इंटरनली चैलेंज न मिले तो बाहर तलाशना चाहिए

E-mail Print PDF
निदेशकों का मुझ पर  और प्रोडक्ट में फेथ है, इसलिए सफल हूं :  ट्रेनी संपादक हूं, सबसे सीखता हूं
Alok
Alok
हमारा हीरो

आलोक सांवल 

सीईओ व संपादक : आई-नेक्स्ट 

आलोक सांवल, एक ऐसा नाम, जिसने मात्र 35 वर्ष की उम्र में एक अखबार की परिकल्पना करने से लेकर उसे  देखते ही देखते उस खास कैटेगरी में देश का नंबर एक अखबार बना डाला। और  इस परिघटना  और ट्रेंड के लिए  उनका नाम न सिर्फ हिंदी मीडिया बल्कि संपूर्ण मीडिया जगत में जाना जाता है। समकालीन पत्रकारिता पर जब कभी लिखा जाएगा तो उसमें आई-नेक्स्ट व आलोक सांवल की जरूर चर्चा होगी। दैनिक जागरण समूह के सेकेंड ब्रांड और देश के पहले कांपैक्ट साइज बाइलिंगुवल अखबार आई-नेक्स्ट का प्रकाशन व डेढ़ साल के भीतर ही इसके नौ संस्करणों की सफल लांचिंग का अगर एक मात्र श्रेय किसी टीम लीडर को दिया जाएगा तो वो इसके सीईओ, प्रोजेक्ट हेड और संपादक आलोक सांवल हैं। कानपुर में आई-नेक्स्ट के मुख्यालय से समस्त नौ केंद्रों  में  आई-नेक्स्ट के संपादकीय, प्रसार, विज्ञापन, ब्रांडिंग व अन्य गतिविधियों का संचालन करने वाले इस नौजवान शख्स को भड़ास4मीडिया ने साप्ताहिक कालम अपना हीरो शुरू करने के  लिए इसलिए चुना क्योंकि ये न सिर्फ नौजवान हैं और हिंदी मीडिया के नौजवानों के लिए एक रोल माडल की तरह हैं बल्कि उन्होंने हिंदी मीडिया मार्केट में हिंदी भाषी युवाओं की अभिरुचि को समझा व उसके अनुकूल प्रोडक्ट देने के लिए दिन-रात मेहनत की। सहज व सरल स्वभाव के आलोक सांवल जब आई-नेक्स्ट के वेब पोर्टल की लांचिंग की तैयारियों के सिलसिले में पिछले दिनों दिल्ली आए तो भड़ास4मीडिया के एडीटर यशवंत सिंह ने उन्हें उनके बेहद व्यस्त शिड्यूल के बावजूद दैनिक जागरण के ओखला स्थित आफिस में पकड़ा और विस्तार से बातचीत की। पेश है अपना हीरो कालम के पहले हीरो आलोक सांवल से विस्तृत साक्षात्कार के कुछ अंश--

