गांव में हुआ। नितांत खेतिहर परिवार से हूं। दो नदियों के बीच, जिसे दोआब कहा जाता है, में मेरा गांव है। बाढ़ से लगातार नुकसान के कारण मैंने अपने घर में हमेशा भय का माहौल बचपन से देखा। जमीन थी लेकिन बाढ़ के कारण केवल एक फसल होती थी। यानि आर्थिक संकट बना रहता था। शुरुआती पढ़ाई गांव में ही की। फिर बनारस चला आया। बीएचयू में इकॉनामिक्स में शिक्षा ग्रहण की।

मैं जयप्रकाश नारायण से काफी प्रभावित रहा। मैं जयप्रकाश जी के गांव का हूं। इस नाते उनकी सादगी, उनकी नैतिकता मैंने बचपन से देखी। उसका एक असर था। जब वह आपातकाल में पकड़े गए तो बड़ा खराब लगा। बाद में मुझे लगने लगा कि आदमी को उसी काम में लगना चाहिए जिसमें उसका मन लगे, जिसमें वह अपने मन के भावों का रख सके। इस प्रकार पत्रकारिता में संयोग से आया। हालांकि मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं बैंक में काम करू।  बैंक का जॉब उस समय सबसे सुरक्षित माना जाता था। पर मेरा मन कुछ और करने का था। उन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया ट्रेनी के लिए वैकेंसी निकालता था। टीओआई की यह ट्रेनिंग बेस्ट मानी जाती थी। वे इसमें फ्रेसर्स को लेते थे।  उस समय मेरी उम्र 19 वर्ष रही होगी। बीएचयू से दिल्ली पहली बार आया, टेस्ट देने के लिए। यहां एक वर्ष की ट्रेनिंग ली। इस प्रशिक्षण के बाद मुझे ‘धर्मयुग’ में काम करने का अवसर मिला।

‘धर्मयुग’ की उस समय छह-सात लाख प्रतियां बिकती थीं। इसमें काम करते हुए कई बार लगा कि जिस उद्देश्य से मैं आया हूं, वह कर नहीं पा रहे हैं। बंबई में रहते-रहते मन ऊब गया। उन्हीं दिनों दो बड़े सरकारी बैंकों में अधिकारी पद पर मेरा सेलेक्शन हो गया। मैंने एक बैंक में हैदराबाद जाकर ज्वाइन कर लिया। लेकिन बैंक की नौकरी में भी मन नहीं लगा और इसे छोड़कर फिर पत्रकारिता में आ गया। मैंने कलकत्ता में 'रविवार' ज्वाइन कर लिया। रिपोर्टिंग के लिए मैं बहुत घूमा करता था- वो चाहे ‘रविवार’ रहा हो या ‘धर्मयुग’। कलकत्ता में रहते-रहते लगने लगा कि दो बड़े घरानों में नौकरी कर चुका हूं, टाइम्स ग्रुप और आनंद बाजार पत्रिका समूह। उस समय की दो सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिकाओं,  जिनका समाज में अपना असर था- ‘धर्मयुग’ और ‘रविवार’ में काम करने के बाद लगने लगा कि अब छोटी जगह में पत्रकारिता करके देखना चाहिए। मैं पत्रकारिता में कुछ नया करने के उद्देश्य से आया था।

