एनडीटीवी में भी काफी पक्षपात : राजेंद्र यादव

E-mail Print PDF

राजेंद्र यादव

भड़ास4मीडिया से विशेष बातचीत में प्रख्यात साहित्यकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव बोले- ये मीडिया सिर्फ 'मीडिया' नहीं है : राजेंद्र यादव हिंदी वालों के दिल-ओ-दिमाग पर लगातार छाए रहते हैं। कभी खलनायक के रूप में तो कभी नायक के रूप में। साहित्यिक पत्रिका 'हंस' के माध्यम से हिंदी के बौद्धिक लोगों को जी-भर खुराक देने वाले राजेंद्र यादव साहित्य के स्थापित और चर्चित नाम हैं। भड़ास4मीडिया के कंटेंट हेड जयप्रकाश त्रिपाठी ने मीडिया और साहित्य के कई मुद्दों पर राजेंद्र यादव से खुलकर बातचीत की। पेश है इस विशेष इंटरव्यू के कुछ अंश : 

-पूंजीवादी मीडिया के खिलाफ आज के दौर में जनता का पक्ष किस तरह सामने आना चाहिए? जैसा कि चुनाव के दिनों में काफी हल्ला रहा, लाखों-करोड़ों रुपये लेकर विज्ञापन को खबरों के रूप में छापने वाला क्या यह 'दलाल' मीडिया है? क्या उसके खिलाफ व्यापक जनाधार वाली मोरचेबंदी जरूरी नहीं होती जा रही है?  

-देखिए, एक चीज है, ये सही है कि इस समय मीडिया का वर्चस्व है, खास तौर से दृश्य-मीडिया का। टीवी चैनल्स बिल्कुल छाए हुए हैं। सैकड़ों चैनल हैं और सैकड़ों आ भी रहे हैं। चैनलों की भीड़ में लोगों को समझ में नहीं आएगा कि कौन-सा देखें, कौन-सा नहीं देखें। इस समय सही बात ये है, जैसाकि अखबारों में निकला, हमारे यहां ('हंस' में) भी छपा, टीवी पर दिखा कि जब पैसा लेकर खबर बनाएंगे, दिखाएंगे तो बात बिल्कुल उल्टी हो जाएगी। जिससे जितना पैसा लिया, उसको उतना कवरेज दिया। प्रिंट मीडिया में भी, दृश्य में भी। लोगों ने अपने विरोधियों की खबर दबाने के लिए पैसे दिए। एक तरह से वो चुनाव का दंगल हो गया। सवाल ये है कि ये जो अंधेरगर्दी चल रही है, ये जो धुंआधार हो रहा है, तो अब इसके खिलाफ होना क्या चाहिए? एक तो ये जानिए कि दृश्य मीडिया मुख्य रूप से मध्यम वर्ग का है। वही इसका दर्शक और श्रोता है। तो उनका मीडिया है। यदि कोई अनहोनी हो जाए, तो ये राजेंद्र यादवमध्यवर्गीय लोग कभी भी भीड़ बनाकर टीवी चैनलों के दफ्तरों पर नहीं जाएंगे। ये घरों में रहेंगे, गाली देते रहेंगे और सोते रहेंगे। लेकिन कहते हैं न कि बाजार मजबूर कर देता है। आप अभिशप्त हैं, चीजें खरीदने के लिए। और वो निर्लिप्त हैं बेंचने के लिए।  

देखिए कि मीडिया सिर्फ खबरें नहीं बेच रहा है, ये मीडिया सिर्फ मीडिया नहीं है, ये विज्ञापनों के माध्यम से कंज्यूमर्स को हजारों चीजें बेच रहा है। जो हम चाहते नहीं, जिसकी हमे जरूरत नहीं, वह भी हमे खरीदने के लिए ललचाता रहता है। ऐसे में या तो आपके पास एक समानांतर या पैरलल किस्म का मीडिया हो,  जो इसलिए संभव नहीं है कि ऐसे एक-एक मीडिया संस्थान स्थापित करने में सैकड़ो-सैकड़ो करोड़ की पूंजी लग रही है। वह संस्थान, चाहे प्रिंट का हो या दृश्य का। इतना कॉस्टली हो गया है कि जब तक आपके पास दो-तीन सौ करोड़ न हों, आप चैनल चलाने की बात ही नहीं सोच सकते हैं। अखबार तो भी सौ-पचास लाख में चला सकते हैं, लेकिन चैनल नहीं। इतनी पूंजी लगाने के बावजूद आप में क्षमता होनी चाहिए कि दो-तीन साल घाटा भी बर्दाश्त करें।  