  • Alok Sanwalशुरुआत आप के निजी जीवन से।
  • यूपी के हमीरपुर जिले के राठ कस्बे में पैदाइश। यहीं आठवीं तक पढ़ाई की। ढाई साल शिशु मंदिर में पढ़ा। कक्षा 9 से 12 तक कानपुर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय में शिक्षा ली। पिता पेशे से डाक्टर हैं। उनसे सामाजिक संस्कार मिला। मां से जीवन में आगे बढ़ने, कुछ कर दिखाने और सफल होने की आकांक्षा व महत्वाकांक्षा पैदा हुई। गुरुजनों से जीवन जीने का मकसद मिला। बस, यही है थोड़ा-सा परिचय।
  • उच्च शिक्षा के बारे में।
  • 12वीं तक तो कानपुर में रहा फिर बिट्स पिलानी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग (बीटेक) की पढ़ाई की। यहां वर्ष 1988 से 1993 तक रहा। इन्हीं दिनों में इतना कुछ सीखने और करने को मिला की एक तरह से जीवन की दिशा यहीं की पढ़ाई से तय होने लगी।
  • जीवन की दिशा यहीं से तय होने लगी, किस तरह?
  • यहां हिंदी भाषा के साथ जीने और उसके साथ आगे बढ़ने व व्यक्तित्व निखारने के कई मौके मिले। हालांकि बिट्स पिलानी वेस्टर्न कल्चर व माहौल के लिए जाना जाता है, बावजूद इसके, यहां हिंदी में काफी कुछ काम व गतिविधि होती है। उदाहरण के तौर पर यहां क्षणिकाएं, वाद-विवाद प्रतियोगिता होती थीं, वाणी  नामक हिंदी पत्रिका का प्रकाशन होता था, जिसमें मैं जुड़ा और बाद में इसका संपादन किया। यहां के एनुअल कल्चरल फेस्टिवल ओएसिस के लिए भी एक पत्रिका निकलती थी जिसका संपादन करने के दौरान एडीटिंग व प्रिंटिंग की बाराकियों को समझने-सीखने का मौका मिला।
  • Alok Sanwalइंजीनियरिंग की डिग्री ली और काम हिंदी मीडिया के क्षेत्र में कर रहे हैं, इस उलटबांसी का राज?
  • करियर की शुरुआत तो इंजीनियरिंग की डिग्री वाले फील्ड से ही की। 3 साल (1993 से 1996) तक थर्मेक्स कंपनी में सेल्स एंड सीनियर सर्विस इंजीनियर के रूप में काम किया। इस दौरान लगता रहा कि ये वो नहीं जो मैं चाहता हूं। बस, दिशा बदल दी।
  • मतलब? सोचा और एकदम से दिशा बदल दी?
  • नहीं, इसके लिए काफी मेहनत भी करनी पड़ी। मेहनत का तो कभी कोई विकल्प ही नहीं है। थर्मेक्स कंपनी को छोड़कर प्रतिष्ठित संस्थान माइका (मुद्रा इंस्टीट्यूट आफ कम्युनिकेशन) से दो वर्षीय कोर्स किया। यह संस्थान साउथ एशिया में मार्केटिंग कम्युनिकेशन का अग्रणी संस्थान है। कोर्स कंप्लीट करते ही वर्ष 1998 में दैनिक जागरण, कानपुर में बतौर ब्रांड मैनेजर नौकरी शुरू की।
  • आपने जागरण ज्वाइन किया और ब्रांड डेवलपमेंट में काम किया। बल्कि कहें कि दैनिक जागरण को ब्रांडिंग आपने सिखाई। यह  किस तरह? क्या-क्या किया? बाद में आपने जागरण से इस्तीफा देकर दिल्ली में किसी और नौकरी में चले गए थे। यह कैसे और क्यूं हुआ?
  • दैनिक जागरण में जब मैंने ज्वाइन किया तो इस अखबार में ब्रांडिंग विभाग की शुरुआत के लिए निदेशक शैलेश गुप्ता जी ने मुझे चुना। ब्रांडिंग का काम पहले से होता था पर उसे व्यवस्थित व नियोजित रूप में मैंने शुरू कराया और इसके लिए सिस्टम क्रिएट करने के साथ-साथ इसके विविध रूपों को लागू करने में छह साल लगे। ब्रांडिंग के जितने भी रूप होते हैं - इवेंट्स, आउटडोर, प्रमोशन, पब्लिसिटी....