रविवार बंद होने के लगभग डेढ़ साल पहले मैंने नया प्रयोग करने के बारे में सोचा। रिपोर्टिंग के सिलसिले में दक्षिण बिहार घूमा था। एकाध बार वो जंगल पहाड़ आदिवासी देखकर लगा कि इस इलाके में कुछ करना चाहिए। मुझे एक बंद से हो चले अखबार 'प्रभात खबर' में अवसर मिला। प्रभात खबर को शुरू किया था कांग्रेसी नेता ज्ञानरंजन ने, जो शिबू सोरेन के काफी करीबी थे। उनके पिता कांग्रेस के बहुत बड़े नेता होते थे। वे अध्यापक थे और बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। ये इंदिरा जी के काफी करीबी थे। इन्होंने ही झारखंड मुक्ति मोर्चा को कांग्रेस के साथ 1980 में जोड़ा। इनका नारा था अलग झारखंड राज्य बनाना। इन्होंने अलग झारखंड राज्य के मुखपत्र के रूप में ‘प्रभात खबर’ की कल्पना की थी। 1984 में रांची से शुरू किया गया यह अखबार 1990 आते-आते आपस में झगड़े की वजह से बंद हो गया। मुश्किल से 200-300 कॉपियां छपती थीं। काम करने वालों की संख्या 250 थी। उस वक्त जब यह बंद होने लगा तो मुझे संपर्क किया गया। मैं इस मन:स्थिति में था कि छोटी जगह जाकर पत्रकारिता करूं। बड़े शहरों, महानगरों को देख लिया। महानगर अपनी रुचि और मिजाज को भाते नहीं, जमते नहीं। और इस प्रकार बिलकुल नई जगह पर, जहां एक दो बार घूमने के अलावा मैं गया नहीं, प्रयोग की दृष्टि से चला गया। मेरे साथ तीन-चार लोग इस अखबार में आए थे। मेरे अलावा बाकी लोग मैनेजमेंट के फील्ड के थे। शेष टीम प्रभात खबर की ही थी।

-बंद पड़े अखबार प्रभात खबर को आपने न सिर्फ चलाया-जमाया बल्कि पत्रकारिता का प्रतिमान भी बनाया। यह सब कैसे कर सके?

--आपके जरिए मैं पहली बार बताने जा रहा हूं कि प्रभात खबर को हम लोगों ने किस आधार पर खड़ा करने की कोशिश की। जब मैं रांची पहुंचा और काम करना शुरू किया तो सबसे पहले वहां के अखबारी परिदृश्य को समझा। वहां जमा-जमाया अखबार था 'रांची एक्सप्रेस'। जमशेदपुर में अखबार निकलता था 'उदितवाणी'। धनबाद में 'आवाज' नामक अखबार स्थापित था। 'आज' अखबार एक रुपए में बिकता था और सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार था। 'आज' ऐसा अखबार था जिसके कई शहरों से संस्करण निकलते थे। मतलब 'आज' मल्टी एडिशन और सबसे ज्याद बिकने वाला अखबार था जो रांची, जमशेदपुर, धनबाद के अलावा पटना से भी निकलता था। यह पूरे अविभाजित बिहार का प्रमुख अखबार था। इसके अलावा जिन तीन अखबारों का नाम बताया वे ऐसे थे जो सिर्फ अपने-अपने शहरों में ही निकलते थे लेकिन वहां खूब बिकते थे। दैनिक हिंदुस्तान चूंकि नार्थ बिहार से संचालित होता था, इसलिए हिंदुस्तान का परंपरागत महत्व था। साउथ बिहार के लोग नार्थ बिहार की खबरें और प्रशासन की खबरें पढ़ने के लिए इस अखबार को लेते थे। तो ये अखबारी परिदृश्य था।