ऐसी स्थिति में दो ही विकल्प बचते हैं। क्योंकि पैरलल हम चला नहीं सकते। आज मैं जो चैनल देखता हूं, जो मुझे सबसे विश्वसनीय चैनल लगता है, एनडीटीवी है। वहां भी काफी पक्षपात दिखाई देता है। हो सकता है, वह विज्ञापन के रूप में प्रायोजित खबरों का पैसा न लेते हों। आपको शायद याद होगा। दो-तीन साल पहले हमने 'हंस' का एक विशेषांक खबरिया चैनलों पर प्रकाशित किया था। उसके बाद चैनल में काम करने वाले लेखकों की कहानियों पर एक किताब निकाली थी। उन कहानियों से जो सच सामने आया, पहली बार जान पड़ा कि चैनलों के भीतर अद्भुत कहानियां है। चैनलों के भीतर हालात भयानक हैं। कि कैसे एक घटना को बनाया जाता है, और उसको कवर करके उस पर हंगामा क्रिएट किया जाता है। जैसे चैनल्स के रिपोर्टर्स ने एक दूध वाले से कहा कि पहले हम तुम्हारे कपड़ों में आग लगा देंगे। इसके बाद फोटो खींचकर आग बुझा देंगे। आग लगा दी, बुझाया नहीं, उस पर फिल्म बनाने लगे और वह देखते ही देखते जिंदा जल गया। मर गया।

ऐसा पहले अमेरिकी मीडिया कर चुका है। पंद्रह-बीस साल पहले वहां का एक अखबार व्यवसायी था। बाद में उसका बेटा उसके साथ काम करने लगा। अखबार निकालने लगा। उसने नए धंधे का नया तोड़ निकाला। सत्य कथाओं का प्रकाशन। उसका बचपन का एक दोस्त था। उसने दोस्त से कांटेक्ट किया कि वह उसे सच्ची-ताजी अपराध कथाएं बताए, वह उन्हें ही छापेगा। सच्ची घटनाएं छपने लगीं। अखबार की मांग आसमान छूने लगी। फिर उससे कहा कि एक्सक्लूसिव खबरों के लिए तुम अपराध आयोजित करो। हम उनकी फोटो लेंगे, अब सचित्र छापा करेंगे। अब हुआ ये कि वे घटनाएं सबसे पहले उसके अखबार में छपने लगीं। धीरे-धीरे वह इतना पॉवरफुल हो गया कि उसकी तूती बोलने लगी। घटनाएं भी खूब होने लगीं। जो भी घटना होती, सबसे पहले उसके ही अखबार में छप जाती। उसी दौरान वहां किसी राष्ट्राध्यक्ष का प्रोग्राम बना। उसकी एक्सक्लूलिव खबर बनाने के लिए उन्होंने उसकी हत्या की साजिश रची। होता यह था कि उधर घटना होती, इधर पहले से खबर बना ली जाती। राष्ट्राध्यक्ष की हत्या की साजिश सफल नहीं हो सकी लेकिन मर्डर की पहले से तैयार खबर अखबार में छप गई। उसके बाद वह अखबार ऐसा ध्वस्त हुआ कि फिर कभी न उठ सका। जो अपने को सर्वशक्तिमान मान लेता है, किसी समय वह भी इसी तरह ध्वस्त होता है। यही हाल आज भारतीय मीडिया का होता जा रहा है। इनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता से सूचनाओं को लेकर जिस तरह की मनमानी बढ़ती जा रही है, यही उनके विनाश का कारण भी बनेगी। ये पूंजीवादी मीडिया बाहरी नहीं, अपने आंतरिक कारणों से कभी बेमौत मरेगा। क्योंकि यह इतना बलवान हो चुका है कि किसी बाहरी मार से नहीं मरेगा। ये अपने ही अंतरविरोधों, आपसी 'युद्ध-प्रतिद्वंद्विता' या अपने बोझ से मरेगा। जैसाकि मार्क्स ने भी कहा है, पूंजीवाद अपनी मौत मरेगा, तो इस वैभवशाली मीडिया पर भी वही बात लागू होती है। तो इस खबरफरोश मीडिया के खिलाफ जनता की ओर से बस यही उम्मीद की जा सकती है। जहां तक इस मीडिया के जनता के साथ खड़े होने की बात है, यह किसी आंदोलन को खड़ा कर सकता है, लेकिन उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता। यही इसके बाजार और अस्तित्व का तकाजा है।  