इन सभी पर काम शुरू हुआ और इसे ऊंचाई तक ले जाया गया। इन छह वर्षों में दैनिक जागरण के साथ काफी कुछ करने और सीखने को मिला। इससे न सिर्फ दैनिक जागरण को जबरदस्त ग्रोथ मिली बल्कि साथ-साथ मेरे  करियर को भी बढ़ावा मिला। एक तरह से देखें तो ब्रांड दरअसल कंटेंट से जुड़ा मामला ही है। तत्कालीन संपादक नरेंद्र मोहन जी के साथ काफी कुछ सीखने और करने को मिला। सखी, उदय जैसी पत्रिकाओं की लांचिंग, प्लानिंग, अवधारणा, कंटेंट आदि को तय करने  का मौका मिला। वर्ष 2002 में दैनिक जागरण के फीचर पेजों को री-स्ट्रक्चर करने के लिए संपादकीय सहयोगियों के साथ मिलकर एक विशद पाठक शोध कराया। इसी के बाद दैनिक जागरण के फीचर पेज नए और व्यवस्थित रूप में सामने आए। दैनिक जागरण से अलग होने के दो कारण थे। एक तो मेरे सामने कंफर्ट लेवल आ गया था। जो एरिया मेरे काम का था उसमें चीजें सिस्टमेटाइज हो गईं थीं और हर कुछ अब अपने आप होने लगा था। मुझे कुछ करने की कोई खास जरूरत नहीं पड़ती थी। इस कंफर्ट लेवल के चलते जीवन में एक ठहराव सा आने लगा था। दूसरा नया न कर पाने की पीड़ा थी। जितना कुछ जानता था उतना कुछ किया पर इससे आगे और कुछ नया करने की तमन्ना मन में थी। इसके चलते दैनिक जागरण, कानपुर छोड़कर नई दिल्ली में विश्व की मीडिया सर्विसेज की अग्रणी संस्था डब्लूपीपी की भारतीय कंपनी ग्रुप एम् में बतौर इनवेस्टमेंट डायरेक्टर वर्ष 2004 में ज्वाइन किया और यहां दो साल तक रहा।
  • Alok Sanwalआपने कहा कंफर्ट लेवल आ गया था। अपने हिंदी वाले साथी तो कंफर्ट लेवल को बहुत पसंद करते हैं। मतलब, चैलेंज कम से कम हो, नौकरी बिलकुल आराम की हो। पर आप तो बिलकुल उलटी बात कर रहे हैं। इसे जरा विस्तार से समझाइए।
  • देखिए, लाइफ बहुत कंफर्टेबल हो जाती है तो समझिए आपकी अवनति शुरू। जमाना बदल रहा है। गतिशीलता, नयापन और सृजनशीलता बहुत जरूरी है। आराम से काम का दौर नहीं है। अगर आगे बढ़ना है तो आपको हमेशा नई क्रिएटिव चुनौतियों को बुलाना चाहिए। मुझे तो काम में कंफर्ट से डर लगता है। लगातार कंफर्ट लेवल बना रहे तो काम करने की क्षमता खत्म हो जाती है। अगर किसी को किसी प्रोफेशन में इनटरनली चैलेंज न मिले तो उसे बाहर जाकर तलाशना चाहिए। मेरे साथ यही हुआ। दैनिक जागरण के साथ पहली पारी में शुरुआत बेहद चुनौतीपूर्ण थी। सब कुछ बनाना था, रचना था, स्थापित करना था। सब हो जाने के बाद कंफर्ट लेवल आया तो निकल पड़ा कुछ दूसरा करने को।
  • जो नई नौकरी दिल्ली में शुरू की उसमें क्या रहा?
  • इसमें दो वर्ष रहा। शुरुआत इनवेस्टमेंट डायरेक्टर के रूप में किया और छोड़ा नेशनल हेड - प्रिंट के रूप में। जिस कंपनी डब्लूपीपी में रहा वो दुनिया की मीडिया सर्विसेज का सबसे बड़ा संस्थान है। यह विज्ञापन और शोध समेत कई क्षेत्रों में सैकड़ों कंपनियों के द्वारा कार्य करती है। यहां समझ में आया कि समान कीमत होने के बावजूद दो समान प्रोडक्ट में से एक क्यों बड़ा ब्रांड हो जाता है और दूसरा छोटा। मैं  इस कंपनी में काम करने के बावजूद दैनिक जागरण से जुड़ा रहा। मैं जागरण से कभी मन से अलग नहीं हुआ था। जागरण की ग्रोथ से लगातार जुड़ा था और जागरण की बैठकों-सम्मेलनों में अक्सर जाता रहता था।