हमारी कसौटी थी कि हम कैसे अच्छा और भिन्न अखबार निकाल सकें। उसके लिए बहुत से नए प्रयोग किए। पहले प्रयास के तहत एक नैतिक आचार संहिता बनाई गई। इस आचार संहिता में लिखा गया कि रिपोर्टर रिपोर्टिंग के लिए जाएं तो क्या करें और क्या न करें। क्या न करें में शराब न पीने की बात साफ तौर पर कही गई। लेकिन इसके बावजूद गड़बड़ियां होती रहीं। हमने कोशिश की साफ-सुथरा और बेहतर माहौल बनाया जा सके। हालांकि हमें इसका प्रतिरोध भी झेलना पड़ा क्योंकि जब आप काम का माहौल सुधारना चाहते हैं तो यथास्थितिवादी लोगों की ओर से परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अखबार से पाठकों को जोड़ने के लिए हमने रांची में एक बैठक की। इस बैठक में हम लोग छह घंटे तक पाठकों की गाली सुनते रहे। पाठकों ने अखबार की खामियां गिनाईं और हमने उन सब खामियों को नोट किया। हमने मुहल्लों तक में पाठकों की राय जानने के लिए कैंपेन चलाया। हमने पूछा कि वे अखबार के बारे में क्या राय रखते है। दूसरा काम किया इश्यूज पर स्टैंड लेना। मंडल के मुद्दे पर हमने स्टैंड लिया। मंडल मुद्दे पर उस समय दो ही अखबारों ने स्टैंड लिया था,  जिसमें नवभारत टाइम्स भी शामिल है। प्रभात खबर के ले-आउट पर खास ध्यान दिया गया।

प्रभात खबर का काम संभालने के बाद मैंने सफल क्षेत्रीय अखबारों का अध्ययन किया। मैं 1991 में राजस्थान पत्रिका देखने गया। महाराष्ट्र टाइम्स देखने गया। इसके बाद इनाडु, मलयालम मनोरमा और नई दुनिया को भी देखा। इन अखबारों के कामकाज के तरीके को गहराई से समझा। इस पर एक रिपोर्ट तैयार की। इन अखबारों ने क्या नई चीजें की हैं, इसका विशेष तौर पर उल्लेख किया। हर तरह से जान-समझ कर हम लोगों ने प्रभात खबर के लिए नए प्रयोग शुरू किए। नए फार्मेट में अच्छे लोगों से लिखवाना शुरू किया। लोकल मुद्दों पर स्टैंड लेना शुरू किया। ले-आउट और कंटेंट को रिच किया। रिपोर्टिंग बेहतर तरीके से कराने पर जोर दिया। यह सब कुछ नए सिरे से शुरू हुआ और देखते ही देखते अखबार को पाठकों का प्यार मिलने लगा। सरकुलेशन बढ़ने लगा। प्रभात खबर ने मंडल कमीशन और भागलपुर दंगों समेत कई समलों पर स्पष्ट स्टैंड लिया। लोकल मुद्दों में मुझे याद आ रहा है कि एक लड़की के अबार्शन के मसले पर जनहित में स्टैंड लेकर एक बड़ा आंदोलन को वैचारिक दिशा दी। इस तरह से अनेक प्रयोग हमने अखबार के साथ किए। आदिवासियों के मुद्दों-समस्याओं को सामने लाने की कोशिश की और आदिवासियों के बीच के लोकल लोगों से ही इस पर लिखवाना शुरू किया। इसके कारण अनेक ट्राइबल पत्रकार सामने आए जो प्रभात खबर से जुड़े हुए है। अलग झारखंड राज्य की मांग को भी हमने समर्थन दिया। पशुपालन घोटाले के खुलासे का श्रेय प्रभात खबर को जाता है। यह घोटाला कोई दबी छुपी घटना नहीं थी। इसे सब लोग जानते थे। सारे अखबार जानते थे। लेकिन इसे प्रकाशित करने का साहस केवल हम लोगों ने किया।