राजेंद्र यादव से बातचीत करते भड़ास4मीडिया के कंटेंट हेड जयप्रकाश त्रिपाठी

-उदय प्रकाश सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने लगे हैं। उनके खिलाफ लेखकों ने बहिष्कार का ऐलान किया। वह हर तरह की राजनीतिक विचारधारा से अपने को मुक्त घोषित कर रहे हैं? इस पर आपका क्या सोचना है?  

जब उदय प्रकाश के खिलाफ लेखकों की सूची जारी की गई थी, मुझसे भी समर्थन मांगा गया था। मैं उस समय तक कुछ जानता नहीं था। मैंने उनसे पूछा था और कहा था कि जब तक कोई बात मैं पूरी तरह न जान लूं, उस पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। मैं पहले पता करूंगा कि आखिर सही बात क्या है?  जो लोग उस सूची में मेरा नाम भी शामिल करना चाहते थे, बाद में उनकी बातों की पुष्टि हो गई।

देखिए, उदय प्रकाश बहुत बेजोड़ साहित्यकार हैं। यदि इस समय हिंदी कथाकारों में कोई एक नाम लेना हो, तो वह हैं उदय प्रकाश। लेकिन जरूरी नहीं है कि व्यक्तिगत रूप से भी वह वैसे ही बेजोड़ हों। वह इस समय 'आत्म-प्रताड़ना' जैसी बीमारी के शिकार हैं। उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ सब लोग षड्यंत्र करते हैं, उन्हें सब लोग सताते हैं, उन्हें पुरस्कार नहीं देते, उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार नहीं मिला, उन्हें कोई नौकरी नहीं दे रहा, आदि-आदि। बराबर, चौबीसो घंटे उनकी यही शिकायतें रहती राजेंद्र यादवहैं। ये जो चीजें हैं, हमेशा आत्म-दया, आत्म-करुणा, कुंठा कि सारी दुनिया उनके खिलाफ है, उसका कारण वो ये मानते हैं कि बाकी जो हिंदी वाले लोग हैं, बहुत टुच्चे हैं, अनपढ़ लोग हैं, बेवकूफ हैं और सिर्फ वे (उदय प्रकाश) ही एक महान लेखक हैं। सिर्फ उन्होंने ही अच्छी किताबें लिखी हैं, बाकी सब उल्लू के पट्ठे हैं, उनसे जलते और उनके रास्ते की बाधा हैं। जब वह इस तरह सोचेंगे, इस तरह की बातें करेंगे तो क्या कहा जाए!

गोरखपुर वाले प्रकरण पर एक बार मेरे पास भी उनका फोन आया। छूटते ही उन्होंने मुझसे सवाल किया कि ये सब क्या हो रहा है? मैंने कहा, हो क्या रहा है, जैसा कर रहे हो, वैसा हो रहा है। वे कहने लगे, मेरा वह पारिवारिक मामला था, मेरे भाई की स्मृति में वह कार्यक्रम हुआ था। उनकी बरसी का आयोजन था। मैं उसमें गया था। तो, मैंने उनसे पूछा कि जब वह निजी कार्यक्रम था तो सार्वजनिक तरीके से क्यों आयोजित किया गया। यदि सार्वजनिक तरीके से हुआ तो पर्सनल कैसे रहा? क्या आप जानते नहीं थे कि वह योगी आदित्यनाथ 'वहां का भयंकर हत्यारा, गुंडा, बीजेपी का बदमाश' भी वहां मंच पर बैठा था? और आपने उसके हाथ से पुरस्कार ले लिया, क्यों? क्या यह सब अनजाने में हो गया?  इतने मासूम, इतने दयनीय मत बनो। मैंने उस दिन उदय प्रकाश को बहुत डांटा था। तुम्हारे भीतर एक ऐसी कुंठा है, जो लगता है कि हर आदमी तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है। मेरा खयाल है कि तुम खुद अपना कोई रास्ता तलाश लो। मुझे लगता भी है कि वह कोई नया रास्ता तलाश रहे हैं।  

वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं। सवाल उठता है कि उदय प्रकाश जैसा प्रबुद्ध लेखक क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मतलब नहीं जानता? वह उसका समर्थन कर रहा है तो उसका क्या मतलब है? या तो उसे अवसरवादी कहेंगे या कुछ और। मैं कहना नहीं चाहता, लेकिन गांव का एक बड़ा वैसा मुहावरा है कि 'सबसे सयाना कौवा, सबसे ज्यादा गू खाता है'। पक्षियों में सबसे सयाना। गंदी चीजों पर सबसे ज्यादा चोंच मारता फिरता है, हर जगह।  

सुना है कि अब वह अपने समस्त राजनीतिक सरोकार खत्म कर लेने की बातें भी करने लगे हैं....कि किसी राजनीतिक विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध नहीं, कि किसी भी तरह की राजनीतिक तानाशाही के खिलाफ हैं, आदि-आदि। तो राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक तानाशाही, दोनों अलग-अलग दो बाते हैं। एक बाहर से है, दूसरी खुद की। लेखक के साथ कोई राजनीतिक तानाशाही न हो, यह एक ठीक बात है, लेकिन लेखक कहे कि मेरी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है, ये अलग बात हो गई। और ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। जब वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो क्या वह उनके राजनीतिक विचारों का संकेत नहीं? क्या वह नहीं जानते कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राजनीतिक बात है, और किस तरह के लोगों की राजनीतिक विचारधारा की बात है?  अगर मैं उदय प्रकाश के बारे में इन बातों को सही मानूं तो मैं उनसे एक बात कहना चाहूंगा कि 'कोई भी नया कपड़ा पहनने से पहले अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा होना पड़ेगा'!  

-विचारधारा को लेकर एक सवाल आप पर भी बनता है। आपने कहीं कहा है कि विचारधारा नृशंस बनाती है। कैसे?

देखिए, उस बातचीत के दौरान मुझे ऐसा लगा था। अभी भी लगता है। लड़ने के लिए, युद्ध के लिए, और उसके बाद उन विचारों के हिसाब से जो शासन प्रणाली बनती है, तो वह उस राज्य के माध्यम से अपने विचारों को लोगों पर लागू करने की अवांछित कोशिशें ज्यादा करती है। जिन विचारों की दृढ़ता के साथ आप कोई संघर्ष करते हैं, लड़ते हैं, युद्ध करते हैं, युद्ध जीत जाने के बाद जब आप शासन में आएंगे, तो उसी एक-पक्षीय वैचारिक नृशंसता के साथ अपनी शासन प्रणाली चलाना चाहेंगे। जैसे आज माओवादी, जिस साहस, एकता और हिम्मत से लड़ रहे हैं, शासन में आ जाने के बाद वह उसी मजबूती से अपने विचारों को लागू करना चाहेंगे। जहां-जहां इस्लामी शासन प्रणाली आई, वहां भी ऐसा हुआ। उनकी नजर में, उनके विचारों के हिसाब से जो काफिर थे, दमन का शिकार हुए। लेकिन हमारे यहां बात दूसरी है। जब संग्राम होता है तो उसके नायक दूसरे होते हैं, सत्ता में आ जाने के बाद दूसरे। जैसे महात्मा गांधी। जब स्वतंत्रता सेनानी गांधीवादी तरीके से संग्राम जीत कर राजसत्ता में आगे तो गांधी चले गए। हमने जो प्रजातंत्र की शासन प्रणाली अपनाई, वो शब्दशः वैसी नहीं थी, जैसा गांधी जी चाहते, कहते थे। गांधी जी व्यक्ति-केंद्रित थे। वह उस समय की पैदाइश थे, जब सारी चीजें व्यक्ति-केंद्रित होती थीं। अहिंसा तो सिर्फ कहने को उनका राजनीतिक अस्त्र था।  

-गांव के प्रश्न 'हंस' से नदारद क्यों रहते हैं? वहां के प्लेटफॉर्म से स्त्री-प्रश्न, दलित-प्रश्न, अश्लीलता के प्रश्न ज्यादा हावी दिखते हैं, जबकि प्रेमचंद की स्मृति-धरोहर होने के नाते भी, 'हंस' को आज के गांवों की दशा पर सबसे ज्यादा तल्ख और मुखर होना चाहिए। यह तटस्थता, गांवों के प्रति यह उदासीनता क्यों?