  • आई-नेक्स्ट की सफलता कई तरह के इतिहास रच गया है। टैबलायड मार्केट में देश का पहला बाइलिंगुवल कांपैक्ट, सबसे ज्यादा सेंटरों से प्रकाशित होने वाला, सबसे ज्यादा प्रसार वाला..... इतने सारे कीर्तिमान आपके नेतृत्व में स्थापित हुए। कैसे हुआ? 
  • Alok Sanwalआई-नेक्स्ट से पहले बीच में मैं चैनल- 7 में बतौर वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग) 7 दिनों के लिए काम किया। पर उन्हीं दिनों में यह तय हो गया कि चैनल 7 सिर्फ जागरण का नहीं होगा, इसमें कई पार्टनर होंगे और यह री-लांच होगा। तब मैंने यहां से छोड़ दिया। दैनिक जागरण के सेकेंड ब्रांड के बारे में बातचीत चल रही थी। इसे मूर्त रूप देने को दैनिक जागरण समूह ज्वाइन किया। बिलकुल अलग तरह का प्रोजेक्ट और चैलेंज था। इस प्रोडक्ट की सफलता के पीछे मुझे जो एक चीज समझ में आती है वो है दैनिक जागरण के निदेशकों का मेरे में विश्वास और प्रोडक्ट में विश्वास। जब आप किसी पर भरोसा करते हैं तो आप उसे क्रिएटिव होने की छूट देते हैं। मेरा मानना है जब आप किसी व्यक्ति या प्रोडक्ट में भरोसा करें तो पूरा फेथ करें। पता नहीं कब यह फेथ आपको आश्चर्यजनक रिजल्ट दे दे। इस फेथ के चलते हम लोगों को निर्णय लेने और प्रयोग करने का असीमित अधिकार मिला। मेरे में और प्रोडक्ट में न सिर्फ निदेशकों का बल्कि मेरी टीम के साथियों का भी फेथ था और फेथ है। मैनेजमेंट का मेरे में कानफिडेंस है। इससे हर दिक्कत दूर होती गई। मेरी कमियां कमजोरियां प्रोडक्ट के विकास में आड़े नहीं आईं क्योंकि उसे साथियों ने ठीक किया। साथियों की कमियां कमजोरियों को दूसरों ने ठीक किया। तो ये जो टीम वर्क है, फेथ के साथ टीम वर्क है, वो आपको सफलता दिलाएगी ही। एक वक्त था जब हम लखनऊ में आई-नेक्स्ट की मात्र 3000 कापियां बेच पाते थे, सारा जोर लगाने के बावजूद। आज हम उसी मार्केट में 62 हजार कापियां बेच रहे हैं। तो यह चमत्कार फेथ और फेथ के चलते लगातार प्रयोग करने की छूट से संभव हो सका। हमने हमेशा आंख नाक कान खुला रखा। पाठकों के फीडबैक के आधार पर प्रोडक्ट में बदलाव करते रहे। एक वक्त ऐसा आया जब हमारे प्रोडक्ट को पाठकों ने हाथों हाथ लिया। चीजें मैच हो गईं। तो मैनेजमेंट ने जो विश्वास और फेथ दिखाया, उसका एक समय बाद परिणाम आया।
  • आई-नेक्स्ट की लांचिंग बाइलिंगुवल के नाम से की गई थी। पर अब भी आप इसे बाइलिंगुवल कहेंगे। अब तो नाम मात्र की अंग्रेजी ही इस्तेमाल होती है।
  • बाइलिंगुवल दरअसल एक अवधारणा है। यह इससे तय नहीं होता कि 24 पेज के अखबार में अगर 12 पेज इंग्लिश के न हुए तो उसे बाइलिंगुवल नहीं माना जाएगा। हम अनावश्यक इंगलिश का प्रयोग नहीं करते लेकिन जहां इंगलिश सहजता व स्वाभाविकता में आती है उसे इस्तेमाल करते हैं। आज का युवा सोचकर हिंदी अंग्रेजी मिक्स नहीं बोलता बल्कि वह स्वाभाविक तौर पर बाइलिंगुवल है। तो आई-नेक्स्ट भी स्वाभाविक तौर पर बाइलिंगुवल है। और हम अब भी अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं।
  • आप संपादकीय और पत्रकारिता से तो जुड़े नहीं रहे लेकिन आप आई-नेक्स्ट के संपादक भी हैं। कैसे कर पाते हैं संपादक का काम।