प्रभात खबर से जुड़ने के कुछ समय बाद मुझे लगने लगा कि अगर हम लोगों ने अखबार को जनता और मुद्दों से नहीं जोड़ा तो हम लोग खत्म हो जाएंगे। प्रभात खबर जिस ग्रुप का है, उस ग्रुप का इंडस्ट्रियल कारोबार है। 1991 से 1994 के आसपास जितने नुकसान थे, उनकी भरपाई इस ग्रुप ने किया। लेकिन जब इस ग्रुप की खुद की हालत खराब हो गई तो उन्होंने हाथ खींच लिए। तब हमने सोचा कि क्या किया जाए? हमारे पास जो मशीन थी वह केवल आठ पेज छाप सकती थी और उसे स्क्रेप (कबाड़) हरिवंशघोषित किया जा चुका था। हम लोगों ने उसी से काम करना शुरू किया। हमारे जो दो साथी प्रबंधन की तरफ से आए थे, वे भी बड़े उत्साही और नौजवान लोग थे। एक केके गोयनका और दूसरे आरके दत्ता। वे लुधियाना से एक फोर्थ हैंड मशीन डेढ़-दो लाख रुपए में खरीद कर ले आए। उसको हम लोगों ने रांची में लगाया। उससे हम लोग रांची का अखबार छापने लगे। रांची वाली पुरानी स्क्रेप मशीन को उठाकर जमशेदपुर ले गए। वहां छापना शुरू किया। बाद में इसी मशीन को धनबाद ले गए और वहां से अखबार निकालना शुरू किया।

हम लोग जब भी अखबार का नया संस्करण लांच करते तो सबसे पहले एक गेस्ट हाउस लेते थे और इसी गेस्ट हाउस में संपादक से लेकर चपरासी तक एक साथ रहते थे। मतलब, एक-एक नया एडिशन तब शुरू किया जब पूंजी नहीं थी।  सिर्फ हौसला था, पाठकों का भरोसा था, मजबूत और मेहनती टीम थी। कंपनी आर्थिक रूप से सपोर्ट करने की स्थिति में भले नहीं थी लेकिन हम लोगों में आगे बढ़ने का जज्बा था। तो इस प्रकार हम लोगों ने अखबार खड़ा किया। इसके पहले भी एक प्रयोग हमने किया था। प्रभात खबर की फ्रेंचाइजी के लिए लोग आए। 1991 में तो हमने जमशेदपुर और धनबाद में दो लोगों को फ्रेंचाइजी दिया। पर छह-आठ महीने में लगने लगा कि ये दोनों लोग अखबार को अपने रास्ते पर ले जा रहे हैं। बाद में हमने फ्रेंचाइजी वापस ले लिया और बहुत मित्रवत उनसे अलग हो गए। 1996 में एक मशीन लेकर हम पटना पहुंच गए। इस सबके बावजूद हम लोगों को पूंजी का सपोर्ट नहीं मिल सका। बिना पूंजी, सिर्फ मुद्दों और पाठकों के सहारे हम लोग 1998- 99 तक चलते रहे। सन 2000-01 में हिंदुस्तान और जागरण आए। हिंदुस्तान जब रांची आया तो पांच-छह महीनों बाद हम लोगों को झटका देने के लिए एक दिन एक साथ हमारे अखबार से 33 लोगों का इस्तीफा दिलाकर अपने यहां रख लिया। इसमें संपादक से लेकर मशीन चलाने वाले तक शामिल थे। उनकी पूरी योजना थी कि अगली सुबह प्रभात खबर न छप सके। उनकी तैयारी बहुत बड़े स्तर की थी। मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी योजना की मुझे एक दिन पहले तक भी जानकारी नहीं थी। मेरे साथ दिक्कत यह है कि मैं अपने कर्मचारियों पर पूरा विश्वास करता हूं। अगर कोई इस्तीफा देने मेरे पास आता है तो मुझे कोई मलाल नहीं होता क्योंकि मेरा स्वभाव ही ऐसा है। तब से अब तक कोई 200-250 लोग प्रभात खबर से जा चुके होंगे। कोई दिक्कत नहीं हुई। पर 33 लोगों का अचानक इस्तीफा देना, बिना नोटिस दिए एकदम से चले जाना, यह स्तब्ध करने वाला था लेकिन हम लोगों ने किसी को रोकने की कोशिश नहीं की। अगले दिन अखबार निकला। नए लोगों को नियुक्त किया, ट्रेंड किया। अखबार चलता रहा।