बात सही है। चूंकि मैं गांव का सिर्फ रहा भर हूं, लेकिन सचेत जीवन शहरी रहा है। सीधे संपर्क नहीं रहा। मेरे संपादक होने के नाते हंस के साथ एक बात यह भी हो सकती है। हालांकि ऐसी कोई बात नहीं कि अपने समय के गांव को रचनाकार के रूप में मैंने महसूस नहीं किया है। पैंतालीस सालों शहर में रह रहा हूं। हंस के साथ सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन भी शहरी मध्यवर्ग का है। अब सवाल उठता है कि हम गांव के बारे में लिखें या गांव के लोग लिखें। यदि गांव से कोई गांव के बारे में लिखे तो बहुत ही अच्छा, लेकिन ऐसा हो कहां रहा है? ऐसा संभव भी नहीं लगता है। प्रेमचंद ने होरी के बारे में लिखा। किसी होरी को पता ही नहीं कि उसके बारे में भी किसी ने कुछ लिखा है। ये तो शहरों में बैठकर हम लोग न उसकी करुणा और दुर्दशा की फिलॉस्पी गढ़ रहे हैं। आज गांवों से कुछ लोग लिख रहे हैं। वे कौन-से लोग हैं? वे, वह लोग हैं, जो गांव में फंसे हैं, किसी मजबूरी या अन्य कारणों से। या कहिए कि जिन्हें शहरों में टिकने की सुविधा नहीं मिल पाई, गांव लौट गए और वहीं रह गए हैं। मजबूरी में वही गांव में रह राजेंद्र यादवकर गांव के बारे में लिख रहे हैं। और ये वे लोग नहीं हैं, जो गांवों में रम गए हैं।

फिर भी, हमारे यहां हंस में आज भी सत्तर फीसदी कहानियां गांव पर होती हैं। मैं अपने को प्रेमचंद, टॉलस्टॉय और गोर्की की परंपरा में मानता हूं। तो मुझे तो रूसी समाज पर लिखना चाहिए। क्यों? या मेरे समय में प्रेमचंद का गांव तो नहीं? मेरे लिए अपने समय के मानवीय संकट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वह गांव के हों या शहर के। प्रेमचंद ने गांव पर लिखा। यहां प्रेमचंद के गांव से ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण होती है 'प्रेमचंद की चिंता' गांव के बारे में। यशपाल ने गांव पर नहीं लिखा, लेकिन मैं उन्हें प्रेमचंद की परंपरा का मानता हूं, क्योंकि उनकी रचना में जो मानवीय संघर्ष, मानवीय स्थितियां परिलक्षित होती हैं, हमे सीधे उसी गांव के सरोकारों तक ले जाती हैं। तो हंस के साथ गांव की बात जोड़कर एक लेखक के विषय को लेकर हम कंफ्यूज कर रहे हैं। आज मेरा समाज वो नहीं है, जो प्रेमचंद का था। मैंने 'प्रेमचंद की विरासत' के नाम से एक किताब भी लिखी है। आज आवागमन दोनों तरफ से है। गांव शहर में बढ़ता जा रहा है, शहर गांव में घुसता जा रहा है।  

-'हंस' के संपादक के रूप में आपको वेब मीडिया, ब्लॉगिंग, न्यूज पोर्टल का कैसा भविष्य दिखता है? क्या पूंजीवादी मीडिया के दायरे पर एक बड़ा हस्तक्षेप नहीं है?  

नहीं। कोई हस्तक्षेप नहीं। इसका भविष्य तभी मजबूत होगा, जब ये एकजुट हो जाएंगे। तभी हस्तक्षेप संभव हो सकता है। अलग-अलग रहकर नहीं। पैरलल तभी बनेंगे, जब एकजुट होंगे। हजारों-लाखों ब्लॉग, पोर्टल देखना किसी एक के लिए संभव नहीं। न किसी के पास इतना समय है। लेकिन हां, पैरलल हस्तक्षेप बहुत जरूरी है, इसको कामयाब और एकजुट होना ही चाहिए। इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए।


AddThis