  • मुझे यह कतई दंभ नहीं है कि मुझे पत्रकारिता की ए बी सी से लेकर एक्स वाई जेड तक सब आता है। मुझे आप ट्रेनी संपादक कह सकते हैं। मैं हमेशा सीखता रहता हूं। हर एक से सीखता हूं। मैं अपने फोटोग्राफर से कुछ न कुछ सीखता रहता हूं। अपने रिपोर्टर से सीखता हूं। हां, लेकिन अखबार का ओवरआल स्वरूप क्या हो, उसकी परिकल्पना क्या हो, उसे मूर्त रूप कैसे दिया जाए, विजन को जमीन पर कैसे ट्रांसलेट करें...इस काम को बखूबी करना आता है। अब भी आई-नेक्स्ट वैसा नहीं, जैसा हम लोग चाहते हैं। अभी बहुत सुधार की गुंजाइश है। तो जैसा हम लोग चाहते हैं, वैसा कैसे बनाया जाए, यह पता है लेकिन उस विजन को वर्किंग में धीरे-धीरे ही ट्रांसलेट किया जा सकता है। अभी हम प्रसार और विस्तार की लड़ाइयों को जीते हैं। हम अब क्वालिटी और कंटेंट व आई-नेक्स्ट को उसके रीयल विजन व दर्शन तक ले जाने में लगेंगे। यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि अपने साथियों के सपोर्टिव नेचर के कारण और उनका मेरे विजन पर ट्रस्ट होने के कारण मेरा एडिटोरियल का काम काफी आसान हो जाता है। मेरे साथियों का धैर्य मेरे काफी काम आता है।
  • आप अपनी कुछ अच्छाइयों और कमियों के बारे में बताइए।
  • अच्छाइयां तो कोई नही हैं और कमियां ढेर सारी हैं। अगर हर हाल में बताना ही है तो इन चीजों को आप अच्छाइयों में गिन सकते हैं- मैं किसी पर भी पूरा विश्वास करता हूं और ऐसी अपेक्षा रखता हूं। मतलब मैं रिश्ते और प्रोडक्ट दोनों में (हंसते हुए...) कनविक्शन पर भरोसा करता हूं। यह कनविक्शन किस कमजोर क्षण में काम आ जाए, कहा नहीं जा सकता। मेहनत के अलावा कोई रास्ता नहीं है- इस बात को मैं मानता हूं और इस पर अमल करता हूं। टीम वर्क में विश्वास करता हूं। साथ लेकर चलना जरूरी है। बस यही है। सच कहूं तो मैं अपने में अच्छाई तलाश नहीं पाता।
  • तो फिर अपनी बुराइयों को बयान करिए।
  • ढेर सारी हैं। लीजिए। पहला- परफेक्शनिस्ट हूं। परफेक्शन के मामले में इतना आग्रही हूं कि अगर पीछे पड़ जाऊं तो सामने वाले को दिक्कत हो जाती है। शार्ट फ्यूज हूं। जब गुस्सा आता है तो भयंकर आता है। बोलता बहुत हूं। मेरे दोस्त कहते हैं कि आलोक तुम बोलते अच्छा हो लेकिन केवल वक्ता ही बने रहते हो। श्रोता भी बना करो। मतलब, मेरे बोलने से सामने वाले बोर हो जाते हैं। परिवार को कम टाइम दे पाता हूं। यह मेरी बुराई है। मैं वादा करता हूं कि इसकी भरपाई मैं भविष्य में करूंगा। सोशल सिस्टम को लेकर मैं संवेदनशील तो हूं पर मैं सोशल सिस्टम को मानता नहीं।
  • आप अपने जीवन में किनसे प्रभावित रहे? आपके रोल माडल कौन रहे?
  • हर उम्र और हर दौर में अलग अलग रोल माडल रहे और अलग अलग लोगों से प्रभावित रहा। शुरुआत करते हैं बचपन से। स्कूल के दिनों में मैं अपने एक सीनियर को अपना रोल माडल मानता था क्योंकि वो हर चीज में बहुत आगे था। पढ़ने में, खेलने में, बोलने में...