हमारे सामने सबसे बड़ी दिक्कत पूंजी की रही  नहीं तो बड़े घरानों के अखबारों को झारखंड में स्पेश मिलना मुश्किल होता। हम ठीक प्रकार से विस्तार नहीं कर पाए। हॉकर को गिफ्ट वगैरह नहीं दे पाए। अखबार की कीमत हम नहीं घटा सके। दैनिक जागरण ने तो डेढ़-दो रूपए में अखबार बेचा। हम लोग ज्यादा पेज नहीं दे पा रहे थे। दूसरे अखबार 18-18 पेज के थे जबकि हम लोग 16 पेज से ज्यादा देने की स्थिति में नहीं थे। इसी प्रकार हम उनको उनकी शैली में उत्तर नहीं दे सके। फिर भी हम मार्केट में बने रहे और आगे रहे। हम लोग 2004 के आस-पास प्रबंधन के पास गए और कहा कि बड़े-बड़े अखबार अपनी मार्केटिंग योजनाओं के साथ आ रहे हैं, इसलिए कुछ करना होगा। हम लोगों को भी नियोजित तरीके से आगे बढ़ना होगा। इसके लिए पैसा चाहिए। हमें प्रभात खबर में पैसा लगाने वाले चाहिए। इसके लिए प्रभात खबर का वैल्यूवेशन कराना जरूरी था। यह पता करना जरूरी था कि आखिर हम लोग खड़े कहां हैं। एक बाहरी और प्रोफेशनल कंपनी से प्रभात खबर का आंकलन कराया गया। उस कंपनी ने बताया कि प्रभात खबर का मार्केट वैल्यू 120 करोड़ रुपये है। हमारे लिए भी यह सूचना एक खबर थी। जिस अखबार को बहुत मामूली संसाधनों और मामूली पूंजी से बढ़ाया गया, उसकी कीमत आज इतनी हो गई।

दरअसल मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी जरूर रहा लेकिन हमारे समय में अर्थशास्त्र का मतलब होता था समाज को आगे ले जा सकने वाला वाद और वादा। इसीलिए हमारे समय में पूंजीवाद और  समाजवाद पर काफी कुछ पढ़ाया-बताया जाता था। शेयर मार्केट क्या होता है, इक्विटी क्या होती है, ये कुछ भी नहीं मालूम था। प्रभात खबर के वैल्यूवेशन के वक्त से मुझे शेयर मार्केट और इक्विटी की गहराई के बारे में पता चलना शुरू हुआ।

हमारे प्रबंधन के दिमाग में आया कि हमें अखबार निकालने के काम से निकल जाना चाहिए। प्रभात खबर को खरीदने के लिए कई बड़े अखबार तैयार थे। कई दौर की बातचीत के बाद कुछ चीजें तय भी हो गई थी पर अचानक प्रबंधन को लगा कि प्रभात खबर को अभी रखना चाहिए। यहां मैं बताना चाहूंगा कि झारखंड में बड़े अखबारों ने हर संभव तरीके से वर्चस्व कायम करने की कोशिश,  लेकिन वो लोग अभी तक वर्चस्व स्थापित नहीं कर सके हैं।

मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि यदि हमारे पास पूंजी होती तो इन बड़े अखबारों की जितनी उपस्थिति इस इलाके में बनी है, शायद इतनी भी न बन पाती। अगर पूंजी होती तो हम लोग टैलेंट को नहीं जाने देते। हम लोग पब्लिसिटी बहुत अच्छी तरह से कर सकते थे। एग्रेसिव मार्केट का जो कांसेप्ट है, उस पर अमल करते। जब हमने प्रभात खबर ज्वाइन किया था तो आमतौर से हमारे सारे मित्र लोग कहते थे कि प्रभात खबर का भविष्य क्या है?  मैं कहता था कि भविष्य हम सब लोगों के हाथ में है। बेहतर काम करेंगे तो इसका भविष्य बनाए रखेंगे। लोगों ने तो मुझे बीस माह का भी समय नहीं दिया। लोग कहते थे कि 20 महीने भी इस अखबार को नहीं चला सकते। इतना खराब हाल था। पर 20 महीने क्या, इस अखबार को आज 20 साल तक चलाकर दिखा दिया। यह अखबार चल रहा है और आगे भी चलेगा।