सभी में। मेरा वैसा ही बनने का मन करता था। जब प्रोफेशन में आया तो राहुल बोस मेरे रोल माडल रहे। राहुल बोस ने यंगेस्ट क्रिएटिव डायरेक्टर का करियर एक झटके में छोड़ दिया और फिल्मों में एक्टर बनने चल दिए। सोचिए, एक बिलकुल नई फील्ड में तब चले जाएं जब आप किसी एक फील्ड में बेहद ऊंचाई पर पहुंच गए हों। ऐसा वही कर सकता है जिसको अपने पर जबरदस्त विश्वास हो। और आपने भी देखा होगा कि चमेली समेत कई फिल्मों में राहुल बोस ने क्या जोरदार काम किया है। अबके समय के मेरे रोल माडल प्रदीप गुहा हैं। इस शख्स ने बेनेट कोलमैन (टाइम्स ग्रुप) को जो उंचाई दी है, वो शानदार है। प्रदीप जी के इस गुड जाब से बेहद प्रभावित रहता हूं। वे वाकई रोलमाडल की तरह हैं। उन व्यक्तियों के बारे में भी बताना चाहूंगा जिनसे मैं बेहद प्रभावित हूं। इसमें हैं प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी। इनकी सादगी से मैं बहुत प्रभावित रहता हूं। इनसे पता चलता है कि आप ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी बेहद सहज रह सकते हैं। जब मैं हरिवंश जी के घर गया तो वहां पुस्तकों का भंडार व कलेक्शन देखकर बेहद प्रभावित हुआ। अजय उपाध्याय जी उन लोगों में से हैं जिनसे मैं बेहद प्रभावित हूं। ज्ञान और विजन के भंडार। वे जिन बातों को आज बताते हैं, उन्हीं बातों को कई बड़े लोग डेढ़ साल बाद सेमिनारों में या किताबों में जिक्र करते हैं तो लगता है कि अजय जी ओरीजनल टैलेंट लीडर हैं। मैं खुद गवाह हूं। एक ट्रेंड, एक फंडे का जिक्र अजय जी ने काफी पहले किया था। यह था पापुलर कल्चर का। इसी बात को कई बड़े लोगों ने डेढ़ वर्ष बाद कहा।
  • आपने राहुल बोस की बात की, मुझे तो लगता है कि आप भी एक उंचाई पर पहुंचने के बाद फील्ड को बदल देते हैं। आप शुरू के चार वर्ष इंजीनियर रहे,  छह वर्ष ब्रांड मैनेजर रहे,  3 वर्ष बायर रहे, 7 दिन टीवी में रहे, अब आप संपादक हैं...तो ये भी तो रेयर है...आगे क्या इरादा है?
  • हां, आपने ठीक बताया। आगे के बारे में सच्ची कहूं तो  मुझे नहीं लगता कि मैं 10 वर्षों से ज्यादा मीडिया जगत में रह पाउंगा। आई-नेक्स्ट को लेकर अभी बहुत कुछ करना है। इस प्रोजेक्ट को उसके रीयल विजन तक पहुंचाना है। सपना तो ये है कि जैसे सेल (स्टील अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड) नारा देता है कि हम इस्पात भी बनाते हैं, उसी तरह एक दिन आई-नेक्स्ट भी कह सके कि हम अखबार भी निकालते हैं। मतलब, आई-नेक्स्ट युवाओं का प्रतीक बन जाए। युवा अगर कोई कैप, टीर्शट पहने तो वो आई-नेक्स्ट का हो। विचार आई-नेक्स्ट का हो। वेब आई-नेक्स्ट का हो। यूथ सिंबल, यूथ आईकान, यूथ कल्ट बने आई-नेक्स्ट। इसके लिए अभी बहुत कुछ करना है। आई-नेक्स्ट नाम से अखबार तो पहला और शुरुआत भर है। एक अच्छे ब्रांड को इस्टैबलिश करना है।
  • काफी गंभीर बातें हो गईं, कुछ प्रेम-व्रेम के बारे में बताइए?  इस फील्ड में कुछ  बताने लायक है?
  • हां हां, है ना। बहुत कुछ है। 35 साल की इस उम्र में अब तक 15 से 17 चेहरों के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। मेरे हिसाब से आकर्षण होना ही प्रेम है। किसी आब्जेक्ट या सब्जेक्ट में डिफनीट लेवल का इंटरेस्ट प्रेम है। वैसे, एक राज की बात बताऊं जब प्रेम करने वाली स्टेज में था तो 70 - 80 प्रेम कविताएं लिखीं और ये सब स्वांत सुखाय हैं। इनमें से चुनिंदा छह कविताओं को कानपुर स्थित आई-नेक्स्ट के नए मुख्यालय की दीवारों पर लगवा दिया है।
  • Alok Sanwalक्या बात है आलोक जी !  लाजवाब, अदभुत, गज़ब......तो चलिए छह में से कम से कम एक कविता तो सुना ही दीजिए.....
  • थैंक्स....। सुनेंगे....।          

                                         वो एक इस तरह है.....

तुम्हारी आंखें

बिना कुछ बोले

न जाने क्या कुछ कह लेती हैं

या मेरा मन

बिना किसी बात के

क्या कुछ सुन लेता है

बस यूं ही....

.....इतनी ही याद हैं। लंबी है ये। कानपुर वाले नए आफिस में आइए तो पूरा पढ़वाता हूं।

  • शौक क्या है?
  • पिक्चरें खूब देखता हूं। अगर कहीं पांच घंटे का वक्त मिला तो दो घंटे में खाना पीना निपटाकर बाकी तीन घंटे सिनेमाहाल में गुजारना पसंद करता हूं। मिशन इस्तांबुल का वेट कर रहा हूं। मैं तो अक्सर नई फिल्मों का पहला शो देख लेता हूं।
  • आजकल के जो नौजवान पत्रकार हैं,  आपको उन्हें जानने का मौका मिला है। उन्हें क्या समझाना चाहेंगे ताकि वो अपने करियर को सही दिशा में ले जा सकें।
  • एक चीज गांठ बांध लेनी चाहिए। खूब पढ़िए। ये प्रोफेशन पढ़ाई-लिखाई का है। अगर आप किसी चीज के लिए होमवर्क नहीं करते, तैयारी नहीं करते, बैकग्राउंड को गहराई से नहीं जानते तो उस पर कैसे अच्छा लिख पाएंगे। बाकी पत्रकारिता की जो फंडामेंटल बातें हैं, वही हर हाल में काम आती हैं। उन्हें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। एक चीज खासतौर पर कहना चाहूंगा कि पत्रकार को हमेशा संवेदनशील होना चाहिए। खबरों को लिखते वक्त ही नहीं बल्कि जीवन जीते वक्त भी। जब चीजों को संवेदनशील तरीके से महसूस करेंगे तभी बेहतर लिख सकेंगे। सफलता के लिए शार्टकट तलाशने के बजाय हार्डवर्क को हमेशा प्रीफर करना चाहिए।
  • पत्रकारों की नई और पुरानी पीढ़ी में क्या फर्क देखते हैं।
  • नई पीढ़ी प्रयोगधर्मी तो खूब है पर मेहनत से बचती है। सफल होने के लिए शार्टकट के चक्कर में लगी रहती है। पुरानी पीढ़ी मेहनती है पर प्रयोग करने से हिचकती है। कम प्रयोगधर्मी है। पुराने लोगों में कंफर्ट लेवल आ जाता है। वो अपने दायरे व अपनी स्टाइल में ही जीने के आदी हो जाते हैं। दोनों को थोड़ा-थोड़ा बदलना चाहिए। 
  • जीवन जीने का आपका अपना फलसफा क्या है?
  • जिंदगी का फलसफा मेरे स्कूल के प्रधानाचार्य जी द्वारा शायद इस श्लोक के साथ बता दिया गया है...चाविद्यां च यस्तद वेदोभयम सह, अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्रुते। यह इशावासोप्यानिषद का ग्यारहवां श्लोक है। इसका मतलब है, जो मनुष्य उन दोनों को अर्थात ज्ञान के तत्व को और कर्म के तत्व को भी साथ -साथ यथार्थतः जान लेता है वह कर्मों के अनुष्ठान से मृत्यु को पार करके ज्ञान के अनुष्ठान से  अमृत को भोगता है अर्थात परमेश्वर को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है। 
  • कुछ ऐसा है जो कहना चाहेंगे, अपनी तरफ से।
  • यही कि देश पाजीटिविटी की तरफ बढ़ रहा है। 15 साल पहले जो स्थितियां थीं, और आज जो हैं, उसमें बहुत फर्क है। हर व्यक्ति को कोशिश करना चाहिए कि वो थोड़ी ऊर्जा और थोड़ी खुशहाली बढ़ाने में मदद करे। जो जहां भी रहे,  एनर्जेटिक बने, पाजिटिव रहे। अपने घरों, आफिसों को थोड़ा ऊर्जावान व थोड़ा पाजिटिविटी से भरने का काम करें।
  • शुक्रिया आलोक जी।
  • -थैंक्स।

इस इंटरव्यू पर आप अपनी प्रतिक्रिया आलोक सांवल को सीधे  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर पहुंचा सकते हैं या फिर   This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं


AddThis