-बचपन या पढ़ाई-लिखाई के दौरान की कोई ऐसी बात बताइए जिसे आपने कभी किसी से शेयर न किया हो? आप बताना चाहेंगे कि आप पर सबसे गहरा असर किस व्यक्ति का हुआ?

-जिस व्यक्ति का मेरे ऊपर सबसे ज्यादा असर पड़ा या जिस व्यक्ति ने मेरे जीवन को नया मोड़ दिया वह थे एक अध्यापक। वो मेरे स्कूल में नए-नए आए थे। मेरे गांव में आने-जाने का कोई रास्ता नहीं था।  कठिन गांव था। 11-12 किलोमीटर पैदल आना-जाना पड़ता था। इसलिए कोई अध्यापक इस गांव में ठहरता नहीं था। तो वे जो अध्यापक आए थे, वह गणित के बहुत अच्छे अध्यापक थे। वे मुझे पढ़ाते थे। एक दिन वह अस्वस्थ हो गए।  हमारे घर पर आए। पीने के लिए पानी मांगा। मैं पानी लाया तो उन्होंने पूछा कि इस पानी को छान लिया है न?  मैंने झूठ कह दिया कि छान लिया है। जब वह पीने लगे तो उसमें से मेढ़क का एक छोटा बच्चा निकला। अध्यापक ने मुझे मेढ़क का वह बच्चा दिखाया लेकिन कहा कुछ नहीं और न ही डांटा-पीटा। इसका मेरे ऊपर बहुत गहरा असर पड़ा। मैंने सोचा कि अध्यापक ऐसे भी होते हैं जो पीटते-डांटते नहीं हैं। वे अध्यापक ऐसे थे जो खाली समय में गरीब बच्चों को पढ़ाते थे। वह मेरे लिए नैतिक रूप से बहुत प्रेरक रहे है। वे आज भी जीवित हैं। मैं उनसे मिलता हूं तो उनके पैर छूकर प्रणाम करता हूं। मैं मानता हूं, जो मैं कुछ बन सका हूं, उसमें उनका बड़ा हाथ हैं।

मैं अपने गांव और गांव के माहौल के बारे में बताना चाहूंगा। 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूलों में बहुत से कार्यक्रम होते थे। उस समय के अध्यापक उन विशेष दिनों में खद्दर के कपड़े आदि पहनकर भगत सिंह,  चंद्रशेखर आजाद,  महात्मा गांधी आदि की जय-जयकार करते-कराते थे। हम लोग इन नामों के बारे में जानते नहीं थे कि ये कौन हैं, लेकिन एक उत्सुकता पैदा होती थी कि इनके नामों में क्या जादू है कि लोग इन्हें याद करते हैं। इसी प्रकार जयप्रकाश जी हर साल गांव आते तो उनके साथ बड़े मशहूर लोग आते। देखने की उत्सुकता रहती थी। गांव के लोग जाते थे। मैं भी जाता था। वैसे मैं बच्चा था। देखता था जवाहर जी का नाम आ रहा है। फलां का नाम आ रहा है। लेकिन मैं कुछ समझ नहीं पाता था। जब जवाहर लाल नेहरू की मौत हुई तो देखा कि गांव में लोग किस प्रकार रो रहे हैं। लगता था कि उनके परिवार के किसी सदस्य की ही मौत हो गई है। ऐसे दृश्य देखने से मन में सामाजिक सरोकार पैदा हुए।

...जारी...


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